“होली” शब्द में ही होली की विशेषता समाहित है। होली शब्द में चार वर्णों का योग है- ह+उ+ल+ई। ह=हर्ष, उ=उल्लास, ल= ललक, ई= ईश्वर। ईश्वर की हर्ष और उल्लास की ललक होली है। होली भी भगवान की लीला है। लीला में भी चार वर्ण हैं-ल+ई+ल+आ। ल=ललक, ई=ईश्वर, ल= लक्ष्य, आ=आनन्द।
ईश्वर अपने प्रबल इच्छा द्वारा आनंद की प्राप्ति के लिए ही लीला करते हैं। ईश्वर के आनंद में ही संसार की लीलाएँ होती रहती हैं। ईश्वर अपने आनंद के लिए ही प्रलय और सृजन की लीला करने में व्यस्त रहते हैं। होली भी प्रलय के बाद सृजन की लीला है। शिशिर ऋतु में प्रकृति अपने पुराने परिधानों को बदलकर नए परिधानों को धारण करती है। नवीनता में ही उल्लास और आनंद समाहित होता है अभिलाषित वस्तु की प्राप्ति ही उल्लास और आनंद का कारण बनती है।
परमात्मा के विकार से ही संसार की उत्पत्ति होती है। साक्षी रूप में आत्मा परमात्मा से निकलकर शरीर में वास करती है। यह क्रिया परमात्मा की शक्तिस्वरूपा माया द्वारा संपादित होती है। परमात्मा से अलग होकर आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए विकल रहती है और परमात्मा भी अपने अंश आत्मा से मिलने के लिए व्यग्र रहते हैं। आत्मा एक है, शरीर अनेक हैं। होली का त्योहार इन्हीं दोनों के मिलन का त्योहार है।
मन से भेद को भगाइए, दिल को मिलाइए और आनंद उठाइए।
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