आँधी

झूठ की आँधी ने इतनी तीव्रता से अपनी चाल चल दी थी कि कमला देवी के आदर्शों का महल ताश की पत्तों की भाँति बिखर चुका था। विश्वास के कितने ही पेड़ जड़ समेत उखड़ चुके थे। लेकिन वह पर जिसे कमलादेवी कमजोर समझती थी वही विश्वास जड़ों की मिट्टी को जकड़ कर खड़े थे। आज कमलादेवी इतनी बेसुध थी कि जनवरी की रक्त को जमा देने वाली ठंढ का भी उन्हें अहसास नहीं था। आँखों से बहते-बहते आँसू भी अब शेष नहीं बचे थे। पत्थर की मूर्ति-सी खाली सतह पर बैठी टकटकी लगाए दीवार को देख रही थी। घड़ी की टिकटिक आवाज दिमाग में हथौड़े की तरह चोट मार रही थी और बार-बार प्रश्नवाचक चिन्ह दिमाग में उभर रहे थे आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों?
मेहनत करके खून पसीने से एक-एक जोड़कर सीढ़ी बनाया कमला देवी ने। जब मंजिल तक पहुँचने ही वाली थी कि अचानक किसी ने सीढ़ी तोड़कर गिरा दिया और कमला देवी जमीन पर जा गिरी। जिस नमिता (कमला देवी की बहू) को अपनी बेटी से भी ज्यादा प्यार दी वह आत्महत्या कर दुनिया से चली गई। कभी नमिता पर सास बनकर हक नहीं जताया। सब कुछ नमिता को सौंप दिया। उसकी हर एक इच्छा को सम्मान दिया और उसे पूरा किया।
फिर भी नमिता के परिवार वालों ने कोई भी कसर बाकी नहीं रखा कमला देवी के ह्रदय को बेंधने के लिए। ठंडी की कोहरे की तरह झूठ ने चारों ओर से घेर लिया था। कमला देवी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इतनी नफरत क्यों नमिता के परिवार वालों की कमला देवी के प्रति जबकि नमिता के माता पिता और भाई गिड़गिड़ाते हुए आए थे सुरेश (कमला देवी के पति) के पास नमिता की शादी के लिए। सुरेश ने आदर्श (बिना दहेज के लेन-देन के) ही प्रतीक की शादी नमिता के साथ पक्की कर दी थी। सुरेश ने मात्र एक जोड़ी साड़ी में अपनी बेटी को भेजने का आग्रह नमिता के पिता और भाई से किया था।
सुरेश के रिश्तेदारों ने बहुत नाराजगी दिखाई की क्योंकि अच्छे-अच्छे घरों से उनके बेटे प्रतीक के लिए रिश्ते आ रहे थे लेकिन उन्होंने वहाँ रिश्ता नहीं किया था। सुरेश ने सोचा कि गरीब की बेटी से बेटी को लाऊँगा तो दुआ मिलेगी।
लेकिन सुरेश को क्या पता था कि हिरण की खाल में भेड़िया थे वे सब। शादी के एक दिन बाद से ही वे लोग अपना रंग दिखाने लगे। प्रतीक की जेब से ₹20,000 अंकिता (नमिता की बहन) ने निकाल लिया। प्रतीक ने पहले सोचा मजाक कर रही है। लेकिन उसने लौटाया नहीं।
शादी के दो दिन बाद ही प्रतीक की सास आकर उसे धमकाते हुई बोली “बहुत हो गया अपनी माँ को आदर्श मानना, अब आपकी माँ की नहीं मेरी चलेगी।” यह सुनते ही प्रतीक को झटका-सा लगा था। वह सोचने लगा कि जिस माँ ने हमें आदर्श व्यक्ति और अपने मंजिल को पाने के योग्य बनाने के लिए तीस वर्षों तक दिन-रात तपस्या की उस तपस्या को नमिता की माँ तीन दिन में कुचल कर रख देना चाहती है!
