माँ प्यारी माँ!
तुम मेरी प्रथम
पाठशाला हो
तुम्हीं मेरी आदर्श हो
तुम्हीं मेरी गुरू हो
सब कुछ तो मैने
तुम्हीं से सीखा है
कहते हैं कि
प्रथमस्थ बहुत महत्वपूर्ण होते हैं
जैसे- ज्ञान,
कर्म,
प्रतिस्पर्धा,
प्रीत,
मिलन,
सब कुछ … … … …
जिन्हें हम चाहें तो भी
नहीं भूल सकते
सत्य ही तो है
मैं भी कहाँ भूली हूँ
तुम्हारी सिखाई कोई भी बात,
चाहूँ तो भी नही
तपस्या,
त्याग,
बलिदान,
परोपकार,
सृजन,
पोषण,
संघर्ष,
घृणा
और … …. … और
तिरस्कार सहन करना
सब कुछ बड़े जतन से
मुझे तुमने सिखा दिया है माँ।
इतना ही नहीं,
तिल-तिल कर मरना भी
बखूबी सिखा दिया तुमने माँ!
काश !!!!!!!!!!!!!!!
तुमने मुझे अपने लिए भी
जीना सिखाया होता!
अपने अपमान,
तिरस्कार
और शोषण का
बदला लेना सिखाया होता!
किसी का परित्याग कर
जीना सिखाया होता!
तो शायद
हमें कभी परित्यक्ता,
डायन,
अभागी,
अपशकुनी की उपाधि से
विभूषित नहीं होना पड़ता।
तुम ऐसी क्यों हो माँ????????
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