प्रकाश जब आज दफ्तर से लौटा तो उसके साथ उसके स्वर्गवासी पिता के दोस्त डॉक्टर दिनेश चन्द्र भी साथ में थे। वे शहर के एक बड़े मनोचिकित्सक थे। दो साल पहले जब उसके पिता का एक सड़क दुर्घटना में निधन हुआ था तब से माँ ने बिस्तर पकड़ लिया था। कई डॉक्टरों को दिखाया गया लेकिन माँ ठीक नहीं हो सकी। वह खामोश रहती। कम-से-कम बोलती। दीवारों को सूनी आँखों से एकटक निहारा करती।
प्रकाश की नौकरी दौड़-धूप वाली थी। घर पर भी कम ही समय दे पाता था। उसकी पत्नी प्रभा ने माँ की हरसंभव सेवा करने की कोशिश की, मगर उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब तो ऐसा लगता था जैसे माँ को भी अपनी बीमारी से कोई शिकायत नहीं रह गई थी।
प्रभा उससे अक्सर कहा करती थी, ‘‘माँ जी तो ठीक होना ही नहीं चाहती है। बस बैठे-बैठे उन्हें समय काटने की आदत पड़ गई है।’’
अपने कामों में व्यस्त प्रकाश पत्नी की बातों को अनसुना कर दिया करता था। माँ के इलाज के लिए वह हर संभव प्रयास कर रहा था। अब तो होनी को जो मंजूर था, वह होकर ही रहना था। ऐसा विचार कर वह इलाज के नाम पर डॉक्टर और मंहगी दवाइयों का निरंतर खर्च उठा रहा था।
आज उसकी मुलाकात डॉक्टर दिनेश चन्द्र से हुई थी। वे उसके पिता के बचपन के दोस्त भी थे। हालचाल दरयाफ्त हुई तो उसने पिता के असामयिक निधन और मां की बीमारी के बारे में बताया। उन्होंने स्वयं घर पर आकर माँ को देखने की इच्छा प्रकट की।
प्रकाश को यही लगा कि पुरानी जान-पहचान होने की वजह से वे माँ को देखना चाहते थे। इलाज के लिए तो उसने कई बड़े-बड़े डॉक्टरों को दिखा दिया था। सब ने अपनी-अपनी दवाइयाँ भी चलाई थी। मगर किसी ने कभी यह जरूरत महसूस नहीं की थी कि उन्हें किसी मनोचिकित्सक को भी दिखाना चाहिए था। स्वयं प्रकाश को भी यह कभी नहीं सूझा था। सभी डॉक्टरों ने यही कहा था कि पति की असामयिक मौत से उन्हें गहरा सदमा लगा था और वे चेतनाशून्य जैसी हालत में पहुँच गई थी। इलाज चलते रहना चाहिए था। वक्त बीतने के साथ उनकी स्थिति में स्वतः सुधार होता जाएगा।
डॉक्टर दिनेश चन्द्र ने माँ का उनके कमरे में ही मुआयना किया। वे बिस्तर पर सीधी अवस्था में लेटी हुई थी। आँखें जैसे दूर शून्य में कहीं कुछ देख रही थी।
‘‘माँ,…ये डॉक्टर दिनेश चन्द्र हैं….।’’ प्रकाश ने मां से कहा- ‘‘पापा के दोस्त…शायद आप इन्हें जानती होंगी।’’
माँ के आँखों की पुतलियाँ घूमीं। पहले वे प्रकाश पर आकर टिक गई। थोड़ी देर तक वहाँ जमीं रहीं फिर सामने एकटक खामोशी से कहीं देखने लगी।
डॉक्टर दिनेश वहीं एक कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने बात करने का प्रयास किया मगर माँ ने उनके किसी प्रश्न का जवाब नहीं दिया।
प्रकाश ने बताया था कि उनके जी में जब आता तब स्वयं दो-चार शब्द कभी कुछ बोला करती थीं। ज्यादातर समय खामोशी ही अख्तियार किये रहती थी। जैसे किसी अवसाद में डूबी हों। खाने-पीने की चीजों को जल्दी हाथ नहीं लगाती थी। फिर जब कभी इच्छा होती तो नाम मात्र का निवाला बेमन से लेती थी।
डॉक्टर दिनेश प्रकाश और उसकी पत्नी प्रभा से भी काफी देर तक कुछ-न-कुछ अजीबोगरीब सवाल करते रहे। जैसे वहाँ माँ के अलावा वे दोनों भी उनके पेशेंट ही हों।
’’प्रकाश, तुम्हें याद है तुम आखिरी बार कब मां के साथ कहीं घूमने गये थे?’’ डॉक्टर ने यह प्रश्न प्रकाश से मुखातिब होते हुए किया।
‘‘घूमने…..?’’ प्रकाश अचकचा कर बोला-’’ माँ के साथ…..। भला इस अवस्था में माँ के साथ कहाँ जाया जा सकता है डॉक्टर साहब?’’
