2019 में सुदामा देवी के साथ एक पत्रकार का साक्षात्कार समाचार पत्र में पढ़ी तो मैं भाव विह्वल हो गई और संग-संग ग्लानि भी हुई थी। ग्लानि इसलिए कि स्वतंत्रता संग्राम में सर्वस्व समर्पण करने वाली सुदामा देवी के बारे में मुझे कुछ ज्ञात नहीं था।
बेनीपट्टी क्षेत्र के पाली गाँव के रहने वाली सुदामा देवी जी की शादी बहुत कम उम्र में ही 1940 ईस्वी में हो गई थी। उनकी शादी भागलपुर के सोनबरसा गाँव के रहने वाले लड्डू कंवर जी के साथ हुई थी। शादी से पहले उन्हें ज्ञात नहीं था कि उनके पति एक सच्चे देशभक्त और क्रांतिकारी थे। शादी के बाद जब पता चला तो इन्होंने भी दिल से अपने पति का साथ दिया। लेकिन काल ने शादी के 2 वर्ष बाद ही इनसे इनके पति का साथ छीन लिया। 1942 में इनके पति शहीद हो गए। जब उनका शव सोनबरसा गाँव में आया, सुदामा देवी के ससुराल वालों ने अंग्रेजी यातना के डर से शव को पहचानने से इंकार कर दिया।।
तब सुदामा देवी ने रात के अंधेरे में छुपते छुपाते किसी तरह अपने मायके पाली गाँव में आकर कुश का पुतला बनाकर के अपने पति का दाह-संस्कार किया। तब से आज तक अपने पति के अमर प्रेम की ज्योति जला कर हमारी स्वतंत्रता यज्ञ में भाग ले रही है। शत-शत नमन। हे! मिथिला की बेटी तुझे दिल से नमन। जब पत्रकार ने उनसे उनकी अंतिम इच्छा पूछा, तब मुस्कुराती हुई बोली “बस कहीं से मेरे पति का एक तस्वीर ला दो।” मेरी आँखें नम हो गई। सफेद साड़ी पहनी सुदामा देवी ऐसी लग रही थी जैसे हिमालय बर्फ की चादर लपेटे अडिग बैठा हो। उनकी झील-सी दोनों आँखें वेदना की अथाह सागर-सी, बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह रही थी।
यह छोटा सा प्रयास है उनकी वेदना अपनी कविता के माध्यम से कुछ हद तक व्यक्त कर सकूँ। इनकी वेदना को थाह पाना किसी भी लेखक या लेखिका की बस की बात नहीं है।
हिम सम पहनी श्वेत वसन
श्वेत केश मुकुट हिमालय-सा
श्याम रंग गोल मुख झील नयन
मुख पर तेज जैसे तपोवन
नब्बे वर्ष की यह नारी
कितनी मौसम से गुजर
कर पवन थपेड़े सहकर
खुद पतझड़ बनकर
खींचती रही जीवन गाड़ी
पर हिला सका ना तेरा सहन
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
सह-सह कर, लू की थपेड़ों को
बिजली पानी अंधेरों को
पति प्रेम से मजबूत जड़
हिमालय-सा अडिग अविचल
रहने को खाई कसम
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
सुन प्रश्न पत्रकार का
नीर नयन छलका प्यार का
भाव की अथाह सागर में
प्रेम की स्थिर गागर में
प्रश्न कंकड़ बन तरंगित हुआ
गोल-गोल घूमते हुए
स्नेह रस नयन से छलकित हुआ
हे! धैर्य की मूरत पतिव्रता
देख तुझे पत्थर भी जाए पिघल
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।।
मैंने तो देश हित सर्वस्व दान किया
सुहाग सिन्दूर संग पति भी बलिदान किया
उनकी स्वतंत्रता दीप में तेल डाल कर
भारत माँ को प्रकाश दिया
पति प्रेम पतवारों से ही जीवन नैया पार किया
हर पल हर क्षण उनको ही याद किया
अंतिम इच्छा पूरी कर दो
पति का एक तस्वीर दे दो
भाव विह्वल पत्रकार हुआ
पवित्र प्रेम से जब साक्षात्कार हुआ
धन्य-धन्य मिथिला की यह बहन
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
कुल नौ वर्ष की थी जब शादी रचा
ग्यारह की थी जब डोली सजा।।
मैं गुड़िया-गुड़िया खेल रही थी
डिब्बों की बना रेल रही थी
माँ ने अचानक आकर खिलौना छीन लिया
दादी ने आकर चुम लिया।।
बंद थी अब चार दीवारी में
मन लगा रही थी दुनियादारी में।।
पर कभी खिड़की से कभी दरवाजों से
कभी सखियों की आवाजों से
बहक उठता यह चंचल मन