दुख के साथ-साथ प्रतीक को आश्चर्य भी लग रहा था कि जिस माँ ने उसके लिए इतना त्याग किया है उसके प्रति उसके ससुराल वालों में इतनी नफरत क्यों! जब प्रतीक शादी करके नमिता के साथ अपने घर आया था तो साफ शब्दों में कह दिया कि “माँ! नमिता मेरी पत्नी है और उसको मैं आदर, सत्कार, प्यार सब कुछ दूँगा, पर अपने ससुराल दोबारा कदम नहीं रखूँगा क्योंकि वहाँ का माहौल बहुत गंदा है।”
जो प्रतीक नकारात्मकता में भी सकारात्मकता ढूँढ लेता है वह आज इस कदर दुखी हो गया कि ससुराल कभी ना जाने का वचन दे दिया। ससुराल तो दांपत्य जीवन का वह मधुर और स्वर्णिम कोना होता है जहाँ से दूल्हा को वापस आने का मन नहीं होता है। जिसके हँसी-मजाक और मस्ती पर कई लोकगीत बने हैं। वहाँ से प्रतीक इतना दुखी होकर लौटा है। कमला देवी को बहुत दुख हुआ। उन्हें अपने पिता और माता कि याद आने लगी। वे दोनों सुरेश (कमला देवी के पति) को भगवान राम की तरह मानते थे क्योंकि उन्होंने बिना किसी लेन-देन के उनकी बेटी कमला देवी से विवाह किया था। उनकी आँखों में सदैव अपने दामाद के लिए सम्मान और स्नेह नजर आता था और उनके आशीर्वाद का खजाना दामाद पर बरसता रहता था।
कमला देवी को लगता था कि उनके पिता और माता के स्नेह और आशीर्वादों के प्रताप से ही कमला देवी के दोनों बच्चे प्रतीक (बेटा) और मिताली (बेटी) संस्कार और पढ़ाई के लिए समाज और रिश्तेदारों में एक उदाहरण बने थे। सुरेश और कमला देवी को लोग आदर्श मानते थे। लेकिन यही सब नमिता के माता-पिता के लिए एक अभिशाप बन गया था। इसी चीज को हथियार बनाकर वह लोग कमला देवी की छवि को नष्ट करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। नमिता को हर वक्त फोन करके डराते थे, धमकाते थे कि “यहाँ आकर रहो नहीं तो वहाँ आकर हंगामा खड़ा कर दूँगा, तेरी सास-ससुर की इज्जत धरी-की-धरी रह जाएगी।
हर बार डरकर नमिता ससुराल वालों और पति की परवाह किए बिना ही मायके चली जाती थी। कुछ दिन रह कर फिर खुद ही आ जाती थी। हर वक्त नमिता की बहन और माँ उसके कान भरती रहती थी “किसी तरह झगड़ा कर, फसाद कर, ताकि हम लोगों को मौका मिले तेरी सास से लड़ने-झगड़ने का और तुझे मायके आने का। एक बार तू आ जाएगी फिर वापस नहीं जाना। जब तू नहीं जाएगी तो प्रतीक अपनेआप दौड़ा आएगा।” नमिता उन लोगों की बातें सुनकर कोशिश तो करती थी लेकिन यहाँ उसे ऐसा अवसर ही नहीं मिलता था। यहाँ पर ससुराल में इतना सम्मान और प्यार उसे मिलता था कि वह कुछ बोल ही नहीं पाती थी।
कमलादेवी जानती थी कि हर वक्त नमिता को भड़काया जा रहा है सास-ससुर के खिलाफ। लेकिन उन्हें पूरा विश्वास था कि वह अपने विश्वास और प्रेम से नमिता के ऊपर उनके नफरत को हावी नहीं होने देगी। जब कमलादेवी का यह विश्वास चकनाचूर हुआ तो ऐसा लगा कि वह जिस बालू के ढ़ेर में बीज बोकर स्नेह के बाँध बांध कर तीन वर्षों से उसे इस उम्मीद में पानी से सींच रही थी कि कभी तो इसमें से प्रेम की कोंपलें निकलेंगी। लेकिन आज जब वह बिरवा बिखर गया तब पता चला कि उनके स्नेह का जल एक छेद में समा गया और बीज बालू वैसे ही सूखे पड़े थे।
