वे न मेरे डैडी हैं, न पापा। शुद्ध पिताजी हैं। कहीं ‘काका’ तो कहीं ‘बापू’। ठेठ गँवई। न जमाने का रंग चढ़ा है, न जमाने को अपने पर रंगतदार होने दिया है। यों कानों में अँग्रेजी उच्चारण पड़ते-पड़ते कुछ शब्द उनकी जुबान पर रवाँ हो गए हैं। चाय-वाय से सुबह का स्वाद बन जाता है। मेहमानों के लिए चाय की मनुहार सिर पर चढ़कर बोलती है। केसरिया पगड़ी, हल्की पीली झाँई देते धोती-कुर्ते, पाँवों में चमरौंधी पगरखी और सत्तर का पाठ पढ़ाती छड़ी।
अबकी बार पिताजी ने हँसकर कहा- “बेटे! तूने मकान खरीद लिया है। कार भी ले ली है। अब तो तेरी बई के साथ देखने आने की इच्छा है।”
इधर जिस गुलमोहरनुमा कॉलोनी में मैंने फ्लैट खरीदा है, उसमें मिलनेवालों के बीच मैंने “डैडी” का ही परिचय दिया है। और अब पिताजी आ रहे हैं, बई के साथ। मेरे दिमाग में भँवर-सा पड़ गया है। जैसे कॉलोनी की रोशनाई नदी के प्रवाह में पिताजी और बई चट्टान की तरह अड़ गए हैं। जैसे गँवई धुँधलका मल्टी और अपार्टमेंट की कंक्रीट सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगा रहा है।
खुले-खुले बाड़े में रहने वाले वे, फ्लैट के नौ सौ वर्गफुट के क्षेत्रफल में कैसे समा पाएँगे? सुबह शाम ओटले या दुकान के पटिये पर बैठकर ठहाके लगाने वाले कैसे इस भूगोल में अटक पाएँगे! ड्राइंग रूम का सोफा और बेडरूम का डबल बेड, क्या उनकी दरी-बैठक और जमीनी बिस्तर को बंद ही रखने का संकेत दे पाएँगे? मगर इन सब से अलहदा मेरी एक चिंता है। इस पॉश कॉलोनी में मेरे मित्रों के बीच, हलो-हाय के औपचारिक रिश्तों के बीच मैंने पिताजी के “डैडी संस्करण” का प्रकाशन कर रखा है। बई को “मॉम” की तरह प्रचारित कर रखा है। अब यकायक कॉलोनी में के “डैडी” को गँवई “पिताजी” में डिकोड करना कोई मशीनी अभ्यास तो है नहीं। सभ्यता का भूचाल मुझे प्रकंपित कर रहा है।
इस कॉलोनी में रहने का अपना गौरव है। सभ्यता के पिछड़े अवशेषों से नितांत दूर। किसी द्वीप की तरह झिलमिलाती रोशनियों से रंगीन। सम्मोहक परदों के भीतर एक निजी संसार। भौतिक उपकरणों में ऐंठन दिखाती स्वायत्तता। मदमाती पर्सनेलिटीज। कारों में दौड़ती अस्मिता। ठहाकों से दूर, मुस्कुराहटों में जीने वाले। खानपान की आधुनिकता से आधुनिक दिखने वाले।
इस “मल्टी” में बई और पिताजी आएँगे, ठहरेंगे, तो लोग उन्हें कितना अजनबी समझेंगे! यों कॉलोनी बनारसी साड़ी में तो इतराती है। मगर मेवाड़ी शान वाली केसरिया पगड़ी म्यूजियम की चीज बन गई है। वह किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के सिर पर चढ़कर वतन की शान और लोकप्रियता का मान भले ही बन जाए, मगर कॉलोनी के लिए तो अजायब है। मुझे डर है कि कहीं वे लोहे की पेटी और कनस्तर का डिब्बा लेकर ठेठ गँवई अंदाज में ना आ जाएँ! वरना कार से उन्हें उतार कर लिफ्ट के हवाले लोगों की नजर से गुजारते हुए फ्लैट में पहुँचाना कितना कठिन होगा। कॉलोनी तो कवर में सजती है। पर्दों में निखरती है। गिफ्ट कवर में सभ्यता की भंगिमा बिखराती हैं। लोहे की पेटी और कनस्तर का डिब्बा…., इन्हें गिफ्ट आइटम की तरह सजाकर कैसे लाया जाए?