हिमसम पहनी श्वेत वसन।।
दादी कहती अब तू है पराया धन
खेलकूद से हटा अपना मन
जाना है तुझे ससुराल अपने
पति से जुड़े सब तेरे सपने।।
हवाओं में शादी की नशा छाई थी
घर आंगन में रौनक आई थी।।
गांठ बांधना था अब दादी का कथन
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
बढ़ई मस्त था बनाने में कुर्सी पलंग
आँगन में सजा था मसलंग।।
रंग-बिरंगी पसरी चरौरी फुल क्यारी-सी
शादी जोड़ा संग चूड़ी लगी प्यारी-सी
हो गई शादी बज गई शहनाई
मातु नयन में नीर भर आई।।
चल दी मै अपने स्वामी संग
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
आया गौना का दिन, उठा लिया डोली कहार
सगा संबंधी छूट गया सखियों का प्यार।।
डोली आगे बढ़ती गई
बचपन पीछे छूटता गया
गली चौराहों से नाता टूटता गया
डोली जब रखा ससुर जी के द्वार
मेरी दशा थी जैसे पेड़ लेटा जड़ ऊखार।।
डोली को घेरी थी अनेक नारी
पहनी रंग बिरंगी साड़ी
इस रंगीन मेला में
मन रो रहा था अकेला में।।
कोई चेहरा पहचाना नहीं था
कोई जन जाना नहीं था।।
जब उंगली पकड़ पति चले
एक सुकून-सा एहसास मिले।।
मन सुगंधित हुआ जैसे चंदन
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
उनके साथ कदम-कदम चलती गई
नवदुनिया में ढ़लती गई।।
मन में नई दुनिया बसा ली थी
सासु की मैं लाड़ली थी।।
काली जुल्फों बीच उनकी मुस्की
मानो अंधेरों में बिजली चमकी।।
मैं भी प्रेम संकेत समझने लगी थी
हृदय से बातें करने लगी थी।।
सोलह श्रृंगार कर घर सजाई थी
पति की राह में आँखें बिछाई थी।।
पर किस्मत को यह मंजूर नहीं था
काल खड़ा दूर नहीं था।।
अचानक दुनिया गई बदल
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
अचानक शोरगुल हुआ
सुनने को मन कौतूहल हुआ।।
भर नयन पति को देख ना पाई थी
प्रेम प्रवाह में बहने को हुई तो लाश घर आई थी।।
उड़ान भरने ही वाली थी
कि रोक दिया काल बेरहम।।
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
मुझे ज्ञात नही था, क्या थे मेरे नाथ
ज्ञात हुआ तो मैं हुई सनाथ।।
उस समय अंग्रेजी बोलबाला था
भयग्रस्त मुँह पर ताला था।।
जब आया था पार्थिव शरीर
अंग्रेजी फौजों की भीड़
नि:शब्द शेर ऐसे सोया था
हृदय में तूफान लिए पत्थर भी रोया था
शूल शूल सी चीरती कलेजा को
जननी छाती में दूध हिलकोरा था
वेदना तूफानों की दाब ने
जनक को भी झिकझोरा था।।
देख ऐसी भीषण विपदा
रात भी गई थी थम
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
लाश पहचानने से किया इनकार
ताकि क्रूर शासन की क्रूरता से
बच जाए समस्त परिवार
एक कांपती हाथ ने सिन्दूर पोंछा
दो हाथों ने चूड़ी तोड़ी
जीवन गाड़ी की धूरी टूटी
चढ़ा दिया लकड़ी की गाड़ी में
बिठा दिया सफेद साड़ी में।।
काजल से भी गाढ़ी काली रातों में
सन-सन करती बातों में।।
चर-चर करती गाड़ी की चरराटों में
सुनसान सन्नाटों में।।
सुदामा चली नैहर धाम
जहाँ करना था तेरहवीं का काम
काल की बिडंबना देखो
अभी गई थी बहारों संग
नौकर चाकर कहारों संग।।
रंग भरी पालकी सजी थी
हीरे मोती सोने जड़ी थी।।
आ रही है रंग हीन
श्वेत वस्त्र में पति विहीन।।
भाग्य ने लिया सब कुछ छीन।।
काल टूटा बनके कहर।।
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
कुश पुतला को मुखाग्नि दे जलाई थी
आजीवन स्वतंत्रता दीप जलाने की कसम खाई थी।।
हे प्राणनाथ! मै धन्य हुई
जो तुम्हारा साथ पाई थी।।
धन्य धन्य वो स्त्री जो जन्म दिया
वह तेरी माई थी ।।
सुदामा तेरी है तेरी ही रहेगी
तुम्हारे त्याग की कीर्ति पताका फहराती रहेगी।।
अंतिम प्रणाम संग यह मेरा वचन
हिम सम पहनी श्वेत वसन।।
