प्रथम नमन गुरु आपको, दिया आपने ज्ञान
कैसे मिल पाते हमें, परम दिव्य भगवान।”
गुरु हमारे जीवन में दीपक की तरह होते हैं, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। कदम कदम पर हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमारी गलतियों को कभी प्यार से कभी फटकार से सुधारना चाहते हैं। एक अच्छा गुरु अपने शिष्य के लिए भगवान की तरह होता है। जैसे परमात्मा कभी भी किसी इंसान का बुरा नहीं चाहते परंतु अगर वह गलती करता है तो सजा अवश्य देते हैं। ताकि वह भविष्य में दोबारा वही गलती ना कर सके। इसी प्रकार से गुरु कुम्हार की तरह बाहर से चोट करते हुए अंदर से प्यार से सहलाते हैं। हमारे कोमल मन को बखूबी जानते हैं।
गुरु कोई भी हो सकता है, जैसे बचपन में माता-पिता या यूँ कहूँ तो प्रथम गुरु माता ही होती है जो बिना कहे ही हमारी सब बात को जानती है। हमें बोलना सिखाती है, चलना सिखाती है उंगली पकड़कर क ख ग घ लिखना सिखाती है और अगर बच्चा बार-बार वही गलती करता है तो कसकर एक थप्पड़ भी लगाती है, क्योंकि वह बच्चे को सुधारना चाहती है। इसका मतलब यह नहीं की वह बच्चे से प्यार नहीं करती, दुलार नहीं करती कभी-कभी तो बच्चे को सजा देकर चुपके-चुपके रोती है। सच तो यह है कि इंसान के जीवन में संस्कारों को कोई रोपता है तो वह माँ है।
माता की बाद गुरु का सर्वोपरि स्थान है। प्राचीन काल से ही गुरुओं का महत्व रहा है बड़े-बड़े गुरुकुलों में बहुत सख्ती से नियम कायदों से अनुसाशन पालन करना सिखाया जाता था ताकि बड़े होकर बच्चे होनहार बने, उनमें पूर्ण रूप से संस्कार संस्कारित हो सकें। समय पर उठना ,समय पर जागना, अध्ययन करना, यथा उचित बड़ों का स्वागत सत्कार करना, सम्मान करना, छोटों को क्षमा करना यह सब उन्हें बचपन से सिखाया जाता था। किसी भी मुसीबत में धीरज धारण करना यह गुरुजी सिखाते थे।
जितनी ज्यादा श्रद्धा, जितना समर्पण, जितना त्याग, जिस इंसान में जितना ज्यादा होता है वह इंसान उतना ज्यादा तरक्की करता है। क्योंकि गुरुओं का आशीर्वाद, सच्चा आशीर्वाद जिसको एक बार मिल जाता है उसका कोई बाल बांका भी नहीं कर सकता। वह जो चाहता है वह पा लेता है। यह बात हर जगह ही लागू होती है, जीवन में जिससे भी, जहाँ से भी, जो कुछ मिले, जो लोग हमारे जीवन को बनाते हैं, हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमारी गलतियों को बताते हैं, हमें कुछ भी सिखाते हैं मेरा मानना है वो सब हमारे गुरु हैं। हमें उनका बहुत सम्मान करना चाहिए।
एक और सबसे बड़ी बात जो मैं कहना चाहती हूँ यह है कि आपने देखा होगा कि हम अपने हर काम को शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। हे प्रभु हमारा यह काम आप ही ठीक करवा सकते हैं इसका मतलब जो परम गुरु है वह परम सत्य है परमेश्वर है, वह परमात्मा जिसने संपूर्ण जगत को बनाया है सृष्टि के कण-कण को जानता है। अर्थात मैं कहना चाहती हूँ कि हम परम सत्ता के समक्ष सत्य को कबूल करते हुए वह आचरण करें जो हमारी आत्मा हमें आदेशित