नानी शब्द सुनते ही, कान के तार को झनझनाते हुए ध्वनि तरंगे ह्रदय सागर में उथल-पुथल मचा देती है। नानी के साथ बिताए हुए हर लम्हे हृदय सागर के किनारे आकर तैरने लगते हैं। उन एहसासों को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं है, बस मैं उसे केवल एहसास कर सकती हूँ।
मेरी नानी की सांवली सूरत बहुत ही मोहिनी थी। काले-काले सघन बाल जब नानी के खुले होते और सहसा जब नानी मेरी किसी बात पर हँसती थी तो ऐसा लगता था मानो बादलों के बीच तारे कतार में सजे हो। मैं अपनेआप को बहुत सौभाग्यशाली समझती हूँ, कि मेरा बचपन संयुक्त परिवार में बीता, जहाँ अपने-पराए का भेद नहीं था, जहाँ ताऊ जी को पापा और पापा को चाचा कहती थी। उस हँसते-खेलते बचपन के आँगन में एक कोना हमेशा सूना रहता था, वह कोना था दादा-दादी का स्थान। दादाजी तभी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए जब मेरे पिताजी बहुत छोटे थे।
करीब पैंतीस वर्ष बाद अपने बीमार पिता को देखकर लौट रही थी। कार जैसी ही ब्रह्मपुर गाँव के पश्चिमी छोड़ पर गई और मुड़ कर घर द्वार को पीछे छोड़ते हुए सीधे रास्ते पर बढ़ने लगी कि दोनों ओर हरे-भरे खेत और सघन आम के बागों से गुजर रही बसंत के मधुर और नटखट पवन ने कान में ऐसे धुन गुनगुनाया कि पैंतीस वर्ष पहले यादों के बीज जो हृदय में सुसुप्त पड़े थे अचानक अंकुरित होने लगे।
बगीचा से ठहाके और हँसी मजाक की ध्वनि स्पष्ट सुनाई देने लगी। याद आ गया कि सावन में कैसे मौसी सबके साथ यहाँ तक फूल तोड़ने आती थी। लगा जैसे वर्षों से कैद मन बचपन का प्रांगण मिलते ही आजाद होकर विचरन करने लगा। गाड़ी आगे बढ़ती गई और मैं एक-एक चीज को अवचेतन मन से चेतन मन में लाने की कोशिश करने लगी।
जैसे ही गाड़ी बिहारी गाँव की सीमा पर पहुँची सबसे पहले मेरी नजर उसराही तालाब को ढूँढ़ने लगी जहाँ पर मैं प्रत्येक दिन अपनी प्यारी नानी के साथ नहाने आया करती थी। पर उसराही तालाब को देख कर मन बहुत मायूस हो गया क्योंकि जो छवि मैं अपने हृदय में रखकर 35 वर्ष पूर्व गई थी उससे बहुत भिन्न वर्तमान का दृश्य था। शायद सबके घर में नल समरसीवर, मोटर लग गया था इसीलिए कोई यहाँ नहाने नहीं आता होगा। एक असहाय अकेली बूढ़ी महिला की तरह प्रतीत हो रही थी वह उसराही तालाब। बहुत दुख हुआ तालाब की ऐसी दुर्दशा देखकर।
गाड़ी आगे बढ़ी। मैं ढूँढ़ती रही नानाजी का खरिहान (खलिहान)। लेकिन वह कहीं नहीं मिला। खरिहान खेत के बहुत बड़े भाग में मिट्टी भराकर खूब ऊँचाई तक बनवाया गया था। साथ लगते हुए बागान में नानाजी ने भी चारों तरफ आम, लीची, पपीता और अमरूद के पेड़ लगाए थे। पेड़ों का ध्यान रखने के लिए नानाजी बीच में फूस का घर बनाकर उसी में रहते थे।
क्या मनोरम दृश्य हुआ करता था, जिसका नामोनिशान तक नहीं रहा! जब भी मैं नानी गाँव आती थी घंटों खरिहान में बैठती थी। पैंतीस वर्ष पहले की हर एक तस्वीर चकनाचूर हो रही थी। नानी बहुत याद आने लगी। लगा जैसे नानी खरिहान से निकल कर अपनी श्यामली मोहिनी मूरत लेकर मुस्कुराते हुए आएगी और अपनी कमर पर लटके चाभी का गुच्छा निकाल कर देगी और कहेगी “ले बाबू खाना परोस कर ढँक कर रखा है घर में, खा लेना” जैसे स्कूल से आने के बाद मुझे कहती थी।
कितना बोझ था नानी के कंधों पर। अपने तीनों बहू-बेटों को संभालते हुए, 13 वर्ष की उम्र में विधवा हो गई देवरानियों को संभालते हुए, पूरे घर को बांध कर रखती थी। सभी के आक्रोश, संवेदना, शिकायत को एक अथाह सागर की तरह अपने में संभाल लेती थी और एक बार उफ्फ तक नहीं कहती थी। धन्य थी मेरी नानी! नानी को शत-शत नमन!
