ट्रैफिक जाम

सुबह-सवेरे बीच सड़क पर,

बेबस-सा, लाचार खड़ा हूँ।

आँखों में है बॉस का चेहरा,

कानों में आवाज़ पड़ी है।

बाएँ वाला बोल रहा है,

“भाई! ट्रैफिक में फँसा पड़ा हूँ।”

दाएँ वाला बोल रहा है,

“भाई! लोन में फँसा पड़ा हूँ।”

पीछे से मैडम चिल्लाईं,

“मेरा बिल भी फँसा पड़ा है!”

वकील साहब बोल रहे हैं,

“भाई! कोर्ट में फँसा हुआ हूँ।”

सामने वाला युगल तो बस,

आपस में ही फँसा पड़ा है!

सब हैं साथ, मगर हैं अलग,

मोबाइलों में ही लगे पड़े हैं।

कोई यहाँ, कोई वहाँ खड़ा,

अपनी उलझन में फँसा पड़ा है।

मेरी तो औकात ही क्या, जब…

देश सारा ही फँसा पड़ा है!

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