करे। कभी-कभी आत्मा भी हमारा परम गुरु होती है। जितना ज्यादा सच्चा जिसका मन होता है उतना ही उसकी आत्मा उसे दिशा निर्देश देती है। जब आत्मा पर झूठ का लेप परत-दर-परत चढ़ जाता है। जो व्यक्ति अपने अभिमान स्वरूप या स्वार्थ स्वरूप अपनी आत्मा की अनदेखी करता है फिर आत्मा भी उसे दिशा निर्देश देना बंद कर देती है और यहीं से इंसान का पतन शुरू होता है अतः हमारी आत्मा, हमारा परमात्मा हमारे गुरुजन जो हमारा केवल हित चाहते हैं हम उनका आदर करें। उनकी बातों को वजन दें।
कई बार ऐसा भी देखा गया है कि व्यक्ति अपने आप को अपने बड़ों से ज्यादा बड़ा समझने लगता है फिर भला कोई गुरु कैसे उसे समझा सकता है जिस व्यक्ति में पात्रता ही नहीं है उसके पात्र में कौन कुछ देना चाहेगा। कुछ लेने के लिए विनम्र होना पड़ता है। गुरुओं के सामने जो व्यक्ति, जो शिष्य जितने ज्यादा विनम्र होते हैं जितनी ज्यादा श्रद्धा होती है उतना ही ज्यादा खुद-ब-खुद उनको उनका सानिध्य मिलता है, उनका आशीर्वाद मिलता है, उनसे ज्ञान मिलता है। और फिर जिस को ज्ञान मिल जाए फिर उसको पहचान मिलती है।
एक सच्चे साधक के रूप में कभी-कभी आपने सुना होगा लोग कहते हैं आपकी जिह्वा पर तो माँ सरस्वती का वास है। लोग ऐसे ही नहीं कहते क्योंकि उसकी जुबान में, उसकी वाणी में, वह ताकत आ जाती है कि वह जो कुछ भी कहता है लोग उसे सत्य समझते हैं। लोगों को उसे सुनना अच्छा लगता है, लोग उसे प्यार करते हैं, लोग उसकी बात पर विश्वास करते हैं। इसका अभिप्राय उसने जीवन में अपने बड़ों से बहुत कुछ सीखा है। उसके अंदर सरलता, सरसता और विनम्रता, त्याग और समर्पण, प्रेम और करुणा, दया और क्षमा भावना सभी गुण विद्यमान है। ये सभी गुण परम पिता के आशीर्वाद से जो कि हम सबका परम गुरु है, आते हैं।
दोस्तों हमारे दैनिक जीवन में बहुत सारे गुरु होते हैं। हर चीज के लिए हमें गुरु चाहिए अगर हमें संगीत सीखना है, तैराकी सीखनी है, प्लेन उड़ाना है गाड़ी चलानी है, कार सीखनी है, यहाँ तक की खेलकूद में अगर हमारी रुचि है हमें खिलाड़ी बनना है, तब भी हमें कोच की जरूरत होती है। जो व्यक्ति जितना ज्यादा अपने गुरुजनों की आज्ञा का पालन करता है, उनके प्रति श्रद्धा रखता है, विश्वास रखता है, उतना ज्यादा है सीख पाता है। कहने का तात्पर्य यह यह कि गुरु और शिष्य का संबंध बहुत ही पवित्र संबंध है। लेकिन आज मुझे अफसोस है कि गुरु के नाम पर आडंबर धोखेबाजी और धोखाधड़ी हो रही है। गुरडमवाद अपने इस चरम पर पहुँच चुका है की पैसे के बलबूते पर गुरुओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित कर लिए हैं और भोली-भाली जनता उनके चंगुल में फंसती चली जाती है। साथियों मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहती हूँ कि हमें बहुत सोच समझ कर अपने गुरु को चुनना है, परखना है, और अपने अंतर चक्षुओं को खुला रखना है।
“गुरुवर तेरे ऋण बहुत, चुका न पाऊं मोल
कोटि कोटि वंदन करूं, गुरु तुम हो अनमोल।”
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