किन शब्दों से आज
तेरा ऋंगार करूँ माँ!
हर शब्द तुच्छ लगते हैं
इन शब्दों से है तू परे माँ!
नहीं जानती प्रभु मुझे
कैसे दुनिया में लाया?
पर, जब खुली आँखें मेरी
तेरी आँचल में लिपटी थी मेरी काया।
पहला स्पर्श ममता भरा वह
पहला दुलार तेरी हाथों का
स्निग्ध कोमल और हुई मैं
जब मिला लाड़ तेरी हाथों का।
किन आभूषणों से आज
तेरा अलंकार करूँ माँ?
किन शब्दों से आज
तेरा श्रृंगार करूँ माँ?
क्षण-क्षण,पल-पल तू
मेरे हृदय में रहती है
कितनी तपन और कितने कष्ट
मेरे कारण तू सहती है।
बीती तुझ पर जो भी हो
मुझसे न कभी कुछ कहती है।
किन बातों से आज,
तेरा आभार करूँ माँ?
किन शब्दों से आज,
तेरा श्रृंगार करूँ माँ?
दूर भले तुझसे होऊँ मैं
आभास तुझे हो जाता है
कुछ भी ना भले तुझसे कहूँ मैं
एहसास तुझे हो जाता है
मैं अबोध अकिंचन थी
तुमने मुझे सँवार दिया…
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