भारत के स्वतंत्रता संग्राम में दक्षिण भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान

भूमिका
‘बुझी राख मत हमें समझना
हम अंगारों के गोले हैं।
देश आन पर मिटने वाले
हम बारूदी शोले हैं।
आन-बान की रक्षा में हम
हंसकर शीश चढ़ाते हैं।
जिस देश धरा पर जन्म हुआ
हम उसका कर्ज चुकाते हैं।’
ये कोई साधारण कविता की पंक्तियाँ नहीं वरन् हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले उन वीरों के हृदयोद्गार हैं, जिन्होंने हंसते-हंसते अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। आज उन्हीं के बलिदानों के फलस्वरूप हम आज़ादी की खुली हवा में साँस ले रहे हैं और आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहे हैं।
लगातार कई शताब्दियों तक हमारा देश विदेशी ताकतों की गुलामी का शिकार रहा। जो विदेशी कंपनियाँ हमारे देश में व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से आई थीं, उन्होंने यहाँ पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए साम्राज्यों के शासकों को आपस में लड़ाकर एवं उनकी आपसी फूट का लाभ उठाकर उनकी रियासतों पर कब्जा कर लिया। साथ-ही-साथ यहाँ के समस्त प्राकृतिक संसाधनों पर भी कब्जा कर लिया।
धीरे-धीरे हमारे उद्योग-धन्धों, संस्कृति, खान-पान और शिक्षा पद्धति को निम्न स्तर का बताकर अपनी शिक्षा पद्धति को हम पर थोप दिया। हमारी समृद्ध गुरुकुल शिक्षा पद्धति को हीन बताकर लॉर्ड मैकाले ने अपनी अंग्रेजी शिक्षा पद्धति हम पर थोप दी, जिससे उसे अपनी कंपनी के काम के लिए सस्ते क्लर्क मिल सके और दुर्भाग्यवश आज तक हम उस गुलाम मानसिकता में जी रहे हैं। आज भी हमारे देश में अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों को उच्च शिक्षा और प्रशासन में प्राथमिकता दी जाती है और हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है।
हम सब जानते हैं कि हमारे देश की स्वाधीनता के संघर्ष का एक लम्बा और लोमहर्षक इतिहास रहा है। एक ऐसा इतिहास जिसके लाखों नायक और बलिदानी आज भी गुमनामी के अंधेरों में खोए हुए हैं। आजादी के इस समरांगण में जहाँ सशस्त्र क्रान्तिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, वहीं ऐसे अनेक आदिवासी समुदायों के वीरों और महिलाओं ने भी अपने-अपने ढंग से स्वातंत्र्य समर में अपना विशेष योगदान दिया था, जिन्हें इतिहास में वह समुचित सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
जब उत्तर भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था तो दक्षिण भारत में भी हर वर्ग के स्वतंत्रता सेनानी स्थान-स्थान पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मोर्चा ले रहे थे। जब उत्तर भारत में सुखदेव, भगतसिंह और राजगुरु को फांसी पर चढ़ाया गया तो दक्षिण भारत के क्रान्तिकारी वी ओ चिदम्बरम पिल्लई, अल्लूरी सीतारामराजू, रानी किट्टूर चेन्नम्मा, कुंभकोणम बालमणि, रामजी गोंड, वांचीनाथन, सांगोली रायण्णा, भोगराजू पट्टाभि सीतारमैय्या, केटी श्याम, हारदेकर, सिद्धालिंगैया, केसी रेड्डी, रानी वेलु नाच्चियार और मार्तण्ड वर्मा ने स्वाधीनता आन्दोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
इस लेख में हम भारत की पहली महिला क्रान्तिकारी रानी वेल्लु नाच्चियार और राजा मार्तण्ड वर्मा के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करेंगे कि किस तरह से उन्होंने अपने शौर्य के बल पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे और देश के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भारत की पहली महिला क्रान्तिकारी रानी वेलु नाच्चियार