’’माँ तो इधर बीमार हुई है न।’’ डॉक्टर दिनेश ने गंभीर मुद्रा में कहा- ’’जरा याद करके बताओ, वो जब ठीक थी या तुम्हारे पिताजी जब जीवित थे, तब तुम इनके साथ या दोनों के साथ कहीं बाहर गये थे या नहीं?’’
प्रकाश को सोचने में काफी वक्त लगा। फिर उसने कहा- “नहीं डॉक्टर साहब। मुझे अपने काम से कभी इतना वक्त ही नहीं मिलता कि माँ-पिताजी के साथ कभी कहीं घूमने जा पाता।’’
’’अच्छा। चलो ये बताओ कि तुम्हारे माँ और पिताजी इकट्ठे कब कहीं बाहर गये थे?’’ डॉक्टर ने अगला सवाल किया।
’’माँ को तो घूमने का बहुत शौक था।’’ प्रकाश बोला- “पिताजी अक्सर उन्हें बाहर ले जाया करते थे। चारो धाम की यात्रा करा चुके थे। बचपन में जब मैं छोटा था तब अक्सर ही किसी न किसी दर्शनीय स्थान की तरफ दोनों के साथ जाता रहता था। पिताजी माँ की हर इच्छा इनके बोलने से पहले पूरी किया करते थे। उनके जाने के बाद माँ बिलकुल अकेली पड़ गई।’’
’’तुम्हारे रहते…..?’’ डॉक्टर ने पूछा।
प्रकाश ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया। उसके पास कोई जवाब था भी नहीं। नौकरी की भाग-दौड़ में उसने मां को तो क्या अपनी पत्नी प्रभा को भी कभी पर्याप्त समय नहीं दिया था।
काफी देर तक ऐसे ही अनेकों तरह के सवाल-जवाब का सिलसिला चलता रहा। प्रभा इस बीच सबके लिए चाय बनाकर ले आई।
डॉक्टर अपने लेटर पैड पर कुछ मर्ज लिखने में व्यस्त हो गये थे। बीच-बीच में वे चाय की चुस्कियाँ भी लेते रहे। माँ की चाय साइड टेबल पर पड़ी रही, हमेशा की तरह अछूती।
इस बीच कमरे में पूर्णतया सन्नाटा छाया रहा। कुछ देर के बाद डॉक्टर दिनेश ने अपनी लिखी पर्ची प्रकाश की तरफ बढ़ा दी और हिदायत देते हुए कहा- ’’मैने इक्कीस दिनों की दवाईयाँ लिखी हैं। इन्हें तुम खुद समय से माँ को देना और तीन सप्ताह के बाद मुझे प्रोग्रेस रिपोर्ट देना।’’
प्रकाश ने पर्ची उनके हाथ से ले ली। बीते तीन सालों में आए दिन नई दवाईयों की पर्चियाँ लेने की तो उसे जैसे आदत-सी पड़ गई थी।
उसने एक उड़ती-सी निगाह डॉक्टर के पर्चे पर डाली। फिर अनायास ही कुछ चौंका। उसने आश्चर्य से पर्चे को पढ़ा और फिर हैरानी से डॉक्टर दिनेश की तरफ देखने लगा।
’’क्या हुआ? इतने हैरान क्यों हो रहे हो?’’ डॉक्टर ने चाय का आखिरी घूँट लेकर चाय को ट्रे पर रखते हुए पूछा।
’’ये…ये….भला कैसी दवाईयाँ हैं डॉक्टर साहब…….?’’ प्रकाश ने किंचित उलझन भरे स्वर में पूछा।
’’क्यों? क्या दिक्कत हैं इनमें?’’
’’मगर ये………?’’ प्रकाश को कुछ जैसे सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले?
