नेतागण चिंतित बहुत, कैसे सुधरे देश।
जनता-चिंता में वे खुद, बदल रहे परिवेश।।
बदल रहे परिवेश, बहुत चिंतित रहते हैं।
देश की चिंता में रातों-दिन, ये मरते हैं।।
रातों-दिन मरते हैं, देश को लूटूँ कैसे।
चूस रहे हैं जनता को ये, मच्छर जैसे।।
मच्छर जैसे चूस “आम” से, “खास” हो जाते।
जनता सुविधा रहित, ये सब सुविधाएँ पाते।।
सब सुविधाएँ पाकर भी, अतृप्त रह जाते।
सात दशक से चूस रहे, पर नहीं अघाते।।
नहीं अघाते इसीलिए, चिंता हो आयी।
दिखने लगी किसानों की, हालत दुखदायी।
हालत दुःखदायी भी, राजनीति से आती।
यह पीड़ा जनता-किसान को, बहुत सताती।।
बहुत सताती पीड़ा, जन-किसान हैं चिंतित।
सरकारों ने शुरू से रखा, इन्हें अकिंचित।।
कह अखिलेश्वर, ऐसे कैसे देश चलेगा।
राजनीति नहीं सुधरी तो, फिर देश जलेगा।।
