पुस्तक: मोहपाश
लेखिका: डॉ शेफालिका वर्मा
समीक्षक: अनीता मिश्रा
मोह पाश! मोह पाश! मोह पाश! दिल के सागर में भावों का सुनामी ला दिया मोह पाश। मै उस योग्य नहीं हूँ कि आदरणीया शेफालिका दीदी की पुस्तक की समीक्षा कर सकूं। मोहपाश पढ़ने के बाद जो अनुपम अनुभूति हुई है उसे व्यक्त करना चाहती हूँ।
डॉक्टर शेफालिका वर्मा द्वारा लिखित मैथिली पुस्तक मोहपाश को मिथिलांगन संस्था द्वारा हिन्दी में प्रकाशित किया गया है। जिसका हिंदी अनुवादक आदरणीय ओम कर्ण जी है। सम्पादक आदरणीय मुकेश दत्त जी है। हर कथा का पात्र, भाव, प्रसंग, निदान और सार है इस पुस्तक में।
(1) “आरंभ का दर्द”- इस कहानी मे पात्र के द्वारा लेखिका उस दर्द का अनुभव करा देती है जब कोई नवांकुर साहित्यकार को पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और उपेक्षा की आग में जलना पड़ता है। उस दर्द के एहसास के साथ पूर्वाग्रही साहित्यकार के मुंह से ही नाम छुपाकर उसी कविता का जय जय कार करा दिया जिसकी वो आलोचना किए थे।
(2) मोह पाश की दुसरी कहानी “कहाँ होगी वह”- इस कथा में लेखिका की भाव विह्वलता भावुक कर पाठक के हृदय में भाव भर कर आँखें नम कर देती है। शहरीकरण और विकास की आँधी में किस तरह से एक छोटा सा टिहरी गाँव भीलांगना नदी में समाहित हो गया। नदी में समाहित होने से पूर्व की पूरे ग्रामीण जीवन के परिवेश और वातावरण का सजीव चित्रण की है। टिहरीगांव की एक बालिका उसका स्वभाव बाल सुलभ चपलता, सपना, गाँव से लगाव को पढ़कर हृदय द्रवित हो गया। शीर्षक “कहाँ होगी वह” नयन को सजल कर गया।
(3) “डोरोथी”- इस कहानी ने लंबे समय से बनी धारणा को चकनाचूर कर दिया, जो हम विदेशी संस्कृति के बारे में अपने मन में पालते हैं धारणा यह कि विदेशी संस्कृति में सभी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार जीवन के रंग चुनते हैं कोई कभी भी संबंधों से अपनी मर्जी से अलग हो जाते हैं। उनके संबंध में ठहराव नहीं होते लेकिन लेखिका ने इस कथा के माध्यम से यह समझा दिया कि प्रेम, विश्वास और वफादारी किसी देश या स्थान के मोहताज नहीं होते। व्यक्ति के निज नैतिकता पर निर्भर होता है। डोरोथी विदेशी महिला, जेम्स के प्रेम को जीवन भर निभाई। मरने के बाद में भी उसी के याद में अपना जीवन बिताई। जेम्स और डोरोथी एक दूसरे से सच्चा प्यार करते थे। जेम्स को कैंसर हो गया था। डोरोथी चाहती तो दूसरी शादी करके सुखी से रह सकती थी। वहाँ की संस्कृति के अनुसार वह बाध्य नहीं थी लेकिन डोरोथी ने घर और बच्चे को संभालते हुए पूरी निष्ठा से अपने पति की सेवा की। यह कहानी दर्शाती है कि प्रेम सर्वशक्तिमान होता है।
(4) “मोहपाश” – यह कहानी आधुनिक समय में वैवाहिक जीवन की बिखराव से बचने का एक आदर्श सेतु है इस कहानी की पात्रा काव्या, कहानी के पात्र सुचेत के शादी से पहले लगाव को बड़ी चतुराई से शादी के बाद कथा बनाकर मोह तोड़ देती है ताकि सुचेत जीवन में आगे बढ़ सके और काव्या भी अपनी वैवाहिक जीवन शांति से निर्वाह कर सके।
(5) “फंसरी के दो छोर”- इस कहानी का शीर्षक लेखिका ने सटीक दिया है। यह जीवन लड़की के लिए फंसरी (फाँसी) के दो छोर ही तो है जिसमें एक छोर पिता के हाथ में और दूसरा छोर पति के हाथ में होता है। “भाषा” इस कहानी की पात्रा की आँखें बेबसी की अश्रु से भरी थी आज। “शैली”, “भाषा” की बेटी की शादी उसके मनमर्जी के खिलाफ “भाषा” के पिता “भाव बाबू “द्वारा करवाया जा रहा था। शैली जिससे प्यार करती थी वह बहुत ही संस्कारी और आदर्श लड़का था। रूपवान भी था लेकिन भाव बाबू के हैसियत के बराबर नहीं था इसीलिए भाव बाबू ने स्वीकार नहीं किया। इसमें लेखिका बड़ी ही खूबसूरती से और एक संदेश देती है कि जब भाव बाबू गरीब के बेटा थे और भाषा अमीर बाप के बेटी लेकिन भाषा भाव बाबू से बेहद प्यार करती थी। भाषा के पिता न चाहते हुए भी अपनी बेटी के प्रेम के आगे झुक गये। वही भाव बाबू जब एक अमीर पिता बन जाते हैं तो अपनी बेटी की इच्छा को कुचल कर उस आदर्श को भूल जाते है। भाषा के लाख समझाने पर भी नही मानते है।