18वीं शताब्दी में शिवगंगा की भारतीय रानी वेलु नाच्चियार बचपन से ही युद्ध कला में निपुण थीं। वे अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने वाली पहली महिला थीं। जब उनके पति को ब्रिटिश सैनिकों ने क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया तभी से रानी वेलु नाच्चियार अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ खड़ी हो गई और युद्ध में शामिल हुईं।
उनका जन्म 3 जनवरी 1730 में रामनाथपुरम् के राजपरिवार में हुआ था। उनके पिता राजा चेल्लावुथ्थु विजयरामगुंडा सेतुपति और माँ रानी सक्कांति मुथुन नाच्चियार थीं। माता-पिता की इकलौती संतान वेलु जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न थीं। राजा ने वेलु का पालन-पोषण बेटे की तरह किया था। वेलु को बचपन से ही हथियार चलाने का शौक था। इसलिए उन्होंने तलवारबाजी, तीरंदाजी, लाठी चलाना और भाला फेंकने जैसी युद्ध कलाओं में महारत हासिल कर ली थी। किशोरावस्था तक आते-आते उन्होंने तमिल, फ्रांसीसी, उर्दू, मलयालम, तेलुगु और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान अर्जित कर लिया था।
कम उम्र में ही महान तमिल ग्रन्थों का अध्ययन करके उन्होंने स्वयं को अपने पिता का योग्य उत्तराधिकारी साबित कर दिया था। सन् 1746 में वेलु नाच्चियार के पिता ने उनका विवाह शिवगंगा के महाराज शशिवर्मा थेवर के बेटे मुत्थु वेदुंगानाथ थेवर के साथ कर दिया।
शिवगंगा के महाराज ने शिवगंगा के जंगलों को साफ करके उन्हें खेती करने लायक बनाया था। इसके अलावा जगह-जगह पर तालाब और रास्ते बनाकर आवागमन के लिए उपयुक्त साधन तैयार करवाए थे। ठीक उसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी दक्षिण भारत में अपने पाँव पसार रही थी। आर्कूट का नवाब कंपनी के आगे आत्मसमर्पण कर चुका था। अब कंपनी की नजर शिवगंगा पर थी।
बदलते हुए राजनीतिक घटनाक्रम के कारण शिवगंगा के राजा ने नवाब को टैक्स का भुगतान करने से मना कर दिया। इससे नाराज़ होकर नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी से उनकी शिकायत कर दी। अंग्रेज तो पहले से ही उपयुक्त अवसर की तलाश में तैयार बैठे थे। नवाब के सहयोग ने उनका काम आसान कर दिया।
कर उगाही का बहाना बनाकर कंपनी ने शिवगंगा पर हमला कर दिया। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। अंग्रेज फौजों ने शिवगंगा में भीषण मारकाट मचा दी। हजारों स्त्रियों-पुरुषों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया।
बचाव का कोई रास्ता न मिलने पर वेलु नाच्चियार ने दुर्ग छोड़ दिया और अपनी बेटी के साथ सुरक्षित स्थान की तलाश में इधर-उधर भटकने लगी। अंग्रेज वेलु नाच्चियार को ढूँढ रहे थे। अपने गिने-चुने अंगरक्षकों के साथ रानी किसी तरह डुंडीगल के निकट वीरुपाक्षी पहुँची। वहाँ का राजा गोपाल नायकर रानी का हितैषी था। उसने रानी को संरक्षण प्रदान किया लेकिन सुरक्षा कारणों से रानी आगे मैसूर चली गई।
उस समय मैसूर का राजा हैदर अली था। रानी ने शिवगंगा से अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए हैदर अली से सहायता मांगी। उन्होंने वेलु नाच्चियार का स्वागत एक रानी की तरह किया। आर्थिक सहायता के साथ-साथ रानी की सहायता के लिए 10,000 पैदल और घुड़सवार सैनिकों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए भेज दिया। इसके बाद वेलु ने उदायल नारी सेना नामक महिला संगठन बनाया। वे बड़े जोर-शोर से सैन्य तैयारियों में जुटी थीं और शिवगंगा से अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए सही समय की तलाश कर रही थी।