’’देखो प्रकाश।’’ डॉक्टर दिनेश ने गंभीर स्वर में कहना शुरु किया- ’’मैंने ये जों दवाईयाँ लिखी हैं वे तुम्हें किसी मेडिकल स्टोर में नहीं मिलेंगी। क्योंकि ये दवाएं दुनिया की किसी फार्मा कंपनी ने आज तक नहीं बनाई है। ये तो तुम्हारे खुद के पास पहले से ही है। बस आज तक तुम ही उनसे अंजान बने रहे हो। सुबह-शाम दोनों समय माँ के पास बैठकर तुम्हें मात्र दस मिनट ही देने होंगे। उनसे आत्मीयता से बातें करनी होंगी। उनकी परेशानियों को पूछना होगा। उन्हें इस बात का आश्वासन देना होगा कि पापा नहीं हैं तो क्या हुआ, तुम उनकी खातिर आज भी मौजूद हो। जरा एक बार सोच कर देखो, तुम बचपन में जब बीमार पड़ते थे तो क्या तुम्हारी माँ तुम्हें सिर्फ दवाईयाँ भर खिलाकर छोड़ देती थी? तुम बुखार में तपते रहते थे तो वह तुम्हारा सिर अपनी गोद में रखकर रात-रात भर जगा करती थी। आज जब माँ अकेली पड़ गई है तो तुम अपनी दुनिया में इतने बिजी हो गए हो कि उसके साथ दस मिनट भी नहीं बैठ सकते? याद करो, उस वक्त तुम्हें दवाईयों से उतना आराम नहीं मिलता होगा जितना माँ की गोद में सिर रखने मात्र से सुकून मिल जाता होगा।’’
कुछ समय तक रुकने के बाद वे फिर अपनत्व से बोले, “बेटे, समय बदलता है। बच्चे जब छोटे होते हैं तो उन्हें माँ-बाप के छत्रछाया की जरूरत होती है। वहीं माँ-बाप जब एक दिन लाचार हो जाते हैं तो उन्हें भी अपने बच्चों के सहारे की उतनी ही जरूरत होती है। यह अलग बात है कि वे स्वयं अपने मुँह से तुमसे कुछ कहे अथवा नहीं। इसे तुम्हें खुद ही समझना होगा। तुम्हारी माँ के जीवन में एकाएक जो सूनापन आया है उसे सिर्फ तुम ही किसी हद तक भर सकते हो। वह तुममें ही तुम्हारे पापा की छाया ढूँढ़ती है। इससे पहले कि वे छाया ढूंढने वाली आँखों की रोशनी मद्धिम पड़ जाये, तुम्हें ही एक नया प्रकाश बनकर उनमें जीवन की नई ज्योति जगानी होगी। माँ को किसी दवा की नहीं बल्कि तुम्हारी जरूरत है। तुम्हारे प्रेम, अपनत्व और आत्मीयता भरे साथ की जरूरत है। ये ऐसी चीजें हैं जो मनुष्य को इंसान बनाती है और उसे जीवन जीने की नई प्रेरणा देती है। इनके बिना कोई भी मनुष्य सिर्फ हाड़-मांस का एक जीता-जागता पुतला भर बन कर रह जाता है। मुझे उम्मीद है कि तुम मेरी बातें समझ गए होगे। अब मैं चलता हूँ।’’
डॉक्टर की दलीलें सुनकर प्रकाश जड़वत्-सा रह गया। उसके आगे अनगिनत दृश्य चलचित्र की तरह चलने लगे। बचपन की धूंधली यादें। माँ की गोद में सिर रखकर सोना और उनकी मीठी लोरियां। बुरी नजरों से बचाने के लिए काजल का टीका और फिर माँ की बलैयां। अनायास ही उसकी आँखें नम हो गईं। पर्ची उसके हाथों से फिसल कर कब का फर्श पर गिर चुकी थी। उसने आगे बढ़कर माँ के चरणों में अपना सिर झुका लिया और न चाहते हुए भी सुबकने लगा।
डॉक्टर दिनेश ने धीरे से उसका कंधा थपथपाया और कमरे से बाहर निकल पड़े। माँ के शरीर में थोड़ी-सी हरकत हुई। उन्होंने धीरे से अपने एक कांपते से हाथ को आगे बढाकर टेबल पर रखे चाय के प्याले को उठा लिया। चाय तब तक ठंढी हो चुकी थी। उसी समय प्रभा एक नया गर्म चाय का प्याला लेकर उनके समीप आ गई।
’’मम्मी, मुझे माफ कर दो…। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो रही थी…। अब मैं हमेशा तुम्हारा ख्याल रखूँगा….। सदा तुम्हारे पास ही रहूँगा ……।’’ प्रकाश बुदबुदा रहा था।
उसके हाथों के उस क्षणिक स्पर्श के जादू से माँ के अंतर्मन में घने कोहरे की भाँति छाई अवसाद की परतें जैसे छंटने लगी थी। उनके अंधेरे जीवन में आज एक नये प्रकाश का उदय हो चुका था।
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