पिताजी और बई आ गए तो मुझे लगा कि मल्टी की सभ्यता का पारा नीचे आ रहा है। पिताजी का खुला आकाश, फ्लैट की गैलरी में समा नहीं पा रहा है। ताज़ी हवाओं का संसार पंखे कूलर के दबाव से घुटा जा रहा है। एकाएक उन्होंने खिड़की का पर्दा खींच लिया तो लगा ऑपरेशन के लिए चमड़ी को चीर दिया गया है। मेरा गद्देदार सोफा प्रतीक्षा करता रह गया। मगर वे कालीन पर जम गए। पोते ने टीवी चला दी तो दादा जी बोल पड़े -“आ गोबाल.. टीबा (टी.वी) टीबी.. ने आजा थारा (तेरे) से बात कर लूँ। फिर पोते को गोद में बिठाकर सहलाने लगे। सभ्यता के औपचारिक रंगों में ढ़ला पोता नेह के इन ठेठ रंगों को अजायब आँखों से घूरता- कसमसाता रहा।
मैं कितनी कोशिश करता हूँ कि कोई विजिट देने आए तो पिताजी और बई मेरे बेडरूम की लक्ष्मण रेखा ना लाँघ पाएँ। वरना इस फ्लैट की सभ्यता की सीता का अपहरण होते क्या देर लगेगी! चाहता हूँ कि अतिथि को मेरा यह आधुनिक सजा सँवरा फ्लैट सोने के मृग की तरह कुलाँचे भरता नजर आए। तभी पिताजी ड्राइंग रूम में आ गए। कोई मेहमान आए और उनसे मिले बिन बताए चला जाए, यह तो उनके आतिथ्य धर्म पर लाँछन की तरह है। पर उनके आते ही सोने के हिरण का रंग उड़ गया। अतिथि के कानों में मेरी जबान का डैडी शब्द ही पड़ा था। आँखों में डैडी तस्वीर ही उगी हुई थी। पर सकुचाते हुए मैंने कहा -“पिताजी हैं, कल ही आए हैं।” अतिथि की आँखों में मेरी पर्सनैलिटी उल्टा-पुल्टा हो गई।
अतिथि सत्कार में मैंने करीने से सजी काजू-बादाम के झंडे गाड़ती मिठाइयाँ सामने रखवा दी थीं। पर वे बोले- “अभी तो मैं ब्रेकफास्ट लेकर ही आ रहा हूँ।” आखिर कॉलोनी का भी एक “दिखाऊ … पर नाखाऊ संस्कार” भी होता है। रखने को चार मिठाइयाँ और सामने ना खानेवाली सभ्य मुखमुद्रा। दबाव बना तो जरा सा कुतर लिया। तभी पिताजी को कुछ लगा। बोले- “अरे बेटा! भैया के लिए घर से लाई बेसन की चक्की ले आ। अगर यह ना भाए। शुद्ध देसी घी की बनी है।” सभ्यता के पाँवों की जमीन खिसकी जा रही थी। सारे रंगरोगन इस गँवई प्यार की सीलन से उखड़े जा रहे थे।
कितने दिनों से फ्लैट में रहते हुए सभ्यता का सिंदूरी चोला चढ़ाता जा रहा हूँ। पर ये पपड़ियाँ निकलती ही जा रही हैं। सामने सभ्य संसार का चकमक प्रतिनिधि इस स्पंजदार सोफे पर बैठा है। और दूसरी तरफ भोले-गँवई- नेह की प्रतिमा के रूप में एंटीक की तरह पिताजी।
मैं चाहता हूँ कि इस फ्लैट की हर चीज मेरी हैसियत से इठलाती नजर आए। मैडम साड़ी पहन कर निकलें तो लोग कीमत का अंदाज लेबल पर पड़ी रेट की तरह चिपका लें। पर कहीं पिताजी किसी के सामने ऐसा ना कह बैठें, जो गँवई पिता लड़के के अफसर बन जाने पर गर्व-गौरव से कह बैठते हैं।
मगर हुआ वही। कंपनी के एक डायरेक्टर साहब के सामने घर का सजीला चित्र खींच रखा था। पिताजी उनसे बतियाते रहे। घर आया तो मुस्कुराते हुए बोले- “आपके पिताजी से खूब बातें हुईं। आपने भी जमीनी संघर्ष करते हुए इस ऊँचाई को पाया है।” मैं तरबतर हो गया इस असलियत ने मेरी स्नॉबरी को जमीन पर लाकर पटक दिया। अब तक आँखों में बराबरी थी। हलो-हाय में भी देखा परखी। आज ऐसा लगा जैसे गाय ने मार्बल के फर्श पर गोबर कर दिया।
इस पॉश कॉलोनी के शानदार फ्लैट में स्नेह के इस गँवई स्पर्श से टकराकर यह सभ्यता कितना आहत महसूस कर रही है। सभ्यता के सुनहरे आवरण पर गँवई रंगों के फफोले उकस आए हैं। मन आज भी बई और काका में रमा है। पर प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि वे जाने की तारीख बताएँ, तो रिजर्वेशन करवा दूँ।
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