शिवगंगा दुर्ग के भीतर देवी राजराजेश्वरी का मंदिर था। उसमें प्रतिवर्ष दशहरे का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। उस एक दिन देवी पूजन के समय स्त्रियाँ बड़ी संख्या में शामिल होती थीं। वेलु नाच्चियार ने इसी का फायदा उठाकर अपनी रणनीति बनाई। मंदिर के पास ही अंग्रेजों का शस्त्र भंडार था।
दशहरे के दिन जैसे ही दुर्ग का द्वार खुला, वैसे ही अपनी सेनापति कोयली के साथ ‘उदायल नारी सेना’ ने दुर्ग में प्रवेश कर लिया। वे सब साधारण वस्त्रों में थी। फलों और फूलों की टोकरियों में उन्होंने अपने हथियार छिपाए हुए थे। अंग्रेज सैनिकों को इसकी भनक तक नहीं लगी। दुर्ग में पहुँचते ही वेलु की महिला ब्रिगेड ने अंग्रेजों के शस्त्रागार को आग के हवाले कर दिया। फिर महारानी ने अंग्रेजों को शिवगंगा से खदेड़ दिया।
अंग्रेज महारानी के युद्ध कौशल को देखकर आश्चर्यचकित थे। वे किला छोड़ कर भाग गए और महारानी ने किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद करीब 10 वर्ष तक उन्होंने शिवगंगा पर राज किया। वे पहली महिला क्रान्तिकारी रानी थी, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी।
वैसे तो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को पहली क्रान्ति माना जाता है लेकिन वेलु नाच्चियार ने उससे पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध और क्रान्ति का बिगुल बजा दिया था। हालाँकि इतिहास में उनके इस साहसिक योगदान को भुला दिया गया लेकिन दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में आज भी रानी वेलु नाच्चियार और उनकी सेनापति कोयली की वीरगाथाएँ लोकप्रिय हैं।
कहा जाता है कि वीरांगना कोयली ने अपने शरीर पर तेल लगाकर आग लगा ली और शस्त्रागार को आग के हवाले कर दिया। वह उस समय की सबसे पहली ऐसी साहसिक क्रान्तिकारी महिला थीं, जिन्होंने मानव बम बनकर शत्रुओं की शक्ति को नष्ट कर दिया था।
राजा मार्तण्ड वर्मा का समुद्री युद्ध कौशल
जिस समय डच सेना को दुनिया में सबसे ताकतवर माना जाता था, उस जमाने में एक भारतीय राजा ने जिनका नाम मार्तंड वर्मा था, उसी डच सेना को युद्ध के मैदान में धूल चटाई थी। 10 अगस्त सन् 1741 का वर्ष भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने पारंपरिक हथियारों से समुद्री युद्ध में पराजित कर दिया था।
उस समय पुर्तगाली और अंग्रेजों की तरह डच कंपनी यूरोप की एक बड़ी ताकत थी। लगभग 50 साल तक उन्होंने दुनिया के व्यापार पर अपना कब्जा जमाए रखा। सन 1602 में डच सरकार ने एक कंपनी बनाई थी जिसे डच ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से जाना जाता था। इसमें 17 शेयर होल्डर थे। जब यह कंपनी बनी तब इसमें लगभग 6.5 मिलियन गिल्डर का इन्वेस्टमेंट किया गया, जो आज के समय में लगभग 100 मिलियन डॉलर जितना माना जाता है। कंपनी के पास एशिया में 21 साल तक व्यापार करने का अधिकार था।
कंपनी इस अधिकार के तहत अपनी सेना बना सकती थी और अपनी तरफ से लड़ाई भी शुरू कर सकती थी। कंपनी दूसरे देशों में अपने उपनिवेश भी बना सकती थी। इस कंपनी की उस समय पुर्तगालियों और अंग्रेजों से भी ज्यादा ताकत थी। उन्होंने एशिया के मसाला व्यापार पर कब्जा कर लिया था।
केरल में काली मिर्च सबसे ज्यादा होती है जिस पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर थी। यह एक ऐसा मसाला था जिसकी पूरी दुनिया में बहुत बड़ी मांग थी। उस जमाने में काली मिर्च सोने से भी ज्यादा कीमती थी। काली मिर्च के खजाने की तलाश यूरोपीय ताकतों को केरल के समुद्र तट तक खींच लाई थी।
उस समय राजा मार्तंड वर्मा त्रावणकोर राज्य की सीमाओं को बढ़ाने में लगे हुए थे। आस-पास के राज्यों को जीतने के बाद उनकी नजर ओडनाड राज्य पर थी, जहाँ पर काली मिर्च की खेती सबसे ज्यादा होती थी। लेकिन ओडनाड के मिर्च व्यापार पर डच कंपनी का एकाधिकार था और राजा मार्तंड वर्मा उसे तोड़ना चाहते थे।