कोई भी माँ ऐसी हो सकती है, यह बहुत आश्चर्यजनक बात थी कमला देवी के लिए। एक दिन नमिता की माँ की आवाज सुनी थी कमला देवी ने “धिक्कार है तेरी जैसी बेटी को। प्रतीक तेरे माँ-बाप से बात नहीं करता है और तू उसके माँ-बाप को खाना बनाकर खिला रही है।” सुनने के बाद कमलादेवी झल्ला गई थी। “काश बेटी को झगड़ा करने के लिए भड़काने के बजाय एक बार मेरे घर आकर प्रतीक से दो शब्द प्यार से नमिता के माता-पिता कर लेते तो हमारा बसा-बसाया घर नहीं बिखरता।”
कमला देवी अपने पिता की तस्वीर को देखकर फूट-फूट कर रोने लगी। “पापा! आप कहाँ हो। आज आप की बहुत जरूरत है।” पापा को याद करते-करते बचपन की गलियों में मन पहुँच गया। सोचने लगी एक कमला देवी के पिता थे जो एक मजबूर किसान थे, जिन पर हालात हर वक्त कहर बरपाता रहता था। फिर भी उन्होंने अपनी नैतिकता को नहीं त्यागा और हर रिश्ते को मान-मर्यादा से निभाया।
खेती हमेशा साथ नहीं देती थी। कभी अकाल फसल जला देता था तो कभी बाढ़ फसल बहा ले जाती थी। प्रायः कर्ज में डूब जाते थे। कभी-कभी तो दो-दो दिन तक घर में खाना नहीं बनता था। मूली के साग को उबालकर पूरा परिवार खाते थे। भाइयों के घर से लजीज खानों की खुशबू आने पर भी कभी कमला देवी के पिता के मन में यह ख्याल नहीं आया कि उन्हें उनके भाई कुछ क्यों नहीं देते थे। यह उनका परम संतोष था। कमला देवी के पिता भैंस पालते थे। जब भैंस दूध देना कम कर देती थी। वे खुद नमक रोटी खाकर भाइयों के लिए दूध भिजवा देते थे। यह उनका त्याग था।
हमेशा अभाव में रहे, लेकिन कभी भी बेटियों के भरे-पूरे घर में झांक कर भी नहीं देखा। एक नमिता के पिता थे, बेटी के तीन वर्ष के वैवाहिक जीवन में जो जहर भरते रहे, अंततोगत्वा वही जहर उनकी बेटी को निगल गया। कमला देवी सोचने लगी और अपने वैवाहिक जीवन से नमिता के वैवाहिक जीवन की तुलना करने लगी।
सुरेश आजीवन शादी नहीं करने का मन बना कर भगवान में लीन हो गए थे। लेकिन सगे-संबंधियों के दबाव में आकर जबरदस्ती शादी करनी पड़ी थी उन्हें। शादी के वक्त सुरेश के पास कुछ नहीं था सिवाय एक फूस के घर के। उसी घर में कमला देवी के प्यार और समर्पण के कारण धीरे-धीरे वे सांसारिक मोह में पड़ते गए। जब कमलादेवी ससुराल आई थी तो छप्पर से वर्षा का पानी टपकता था। पूरी-पूरी रात कमलादेवी और सुरेश एक दूसरे के सीने में लग कर प्रेम और विश्वास की गर्माहट से वर्षा के पानी से उत्पन्न ठंड का एहसास भी भुला देते थे।
सुरेश के माता-पिता तो उनकी शादी से पहले ही संसार से विदा हो चुके थे। जल्दी ही कमलादेवी और सुरेश का प्रेम बेटा प्रतीक के रूप में खिला। फिर बेटी मिताली हुई। वैसे तो दोनों पति-पत्नी बहुत खुश थे लेकिन अब सुरेश को लगने लगा कि बच्चों की अच्छी परवरिश और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें शहर जाकर कोई काम करना चाहिए। पत्नी और बच्चों से दूर होने का मन नहीं होने के बावजूद उन्हें गाँव में छोड़ कर शहर जाना पड़ा था। क्या करते “पापी पेट का सवाल” था।
कितना प्रेम और विश्वास था दोनों में। दोनों एक-दूसरे से दूर रह कर भी एक-दूसरे के पास थे। प्रत्येक दिन दोनों एक-दूसरे को पत्र लिखते थे। गीत और शायरी से हर वक्त पति को दूर रहते हुए भी तरोताजा रखती थी। अभाव में भी कमलादेवी कितनी शान्ति से जीती थी। अपने आँगन-बारी में खुद अपने हाथों से साग-सब्जी उगाती थी। खेल-खेल में प्रतीक को पढ़ाती थी। रातों को जग कर अपनी पढ़ाई भी करती थी। तीन वर्षों तक गाँव में रहने के बाद कमलादेवी और बच्चों को लेकर सुरेश शहर आ गए। लेकिन जिस नौकरी के भरोसे सुरेश अपने परिवार को शहर ले आए थे, वो नौकरी भी छूट गई। उस वक्त कमलादेवी ने अपनी मेहनत की बिगुल बजाकर आसपास के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
