नन्ही को गोद में उठाकर क्या सोचने लगते हो, बिटवा?’ दादाजी ने रोहित से पूछा। ‘दादाजी, सोचता हूँ कि साझे परिवार में नन्हे-मुन्नों को पालना कितना आसान होता है। कोई गोद में झुलाता है, कोई हारी-बीमारी में दवा-दारू करवाता है। आप जैसे बुजुर्ग नीति के किस्से सुनाकर आचरण संवारते हैं तो नई पीढ़ी वाले मेले-ठेले, हाट-बाजार में घुमाकर दुनिया-दर्शन करवाते हैं और यूँ करते-कराते बचपन पार हो जाता है।’
‘बिटवा, यही बात बुढ़ापे पर भी लागू होती है। साझे परिवार में बूढ़ा आदमी किसी एक पर बोझ नहीं बनता और बुढ़ापा पार लग जाता है। बहुत भाग्यशाली हूँ मैं, जो संयुक्त परिवार में रह रहा हूँ।’ सायंकाल परिवार में घटी एक घटना से, परिवार में, ऐसा झंझा आया कि अलगाव की बात जोर पकड़ गई। दादाजी को इसकी भनक लगी तो वे गुमसुम हो गए। ‘भूख नहीं है,’ कहकर खाने की थाली लौटा दी।
रोहित के मन-मस्तिष्क पर भावों की घटा-सी घिर आई, ‘कहीं यह अलगाव दादाजी को समय से पहले विदा न कर दे?’ शंका-कुशंका के दौर में उसने परिजनों की मीटिंग बुलाई, जिसके आदि में गर्मागर्म बहस, मध्य में छींटाकशी और अंत में ….था।
****