डच गवर्नर ने राजा मार्तंड वर्मा को ओडनाड से दूर रहने के लिए कहा लेकिन राजा मार्तंड वर्मा को यह शर्त मंजूर नहीं थी जिसके बाद डच सेना और त्रावणकोर की सेना में युद्ध छिड़ गया। सन् 1741 की शुरुआत में डच कैप्टन डी. लेनॉय के नेतृत्व में डच सेना कोलाचल पहुँच गई और सन 1741 मई के महीने में युद्ध शुरू हो गया। राजा मार्तंड वर्मा तिरुवत्तार के आदि केशव मंदिर में गए और उन्होंने वहाँ पर विधिवत अपनी तलवार की पूजा करवाई।
कंपनी के पास थे आधुनिक हथियार
डच ईस्ट इंडिया कंपनी के पास उस समय के सबसे आधुनिक हथियार थे। वह कंपनी उस समय दुनिया की सबसे अमीर कंपनी थी। डच कमांडर डी. लिनॉय श्रीलंका से 7 बड़े और कई छोटे युद्ध जहाजों के साथ कोलाचल समुद्री तट पर पहुँच और वहाँ पर अपना शिविर लगाया।
वहाँ से राजा मार्तंड वर्मा की राजधानी पद्मनाभपुरम् सिर्फ 13 किलोमीटर दूर थी। समुद्री जहाजों ने त्रावणकोर की समुद्री सीमा को चारों ओर से घेर लिया। उनकी तोपें लगातार शहर पर बमबारी करने लगी। डच कंपनी ने समुद्र से बहुत से हमले किए और वे लगातार तीन दिन तक शहर में गोले बरसाते रहे। अब राजा मार्तंड वर्मा को यह सोचना था कि उनकी फौज किस तरह से डच सेना के आधुनिक हथियारों का मुकाबला कर पाएगी।

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हिम्मत से जीती लड़ाई
जैसा कि हम सब जानते हैं की लड़ाई हमेशा आधुनिक हथियारों के बल पर नहीं दिमाग और हिम्मत से जीती जाती है। राजा मार्तंड वर्मा ने भी अपने दिमाग से काम लिया। उन्होंने नारियल के पेड़ कटवाए और उन्हें बैल गाड़ियों पर इस तरह लगवा दिया, जैसे कि तोपें लगी हुई है। डच सेना की यह रणनीति थी कि वह पहले समुद्र से तोपों के जरिए गोले बरसाती, उसके बाद धीरे-धीरे आगे बढ़ती थी और खाइयाँ खोदकर किले बनाती थी। इस तरह वे धीरे धीरे वहाँ पर अपनी सत्ता स्थापित कर लेते थे।
लेकिन मार्तंड वर्मा की नकली तोपों के डर से डच सेना आगे नहीं बढ़ी और राजा मार्तंड वर्मा ने अपने 10 हजार सैनिकों के साथ वहाँ पर डेरा डाल दिया। दोनों तरफ से छोटे-छोटे हमले होने लगे। डच कप्तान ने मछुआरों को अपने साथ मिलाने की बहुत कोशिश की, उन्हें पैसों का लालच दिया लेकिन वे अपने राजा से जुड़े रहे और उन्होंने पूरी तरह से त्रावणकोर की सेना का साथ दिया।
राजा मार्तंड वर्मा ने आखिरी लड़ाई के लिए मानसून का वक्त चुना था ताकि डच सेना उसमें फंस जाए और उन्हें श्रीलंका या कोच्चि से कोई भी मदद ना मिल पाए। राजा की सेना ने डच सेना पर जबरदस्त हमला किया और उनके हथियारों के गोदाम को उड़ा दिया। जिसके बाद यूरोप की सबसे ताकतवर कंपनी की सेना ने भारत के एक छोटे से राज्य की सेना के सामने अपने घुटने टेक दिए।
इस महान जीत का श्रेय पूरी तरह से राजा मार्तंड वर्मा को जाता है। राजा मार्तंड वर्मा ने इस जीत की याद में कोलाचल में एक स्मारक भी बनाया। उन्होंने डच कमांडर की हत्या नहीं की बल्कि उसे त्रावणकोर की सेना को आधुनिक बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी। क्योंकि वे जानते थे कि आने वाले समय में दुनिया पर वही राज करेगा जो युद्ध की आधुनिक तकनीक की जानकारी रखता हो।
अपनी इसी दूरदर्शिता के कारण उन्होंने पूरे 29 साल तक त्रावणकोर पर राज किया और अपने उत्तराधिकारियों को एक सुरक्षित शासन सौंपकर अंतिम सांस ली।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि यह सन् 1857 की लड़ाई से बहुत पहले की लड़ाई थी लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
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