बाज़ारवाद का बढ़ता दबाव

सुप्रसिद्ध कवि श्री हरिवंश राय बच्चन ने क्या खूब कहा है ‘बेचने वाले हवा भी बेच देते हैं गुब्बारों में भरकर’। जी हाँ बाज़ारवाद का ज़माना है। हर वस्तु पर पैसा भारी है। कहते हैं अब तो शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालय और मरीजों का उपचार करने वाले अस्पताल भी इससे अछूते नहीं रहे।

किसी नामी विद्यालय में बच्चों को नर्सरी में एडमिशन दिलवाना है तो अच्छा खासा डोनेशन दो, बस, हो गया एडमिशन। डॉक्टरों को भारी भरकम फीस, इसपर महंगी दवाइयाँ यानी यदि आप अच्छा खासा पैसा खर्च करने को तैयार हैं तो आपको अस्पताल में भी वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा।

क्रिकेट, हॉकी सभी के अच्छे खिलाड़ियों को पैसा देकर खरीदा जा सकता है और फिर उन टीमों की हार जीत पर लाखों रुपए की शर्त लगाई जा सकती है। सरकारी दफ्तरों में अभी भी रिश्वत देकर काम निकलवाया जाता है।

अब तो साहित्य, जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है। अच्छा साहित्य एवं अच्छे लेखेकों को नज़रअन्दाज़ कर जिनका बड़ा नाम और दाम है उन्हें ही मंचों पर बुलाया जाता है जो कवि सम्मेलनों में लाखों रुपये का भुगतान लेते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में देश प्रेम और राष्ट्रवादी रचनाओं से भारतीयों में जोश भरने वाले अनेक लेखक जेल भेजे गए। अंग्रेजों के खिलाफ़ लिखने वाले अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद करवा दिया गया, लेकिन वह रुके नहीं देश प्रेम से ओतप्रोत रचनाओं से भारतीयों का मनोबल बढ़ाते रहे क्योंकि तब बाज़ारवाद हावी नहीं था। लेखकों ने अपनी लेखनी को किसी दबाव में आकर बेचा नहीं। लेखकों ने पैसे और बाज़ार से अधिक आज़ादी को महत्व दिया। तभी तो ‘सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं’ जैसे जोशीले गीतों ने आज़ादी की लड़ाई को आज़ादी पाने तक रुकने नहीं दिया।

लेखक अब रचनात्मक कलाकार के स्थान पर ‘व्यावसायिक उत्पादक’ बन गए हैं। साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन अब उनकी गुणवत्ता से नहीं अपितु बिक्री की संख्या से किया जाता है। पैसा लेकर प्रकाशक कुछ भी छापने को तैयार रहते हैं।

इसी बाज़ारवाद के कारण अच्छा साहित्य एवं उच्चकोटि के लेखक कहीं गुमनामी के अंधेरों में गुम होते जा रहे हैं तथा सोशल मीडिया एवं साहित्यिक गोष्ठियों में अपनी अधिक सक्रियता दिखाने वाले लेखकों का मान सम्मान किया जा रहा है। कवि सम्मेलनों एवं पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम बड़े बड़े वातानुकूलित सभागारों में आयोजित किए जाते हैं।

आजकल तो कवि मंचों पर कुर्तों से मैचिंग चटक रंगों के डिज़ाइनर जैकेटों में काव्य पाठ करते नज़र आते हैं। यानी कभी सादे लिबास में मंच पर पाठ करने वाले कवि एवं कवित्रियाँ अब सज-धजकर समारोह में हिस्सा लेते हैं इसे बाज़ारवाद नहीं तो और क्या कहेंगे।

एक अच्छा साहित्य किसी भी सम्मान का मोहताज नहीं होता। महाकवि तुलसीदास, सूरदास, मुंशी प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा जैसे हिन्दी साहित्य के शीर्षस्थ लेखक एवं लेखिकाएँ अपनी उत्कृष्ठ रचनाओं के माध्यम से आज भी पाठकों के दिलों में बसते हैं। उनके जीवनकाल में उन्हें कोई सम्मान चाहे न मिला हो परंतु उनकी रचनाएँ आज भी पढ़ी जाती हैं एवं अमर हो चुकी हैं। यही है वास्तविक सृजन, जो उन दिनों बाज़ारवाद से कोसों दूर था।

आज उनकी महान रचनाओं को नया कलेवर दे प्रकाशक लाखों रूप ये कमा रहे हैं। प्रकाशक बाज़ार की माँग के अनुसार लेखकों को लिखने के लिए कहते हैं। आजकल तो नवतकनीक के सहारे लेखक खूब प्रसिद्धि पा रहे हैं। जो सोशल मीडिया पर निरंतर सक्रिय हैं उसे ही लोग एक सफल लेखक मान लेते हैं। अब तो नई पीढ़ी के कुछ कवि कविता स्वयं न लिखकर ए आई से कविताएँ  लिखवाने लगे हैं जिसमें वह अपनी बुद्धि के स्थान पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग कर वाह-वाही लूट रहे हैं।

लगता है इस बाज़ारवाद के शोर में वास्तविक साहित्य कहीं खो सा गया है। यह कथन भी सत्य है यदि समाज में संवेदनशीलता को जिंदा रखना है तो उच्च स्तरीय साहित्य का सृजन भी अपेक्षित है।

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