पहचान में नहीं आ रहा था। झोपड़ी की जगह पर पक्का मकान चमक रहे थे। एक भी चेहरा जाना–पहचाना नहीं लग रहा था। लगा जैसे मैं अपनी नानी गांव में नहीं, कहीं और ही आ गई हूँ। बदलाव तो जीवन का नियम है, जो होना आवश्यक है। लेकिन यह बदलाव हमें बहुत कुछ देता है, तो बहुत कुछ छीन लेता है।
गाड़ी को रोककर मेरे पाँव अनायास ही नानी जी के घर की ओर बढ़ गए। मन ने कहा जिस घर-आँगन में तूने बचपन के खूबसूरत पल बिताए हैं, उस जगह का दर्शन नहीं करोगी! नानी के निर्जन और टूटे-फूटे घर को देखा। इतने बड़े आँगन, जहाँ नानी के साथ पाँच और चचेरे नाना-नानी रहते थे कभी, अब केवल एक चचेरे मामा उस आँगन में रह रहे थे। उन्होंने बताया कि बाकी के मामा सब दूसरी-दूसरी जगह जाकर घर बनाकर रहने लगे हैं।
मुझे लगा जैसे वर्षों से संजो कर रखा मेरा बचपन का धरोहर किसी ने चुरा लिया। वर्तमान में खंडहर बना नानी के घर-आँगन को देखकर किसी को यकीन नहीं आएगा कि यह आँगन कभी कितना फला-फूला, कितना गुलजार था। जिस आंगन में छः परिवार एक साथ हँसते-खिलखिलाते, लड़ते-झगड़ते फिर भी एक डोर में बंधे, एक साथ रहते थे। मुझे तो लगता ही नहीं था अपनी नानी और चचेरी नानी अलग है, सभी स्नेह करते थे।
मैं वहाँ चुपचाप खड़ी होकर उस जगह को देख रही थी लेकिन मन नानी के साथ ही विचरण कर रहा था। नानी कितने स्नेह से हमें निहारती रहती थी! मेरे बातों पर ठहाका मार कर हँसते थी! नानी की हँसी सुनकर सब चचेरी नानी भी आ जाती थी। उस पर मेरी नानी बोलती “आ गई सब! एक पल के लिए भी मेरी नतनी को अकेले मेरे पास नहीं छोड़ती है।” चचेरी नानी सब बोलती “क्यों छोड़ूं भला, मेरी नतनी नहीं है क्या?”
नानी के संदूक को घर के कोरो-बत्ती (फूस के घर में छत को सहारा देने के लिए बने बांस या लकड़ी के फट्टे) और खपड़ा के ढेर ने ढ़क दिया है। शायद यह सोचकर कम-से-कम नानी की निशानी संदूक तो बच जाए। जो आँगन-घर नानी के समय में गोबर मिट्टी से लिपे चमचम करते थे उसमें खर-पतवार ने पूर्ण रूप से अपना साम्राज्य बना लिया है। दो घर ईंट के बने थे जिसकी छतें खपरैल थीं। सामने फूस का एक रसोईघर था, जिसे नानी “भंसा घर” कहती थी। वह घर तो नहीं था, लेकिन मिट्टी पर अभी भी निशान थे जले हुए चूल्हे के। नानी चूल्हे पर कितनी स्वादिष्ट खाना बनाती थी, याद करते ही मुँह में पानी आ गया।
नानी प्रतिदिन एक टोकरी पीतल के बर्तन, जिसे नानाजी पूजा में प्रयोग करते थे, घिसकर चमकाती थी। कितनी पवित्रता थी नानी के कार्य में। पर आज इन जगहों को, इन समानो को, जो नानी से जुड़े हुए हैं, देखने वाला कोई नहीं है। मामा-मामी परदेसी हो गए। शायद सभी रौनक नानी के साथ चली गई!
बहुत-बहुत धन्यवाद नानी ऐसा सुंदर और निश्चल बचपन देने के लिए। भले ही आप दुनिया से दूर चली गई, लेकिन मेरे हृदय में आप हमेशा जीवंत रहोगी!
****
