छोड़ दो मुझको अकेला

छोड़ दो मुझको अकेला
जो भी होगा झेल लूँगा।
जो भी चट्टानें मिलेंगी
मैं अकेले ठेल लूँगा।।

आज मेरे साथ हो पर

अखिलेश्वर मिश्र
सेवानिवृत्त उपाचार्य
बेतिया, बिहार


कल मुझे तुम छोड़ दोगे।
कैसे झेलूँगा बताओ
जब दिशा ही मोड़ दोगे?

क्या भरोसा आदमी का
कब अकेला छोड़ देगा।
स्वार्थवश होकर हमारा
प्रेमबंधन तोड़ देगा।।

दे के कुछ झूठे सहारे
मत करो आबाद मुझको।
छोड़कर मँझधार में तुम
मत करो बर्बाद मुझको।।

हौसलों का साथ है तो
रास्ते खुद ही मिलेंगे।
साथ में विश्वास भी है
फूल तो एक दिन खिलेंगे।।

जो अकेले ही निकल कर
रास्ता खुद ही बनाता।
आत्मबल, उत्साह से
निर्भीक होकर लक्ष्य पाता।।

जो समस्याओं से लड़कर
लक्ष्य पाना जानता है।
कुछ नहीं दुर्गम असंभव
है सुगम सब मानता है।।

कभी जो ना हार माने
जीत होती है उसी की।
उसके जीवन में बजेगी
बाँसुरी एक दिन खुशी की।।
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