(6) “एपार्टमेंटी-संस्कृति” इस कहानी में वर्तमान समय के दिखाबे के युग का यथार्थ चित्रण किया गया हैं, दीदी ने बड़ी ही सहजता से बिना किसी पर आरोप प्रत्यारोप लगाए पात्र के द्वारा ही स्पष्ट कर दिया कि किस तरह से अपार्टमेंटी जीवन में एक बुजुर्ग अपनी बहू को बोझ लगने लगती है। बुजुर्ग के निजी वस्तु कूड़ा समान लगने लगते हैं वही बुजुर्ग जब मरती हैं तो वह रो-रो कर दिखाती है कि सास के बिना उसका घर खाली हो गया! वह अनाथ हो गई! जिंदगी के नकली पन को दर्शाती है।
(7) “घर” इस कहानी में वर्तमान समय की यथार्थ समस्या है। हर पाठक को यह लगेगा कि यह खुद की कहानी है। उदाहरण भी अद्वितीय उघरे हुए ऊन की तरह ही तो घर की समस्या होती है। शिल्पी शादी करके तेजस के साथ आई एक सुखी संपन्न परिवार में वह भी सपना पाल रखी थी कि नौकरी करके अपना करियर बनाएगी। लेकिन पति का बचपन अकेलेपन में गुजरा था क्योंकि घर में सभी नौकरी करने वाले थे। इसी वजह से शिल्पी के पति ने उसे नौकरी करने से मना कर दिया। शिल्पी तेजस के इच्छा अनुसार गृहिणी बनकर पूरा घर संभाल ली। घर को दिल से स्वर्ग बनाई लेकिन बच्चों की दिनचर्या, लापरवाही बेरुखी को देखकर ग्लानि से भर जाती है। उसके मन में हर वक्त यही असंतोष रहता है कि वह तेजस के उम्मीद पर खड़ी नहीं उतर पायी।
(8) “सिसकता अंधेरा” इस कहानी के माध्यम से लेखिका बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत की है कि यदि आपस में विश्वास सुदृढ़ ना हो तो किस तरह से कुटिल का झूठ पूरे परिवार को दीमक की तरह खा जाता है। कुहु अनुराग से बात करती तो गंधा के झूठ का पर्दाफाश हो जाता। अनुराग और श्रद्धा के पवित्र संबंध का पता चलता तो कुहू को शक में तिल तिल नहीं मरना पड़ता है यह कहानी हमें सीख देती है कि आपस में संवाद बहुत जरूरी है।
(9) “एक और महाभिनिष्क्रमण” इस कहानी में यह दर्शाया गया है कि एक पुरुष की चालाकी का शिकार किस तरह दो निश्चल महिलाएँ हुई। यह एक हृदय विदारक कहानी है लेखिका बहुत सुंदर तरीका से प्रकृति की कोमल निश्चल और वफादारी भरे हृदय को दर्शायी हैं तो दूसरी तरफ पुरुष के भ्रमर स्वरूप को।
(10) “संस्कृति” इस कहानी में आदरणीया शेफालिका वर्मा जी ने पात्रा शीला, जो इंगलैण्ड में भारतीय परिवारों की स्थिति के प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसके माध्यम से संस्कृति के निधि को अपने विस्तृत हृदय में बसे भाव सागर में से अनमोल रत्न को इस कहानी के गागर में संस्कृति के सागर को भर दी है। सच में एक-एक पात्र को। पिरोकर यथार्थ चित्रण किया है। जहाँ हम बहुत सारे लेखक ऐसे हैं जो शिकायत और उलाहने के रूप में कविता कहानी लिखकर अधूरा छोड़ देते हैं। इन्होंने शिकायत को तराजू के दोनों पलड़े पर संतुलित करके और बड़ी ही ईमानदारी से हमारे समक्ष कहानी के यथार्थ रूप में प्रस्तुत की है। एक-एक पात्र को पिरोकर यथार्थ चित्रण किया है।
मोह पास की कहानी घर में लेखिका ने जहाँ दिखाई कि किस तरह से एक गृहिणी माँ के बच्चे लापरवाह है अपने किसी भी सामान को अपने जगह पर नहीं रखते हैं घर को अस्त व्यस्त करके रखते हैं। पूरे दिन माँ संभालती-संभालती थक जाती है। वहीं दूसरी तरफ संस्कृति कहानी में दिखाई है कि किस तरह से एक 14 वर्ष की भूमि जो दसवीं की छात्रा है। किस तरह से एक कुशल गृहिणी की तरह पूरे घर को संभाल कर पढ़ाई भी करती है। माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं उनके आराम का भूमि कितना ध्यान रखती है। इंग्लैंड में रहकर पति-पत्नी दोनों के नौकरी करने के बावजूद बच्चे संस्कारी हैं और घर में कितनी शांति है। इस कहानी में दोनो पक्ष को दिखया गया है भारतीय मूल के दो परिवारों के माध्यम से।
