अर्जुन ने अपनी माँ को बंगले में ऊपरी मंजिल पर एक अलग कमरा दे रखा था। कमरे में सारी सुविधाएँ भी उपलब्ध करवा दी थी। दो वक्त का खाना रसोईया कमरे में पहुँचा देता था।
अर्जुन का बेटा- “मॉम! आज़ ‘मदर्स डे’ है। मैं तुम्हें गिफ्ट देना चाहता हूँ। बता तो सही तुझे क्या चाहिए?”
बेटे के मुँह से यह सुनकर अर्जुन थोड़ा चौंक गया। उसने अपने बेटे से पूछा- “क्या आज़ ‘मदर्स डे’ है? मैं भी अपनी माँ के लिए बाज़ार से कुछ खरीद कर ले आऊँगा।”
अर्जुन बंगले के नीचे के कमरे में था। उसने तुरंत अपनी माँ को ऊपरी मंजिल पर फोन लगाया और पूछा- “माँ आज़ ‘मदर्स डे’ है। मैं तुम्हें गिफ्ट देना चाहता हूँ। बता तो सही मैं तुम्हारे लिए क्या लाऊँ?”
माँ ने जवाब दिया- “बेटे! मुझे किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं है। इस कमरे में मुझे सारी सुख-सुविधाएँ मिल गई हैं।”
लेकिन अर्जुन माना नहीं। उसने अपनी माँ के साथ ज़िद की। उसकी ज़िद के सामने माँ को हारना पड़ा और माँ ने उसे बताया कि वह उसके आॉफिस जाते वक़्त एक कागज़ में लिख कर देगी, वही बाज़ार से ले आना।
अर्जुन नहा-धोकर तैयार होकर माँ के कमरे में गया। माँ बिस्तर पर लेटी हुई थी। माँ की आँखें और मुँह खुला रह गया था। अर्जुन ने उसे ख़ूब हिलाया, लेकिन माँ … … ..! माँ के तन के पिंजरे से पंछी उड़ गया था। अर्जुन फूट-फूटकर रोने लगा। अचानक उसकी की नज़र मेज पर पड़े लिफ़ाफे पर पड़ी। उसने लिफ़ाफे को अपने हाथ में लेकर पढ़ा।
माँ ने लिखा था- “मेरे दिल के दुलारे और आँखों के तारे प्यारे बेटे अर्जुन, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। तुम ही मुझे भगवान का दिया हुआ अनमोल उपहार हो। किसी और चीज़ की मुझे क्या ज़रूरत है? फ़िर भी यदि तुम्हारे शहर की किसी दुकान से फुरसत के कुछ क्षण मिल जाएँ तो खरीद कर लेते आना, क्योंकि मैं सूखे पत्ते की तरह हो गई हूँ और न जाने कब गिर पड़ूं! अब मुझे अकेलेपन से डर भी लगने लगा है। जब तक मेरी साँसे चल रही हैं तब तक कुछ क्षण के लिए मेरे पास बैठा कर। एक महीने से तुझे देखा नहीं। कितने साल हो गए तुम्हें स्पर्श नहीं किया। मैं एक बार तुम्हारे गालों को चूमना चाहती हूँ ताकि आत्म संतोष के साथ मृत्यु का वरण कर सकूँ। क्या पता अगले ‘मदर्स डे’ पर मैं रहूँ या न रहूँ।”
लिफ़ाफे को पढ़कर अर्जुन फूट-फूट कर रोने लगा। माँ …..माँ …..माँ …..ये मुझसे क्या हो गया? मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई माँ। मुझे माफ़ कर दो माँ।”
एक अपराध भाव के अनुभव के साथ अर्जुन और परिवार के सभी सदस्य माँ के अंतिम संस्कार की विधि की तैयारी में लग गएं। सभी के दिल पर पत्थर का बोझ था और सभी ऐसा महसूस कर रहे थे कि उन्होंने ऐसा अपराध किया है जिसका और कोई प्रायश्चित ही नहीं है।
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