दिलीप कुमार
‘यूँ ही बेसबब ना फिरा करो’

‘परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता’।
और सचमुच अब दुनिया के आइने में बशीर बद्र साहब का चेहरा नहीं दिखेगा। करीब दो दशक पहले की बात है। उन्हीं दिनों साहित्य/उर्दू अदब की तरफ मेरा झुकाव शुरू हुआ था। मेरे शहर बलरामपुर में एक कवि सम्मेलन/मुशायरा था। उन दिनों बशीर बद्र साहब मुशायरों के सुपर स्टार माने जाते थे। उनकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि बैनर/पोस्टर पर उनका नाम आते ही भीड़ जुट जाया करती थी। दिसंबर की ठंड में भी पूरा परेड ग्राउंड खचाखच भरा हुआ था। मुशायरे का संचालन सुप्रसिद्ध कवि कैलाश गौतम साहब कर रहे थे। मगर इंतजाम के सर्वेसर्वा पुलिस अधिकारी एवं साहित्यकार श्रीपति मिश्र जी कर रहे थे।
मुशायरा बहुत देर तक चलता रहा। उन दिनों उनकी नज्म
‘यूँ ही बेसबब ना फिरा करो,
किसी शाम घर भी रहा करो’
धूम मचाये हुए थी। जगजीत सिंह के कई एल्बम उनके साथ आ चुके थे। मुशायरा चलता रहा। बशीर साहब की लरजती आवाज सुनने के लिए मेरा इंतजार लंबा होता जा रहा था। मैंने मंच के पीछे जाकर श्रीपति मिश्र जी को एक पर्ची दी और उनसे बशीर बद्र साहब तक पहुंचाने का अनुरोध किया। पर्ची पढ़कर मिश्र जी ने कहा ‘बहुत बढ़िया चुना है आपने। बशीर साहब इसे बहुत अच्छा सुनाते हैं’ यह कहते हुए उन्होंने वह पर्ची रख ली।

मुशायरा आधी रात तक कामयाबी से चला। बशीर साहब सबसे बाद में माईक पर आये। उन्होंने मेरी भेजी हुई पर्ची पर मेरी द्वारा भेजी गयी मेरी पसंदीदा नज्म ‘यूँ ही बेसबब ना फिरा करो’ नहीं सुनायी। सिर्फ दो तीन शेर सुनाये। क्योंकि तब तक मंच पर लिफ़ाफ़ा वितरण (मानदेय) का कार्यक्रम शुरू हो गया था। जिससे वहाँ पर थोड़ी अफरा-तफरी और तल्खी का माहौल बन गया था।
मैं बाद में उनकी गाड़ी के पास गया जब वह मंच से होटल जा रहे थे। उनसे मैंने थोड़ी बातें की और वह सवाल पूछ ही लिया जो सवाल उनसे उन दिनों अक्सर पूछा जाता था कि क्या उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी जी के बारे में जो कहा है वो सच है या अफवाह।
उन्होंने प्यार से कहा ‘देखो, मैंने एक अच्छे आदमी को वोट देने की अपील की है। अब तुम बताओ बेटे कि अटल जी अच्छे आदमी नहीं हैं क्या’।
मैं कुछ कहता तब तक मेरे एक परिचित स्थानीय कवि ने बात काटते हुए कहा ‘रात बहुत हो गयी है। बशीर साहब बहुत थक गए हैं। बाकी बातें कल सुबह तुम आकर होटल में कर लेना’ यह कहकर उन्होंने अपनी फियेट कार को गियर में डाल दिया। कार रेंगने लगी और मैं जब वापस आया तो साइकिल स्टैंड में सिर्फ मेरी साइकिल बची थी। सब जा चुके थे। मैं उस सुनसान रात में अपनी साइकिल लेकर घर लौटने लगा तो रास्ते में बशीर साहब की नज्म गुनगुना रहा था-
‘यूँ ही बेसबब ना फिरा करो,
किसी शाम घर भी रहा करो।’
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम को तरस नहीं आता बस्तियाँ जलाने में
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हें ही बताओ ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है?
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
उदास शामों में किसी की याद आती है
बशीर, अब तो कोई भी हमारे पास नहीं रहता
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
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