एक असुर की तपस्या के प्रसन्न होकर भगवान ने उसे सम्पदा और वैभव देना चाहा। लेकिन उस असुर ने यह कह कर उसे लेने से मना कर दिया कि धन से बुराइयाँ आती हैं। भगवान उसकी निर्लोभ भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे समझाया कि धन अपने आप में न तो अच्छा होता है न ही बुरा, बल्कि किस उद्देश्य से और किस प्रकार से उसका उपयोग किया जाता है, यह उसे अच्छा या बुरा बनाता है। अगर तुम सम्पदा का मालिक बन कर नहीं बल्कि उसे भगवान का उपहार मान कर खर्च करोगे और अपने को धन का स्वामी नहीं अपितु विवकपूर्ण संरक्षक मानोगे तो धन तुम्हारे लिए दुखदाई नहीं होगा। उस असुर ने उस संपदा का प्रबंधन उसी भावना से किया। सम्पदा से न तो उसमें कोई अभिमान आया न ही विलासिता ही। उसने धन का प्रबंधन और वितरण इतने अच्छे से किया कि उसे देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया गया और देवताओं की तरह सम्मानित माना गया। यह असुर था ऋषि विश्रवा और असुर कन्या देववर्णिणी (इलविला) का पुत्र वरुण। लेकिन, इसी वरुण के सौतेले भाई रावण में शक्ति और वैभव का ऐसा अभिमान आ गया कि उसका कुल सहित सम्पूर्ण विनाश हो गया।
इस प्रसिद्ध कथा से यह आशय निकलता है कि धन अपनेआप में बुरा या अच्छा नहीं होता बल्कि उसका उपयोग उसे अच्छा या बुरा बनाता है।
धन का यह स्वरूप हर काल और स्थिति के लिए सत्य है भले ही वह साहित्य ही क्यों न हो। एक साहित्यकार को भी जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है, इसलिए धन का अर्जन करना बिल्कुल ही स्वाभाविक है। अगर साहित्य खरीदा-बेचा जाए तो यह भी सही है क्योंकि साहित्यकार को अपने परिश्रम और प्रतिभा का कुछ मूल्य मिलता है ताकि वह जीवनयापन कर सके। लेकिन समस्या तब होती है जब साहित्य नहीं बल्कि साहित्यकार बिकने लगते हैं। तब यह खरीद-बिक्री ‘बाज़ार’ से एक कदम आगे बढ़ कर ‘बाज़ारवाद’ हो जाता है।
जो साहित्यकार आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, वह अपनी रचनाओं को पैसे देकर भी प्रकाशित करवा सकते हैं, प्रचार-प्रसार करवा सकते हैं, और विविध माध्यमों द्वारा अपनी ऐसी पहचान बना सकते हैं जिन्हें आधुनिक व्यापार की भाषा में ‘ब्रांडिंग’ कहते हैं। पर इसका कुप्रभाव तीन वर्गों पर होता है – (1) वे प्रतिभावान साहित्यकार जो आर्थिक अभाव में पाठकों के पास पहुँच नहीं पाते, (2) वे पाठक, जिन तक सद-साहित्य पहुँच नहीं पाता, और (3) साहित्य, जिसमें गुणात्मक वृद्धि नहीं हो पाती। गरीब साहित्यकार प्रोत्साहन के अभाव में, और धनी साहित्यकार आवश्यकता के अभाव में, साहित्य में गुणात्मक वृद्धि नहीं कर पाते।
पर, इसका फायदा भी होता है कुछ लोगों को। फायदा ऐसे लोगों को होता है जो बाज़ार के स्वभाव को जानते हैं, थोड़ा बहुत तकनीकी ज्ञान रखते हैं, या फिर संपर्क बनाने में माहिर होते हैं। तरह-तरह के साहित्यिक प्लैटफ़ार्म पर अधिकांश ऐसे ही लेखक सबसे ‘बिकाऊ’ बने हुए हैं जिनमें ये गुण है। साहित्य और समाज की समझ होना इन लेखकों के लिए आवश्यक नहीं रह गया है, ‘बाज़ार’ की समझ ही बहुत है इनके लिए।
आज हम जब किसी कालखंड या किसी समाज विशेष के विषय में जानना चाहते हैं तब हम उस कालखंड या उस समाज का साहित्य पढ़ते हैं क्योंकि कहा जाता है ‘साहित्य समाज का दर्पण’ है। परंतु क्या हो अगर बाज़ार के दबाव में यह दर्पण ही धुंधला हो जाय? यही सबसे बड़ा खतरा है ‘साहित्य में बाज़ारवाद’ का। ऐसे बाज़ार आधारित साहित्य लोगों को कुछ सोचने के लिए प्रेरित नहीं कर पाएँगे, उनकी संवेदना को झकझोड़ नहीं पाएँगे। अर्थात साहित्य अपने मूल उद्देश्य को भी भूल जाएगा।
समस्या साहित्य में धन के उपयोग की नहीं बल्कि धन के ऐसे दुरुपयोग की है जिसमें धन साहित्य के बदले साहित्यकारों की वृद्धि पर व्यय होता है। इस खतरे का एक ही बचाव है, साहित्य बिके, पर साहित्यकार नहीं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ के शब्दों में कहें तो:
“जो अगणित लघु दीप हमारे, तूफ़ानों में एक किनारे,
जल-बुझ कर किसी दिन, माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।”