शीला जब सप्तक दंपति से मिलने जाती है, सप्तक की माँ से बात करके भावविह्वल हो जाती है। जब उनकी सुनती है कि किस तरह से बेटे बहू ने छलावा करके अपनी माँ को भारत से बुला लिया और यहाँ आने के बाद उसकी माँ उपेक्षा सहती है। अपने हीं बेटे के घर में डर -डर कर जीती है।
वहीं दूसरी ओर शीला जब दूसरे भारतीय दंपति से मिलती है तो उसे आश्चर्य और सुकून दोनों मिलता है। हैरो गेट में दूसरे भारतीय दंपति के घर जब पहुँची तो सकारात्मक वातावरण देख दंग रह गई। पति-पत्नी दोनों प्रोफेसर थे उस दिन छुट्टी लिए थे दो बच्चे थे बच्चों की दादी थी वृद्धा बताई कि किस तरह से लंदन में रहने के लिए बेटा बहू दोनों ने मिलकर उन्हें कदम-कदम पर साथ देकर आत्मविश्वास जगाया, हर चीज सिखाया। घर के बच्चे भी दादी से फ्रेंडली जुड़े थे। सतीश की माँ की आंतरिक खुशी चेहरे से झलकता था 60 वर्ष की दादी जवान लग रही थी सच में परिवार में यदि सुख शांति और अपनापन रहे तो देश क्या विदेश क्या!
(11) “आवेश” इस कहानी में जो समस्या है वह केवल इस कहानी तक ही सीमित नहीं बल्कि नब्बे प्रतिशत घरों की यही समस्या है। इस कहानी की पात्रा रमा के व्यवहार से परिवार के सभी सदस्य पीड़ित है। रमा को एहसास ही नहीं है कि वह अपने आदत और व्यवहार से सबको कितना अपमान कर रही है। पति और सास सभी को हमेशा परेशान करती है। तब भी ससुराल के लोग सब कुछ चुप चाप सहते है। रमा को कुछ नही कहते है। ज्यादा समय रमा मायके मे हीं बिताती है। वहीं दूसरी ओर रमा की बड़ी बहन अपने ससुराल में प्रसन्न रहती है। मायके के तरफ ध्यान नहीं देती है। तो रमा के माता-पिता बात बात पर ये कहते है कि रमा के ससुराल वाले अच्छे नहीं है। मेरी बड़ी बेटी के ससुराल वाले अच्छे है। यह कहकर रमा को भ्रमित करते हैं। यह नहीं समझाते है कि देखो तुम्हारी बड़ी बहन अपना व्यवहार ठीक से रखती है तो ससुराल में सब के हृदय में बसी हुई है। रमा को देर से ही सही यदि आत्मज्ञान नहीं होता तो उसका घर तो बिखर ही गया था। जब रमा को एहसास हुआ तो वह अपने पति सास ससुर से माफी माँग ली और सभी हृदय से उसे अपना लिए। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हर माता पिता को अपनी बेटी को सही संस्कार देकर उचित राह दिखाना चाहिए ना कि भ्रमित करना चाहिए।
(12) “सुनामी” डॉक्टर शेफालिका वर्मा द्वारा जी द्वारा लिखित पुस्तक मोह पाश की अंतिम कहानी सुनामी है। सच में आदरणीया दीदी ने इस कहानी में भावों की सुनामी लादी है। इस कहानी के पात्र सुरेश बहुत खुश है पूर्णा जैसी प्रेम करने वाली पत्नी और 4 साल का उज्जवल जैसा बेटा को पाकर अपने आप को सबसे धनवान व्यक्ति समझता है।
पहली बार दोनों को लेकर सुरेश घूमने लाया है लेकिन समुद्र के तट पर 2 मिनट नहीं लगा समुद्री सुनामी को पूर्णा और उज्जवल को बहा कर ले जाने में। तट पर सुरेश बिछुड़न के बिछोह में मृतवत् खड़ा है । यही तो प्रकृति का चक्र है।जिसका डोर विधाता के हाथ में होता है कब किसे राजा से रंक और रंक से राजा बना दे किसी को नहीं पता होता इस कहानी के आदि और अंत के बीच भावों के संगम ने हृदय को भाव विह्वल कर दिया।
नमन दीदी! भगवान हमेशा आपको स्वस्थ रखे और आपके साहित्य खजाना से ऐसे ही अनमोल रत्न पढ़ने को मिलता रहे।
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