यह घटना उस समय की है, जब मैं राँची के वीमेंस कॉलेज में बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। समय अस्सी का दशक होगा। मैं राँची वीमेंस कॉलेज के हॉस्टल में रहा करती थी। राँची से चालीस किलोमीटर की दूरी पर पतरातू नामक जगह पर मेरा घर था।
राँची और पतरातू के बीच एक घाटी थी जिसमें शाम छह बजे के बाद कोई बस नहीं चलती थी। घाटी में डाकुओं का आतंक भी बहुत था। कभी-कभी तो दिन में ही निजी वाहनों और बसों को को लूट लिया जाता था। पुलिस की गश्ती मे ही बसें आती जाती थी। मेरी भी कोशिश यही होती थी कि कभी भी अकेली आऊँ तो अंतिम बस से न आऊँ। शुरु-शुरु के दिनों में होम सिकनेस बहुत रहता है। कहने को तो मैं बारहवीं कक्षा की छात्रा थी, लेकिन जब भी मौका मिलता था मैं घर भाग आती थी।
एक बार शनिवार के दिन दोपहर में परीक्षा होने के कारण मैं छह बजे वाली अंतिम बस ‘लखनलाल’ को पकड़ ली। साथ में मेरी एक दोस्त भी थी। जनवरी का महीना था। बहुत ठंडी थी। सोची कि आठ बजे रात्रि तक घर पहुँच जाऊँगी। लेकिन किसी का सोचा हुआ कब होता है? उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।
मेरी बस घाटी में खराब हो गई। पीछे कोई बस भी नहीं थी। सात बजे का समय, कुछ लोग तो निजी वाहन को पकड़ कर निकल गए। हम दो लड़कियाँ असुरक्षित महसूस कर रही थी। फोन का जमाना भी नहीं था। बस कंडक्टर एक निजी वाहन से पतरातू गया और वहाँ से एक दूसरी बस लेकर आया। इस चक्कर में रात्रि के दस गए। डाकू का डर अलग, बस में हम दो लड़कियाँ, उसका डर अलग। केवल भगवान का नाम लेते हुए हमने समय निकाला।
कंडक्टर की मेहरबानी से हम रात के साढ़े ग्यारह बजे घर पहुँचे। घर पहुँचने के बाद हमने भगवान को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। हमें घरवालों की डाँट भी बहुत मिली। साथ में घरवालों से वादा करना पड़ा कि कभी अंतिम बस से घर वापस नहीं आऊँगी।
मैं जब तक राँची में रही, कभी भी अंतिम बस से पतरातू नहीं आई। यह भी सच है कि परेशानी के समय कोई न कोई भगवान बन ही जाता है। जैसे कि इस घटना में कंडक्टर हम लोगों के लिए भगवान साबित हुआ। आज भी मैं अपनी अंतिम बस मे इस यात्रा को भूल नहीं पाती हूँ।
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