देखते-ही-देखते ही कमलादेवी का नाम हो गया। बच्चों के अच्छे परीक्षाफल से हर जगह कमला देवी की मेहनत और लगन के गुणगान होने लगे। विद्यार्थियों की भीड़ बढ़ने लगी। दूर-दूर से विद्यार्थी आने लगे। अब सुरेश और कमला दोनों पति-पत्नी मिलकर पढ़ाने लगे। कमलादेवी पर तो मानो जिम्मेदारी का पहाड़ था। 12 घंटे कोचिंग पढ़ाने के बाद घर का काम, खाना-पीना बनाना, अपने बच्चों की पढ़ाई, इतना सब कुछ तो था उनके करने के लिए। तब भी वे हमेशा मुस्कुराती रहती थी क्योंकि स्वामी विवेकानंद की एक पंक्ति उनके रग-रग में बसा था “अविराम कर्म करो, पर दास की तरह नहीं, स्वामी की तरह।” 24 घंटे में मात्र 4 घंटे सोती थी। रविवार को कोचिंग से अवकाश मिलता था। पर उस दिन तो वह और भी व्यस्त रहती थी। पूरे सप्ताह की सफाई के साथ ही सब कुछ संभाल लेती थी।
लेकिन आज कमला देवी पर इल्जाम लग रहे हैं। यह सब सोचते हुए वह बेहोश होकर गिर पड़ी। सुरेश और प्रतीक भी घर में नहीं थे। वे पुलिस और डॉक्टर संबंधी औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए नमिता की लाश के साथ हॉस्पिटल गए हुए थे। कमलादेवी की जब आँखें खुली तो अपने आप को भीड़ से घिरा हुआ पाया। ये सब उस कालोनी से आए थे जहाँ कमला देवी अपने परिवार के साथ पहले रहती थी। उनलोगों को जब इस हादसे का पता चला तो वे किसी तरह भागते हुए इस सोसाइटी में उनके नए घर का पता पूछते हुए आ गए थे। नमिता की सुविधा और खुशी के लिए ही कमला देवी का परिवार उस कॉलोनी को छोड़कर सोसाइटी में आ गया था ताकि यहाँ हरियाली भरे बड़े-से पार्क में घूमे, बैठे, और अपने आपको तरोताजा कर के स्वतंत्रतापूर्वक जी सके।
आज वहीं की औरतें कमला देवी पर दुख आया देख दौड़ी आयीं थीं। कोई गोदी में सिर रखकर उसे दबा रही थी, कोई चाय बनाकर जबरदस्ती पिला रही थी। सभी एक सुर में बोल रही है “बहन जी हम तुम्हारे साथ हैं। झूठे इल्जाम से कुछ नहीं होगा। हम सभी को तुम पर पूरा विश्वास है। सत्यमेव जयते”। यह सब सुनकर कमलादेवी फूट-फूट कर रोने लगी। मन में ग्लानि होने लगी कि सोसायटी में आकर दिखावे के आदर्श और संवेदना को अपना कर अपने पुराने कॉलोनी वालों को ही छोटा समझने लगी थी। कमलादेवी सोसायटी के पड़ोसी को आदर्श और संवेदनशील नागरिक समझती थी, जो जब भी मिलते थे “गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग” से अभिवादन करते थे। हमेशा कहते थे “हम आपके पड़ोसी हैं, कभी कुछ जरूरत पड़े तो सेवा का मौका जरूर दीजिएगा।”
जब नमिता के लाश को ले जाने के लिए एंबुलेंस आई, तब ये लोग अपनी खिड़की भी बन्द कर घरों के अंदर बैठ गए थे। बहू की लाश को देख कर सुरेश बेसुध-से पड़े थे। प्रतीक फूट-फूट कर रो रहा था। कमला देवी भी शोकाकुल और बदहवास-सी हो रही थी जब लाश को एंबुलेंस में रखकर हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था। लेकिन फिर भी इनमें से एक खिड़की भी नहीं खुली। पर उस कॉलोनी के लोग जिन से कभी कमलादेवी बात भी नहीं कर पाती थी, आज पूरे विश्वास के साथ कमला देवी के साथ खड़े थे।
****

यह भी पढ़ें  हाथी की रस्सी (प्रेरक कहानी)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top