पड़ोसन राधा

राधा प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका थी, अपने काम से मतलब रखने वाली, किसी से भी बहुत ज्यादा बातें नहीं करती थी।
पति बीमार रहा करता था, कोई काम भी ठीक से नहीं कर पाता था। पति के साथ-साथ दोनों बच्चों का सब भार राधा के ऊपर ही था। स्कूल से आकर आस-पड़ोस के बच्चों को पढ़ाती, स्कूल में बहुत कम पारिश्रमिक मिलता था, उससे घर का खर्चा चलना मुश्किल था इस महंगाई के समय में। सासू माँ भी राधा के पास रहती थी, वो भी बीमारियों से परेशान। राधा मशीन बन गई थी, पड़ोस में किसी के घर जा नहीं पाती थी, एक रविवार का दिन छुट्टी का होता, वह दिन तो घर की सफाई, कपड़े धोने आदि में ही बीत जाता था। दोस्त, रिश्तेदार भी रविवार को ही आते थे। पड़ोसियों से कभी बातें नहीं होती, सब घमंडी कहते, शिक्षिका होने का गुमान है, ये समझते। पर उसे फर्क नहीं पड़ता, कौन अच्छा कहता कौन खराब।
पति का आकस्मिक देहांत हो गया। अब तो और भी पहाड़ टूट पड़ा बेचारी पर। कोई कुछ पूछने वाला नहीं, बस उसके कपड़ों पर और उसके मांथे पर लगी बिन्दियों पर सबका ध्यान रहता।
मैं भी यही समझती रही, ये खुद खराब है, घमंडी है, मतलबी है। सबों के जैसे मैंने भी दूरियां बना ली राधा से। आज नज़दीक से उसे देखना हुआ, भोली-सी दिखती थी। मुझे रहा नहीं गया। मैंने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। वह भी नमस्कार का जवाब देते हुए हाथ जोड़ ली।
फिर बताई, अभी मैं व्यस्त हूँ, कभी आपसे बातें करती हूँ।
लोगों से जितनी सुनी थी, वो उतनी खराब नहीं लगी।
फ़िर अचानक ही एक दिन दरवाज़े पर वह खड़ी थी, मैं आदरपूर्वक अपने घर लाई, और पूछ बैठी आज आपने अपने समय में से मेरे लिए कैसे समय निकाल लिया। वो मुस्कुरा कर बोली, किसी ने आज तक मुझसे मिलने की कोशिश ही नहीं की। मुझे भी अच्छा नहीं लगता आगे बढ़ कर बात करना, पर आपने मुझसे बातें की तो मुझे मिलने का मन किया।
ठंढ़ का समय था। दोपहर थी। हम घर की छत पर चटाई बिछा धूप में बैठ कर बातें करने लगीं। राधा ने बोलना शुरू किया। मेरा नाम, मेरे बारे में, तो बहुत कुछ पता ही होगा आपको। मैं हंस कर बोली “जी पता है, आप बहुत व्यस्त रहती हैं, किसी के लिए समय नहीं होता।”
राधा थोड़ी-सी गुमसुम हो गई। गंभीर मुद्रा में बोली, “मजबूरीवश अपने से मतलब रखती, ख़ुशी देने वालें बहुत कम, पर घाव पर नमक छिड़कने वालों की कमी नहीं।” मैंने भी कहा “ये तो आप सही कह रही हैं, पर रहना तो इसी समाज में है, सबसे मिलकर।”
उसने भी कहा “वो तो है, पर मुझमें और दूसरों में बहुत फर्क है, जब मेरे पति थे भी, तो बीमार ही रहते थे। सच में बहुत उलझी है जिन्दगी मेरी, ख़ुद सुलझाना जानती हूँ, डर लगता है, भीड़ से, और भी न उलझा दे मुझे।”
“दो बच्चों की माँ कब बनी पता ही नहीं चला, पर किसे बताती, जिसने जन्म दिया वो शादी कर निश्चिन्त हैं। मेरी हालत पता है, पर मुझे देख नहीं सकते, क्योंकि बेटी जो ठहरी। एक अच्छा काम किया माँ-बाप ने, मुझे पढ़ाया, बी. ए. पास की थी, बस वही था मेरे पास। उसी की बदौलत जी रही हूँ। पता नहीं आज तक किसी से कुछ भी नहीं कह पाई, आप से कैसे कह गई….।”
मैं एकटक उसे देखती रही। उसकी बातें सुनती रही। आँखें भर आई राधा की बातें सुनकर। राधा जाने को उठने लगी, मैं गले लगा ली, और बोली हम पड़ोसी हैं, सबसे नज़दीकी, सारी बातें कर सकती हो, जो अपने घरवालों और ससुरालवालों से नहीं कर पाती।
जब भी मन करें आप मुझसे बात कर लेना….।
राधा चली गई। मैं सोचती रही, आज वो मुझसे बातें नहीं करती तो मैं अभी तक यही समझती रहती कि ये घमंडी है। मैंने भी तो पड़ोसी का फर्ज निभाने में देरी कर दी!!
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