वरीय कोना

प्रश्न: मेरी उम्र 55 वर्ष है। सभी बच्चे विवाहित हैं और अपने-अपने पत्नी-बच्चों के साथ रहते हैं। मेरे पति बिहार सरकार में क्लर्क के पद से 2017 में रिटायर हुए हैं। उन्हें पेंशन मिलती है। लेकिन उनका एक महिला से अवैध संबंध है। वे उनसे मंदिर में शादी भी कर चुके हैं। वे अभी भी उस महिला के साथ ही रहते हैं। बच्चों के विरोध और समाज के उपहास का भी उन पर कोई असर नहीं होता है। मैं अकेली गाँव में रहती हूँ। मैं अनपढ़ हूँ। कोई संपत्ति या आय का स्रोत नहीं हैं। पति मुझे खर्चा के लिए पैसे भी नहीं देते हैं। बच्चे कहते हैं, पति से पैसे लूँ। पति के दूसरी शादी का मेरे पास कोई सबूत नहीं है। मैं क्या करूँ? क्या कानूनी तरीके से मैं पति से खर्चा ले सकती हूँ। मेरे पास वकील को देने के लिए फीस भी नहीं है, क्या ऐसे में केस लड़ पाऊँगी? (नीतू कुमारी, बगहा-2, प. चंपारण, बिहार)
आपके प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं इस संबंध में कानूनी प्रावधानों को थोड़ा विस्तार से बता देती हूँ, ताकि अगर किसी अन्य महिला को ऐसी कोई परेशानी हो तो, उन्हें भी उनका समाधान मिल जाए।
खर्चा पाने का अधिकार
खर्च पाने का अधिकार क्या है?
एक सभ्य समाज एक व्यस्क, स्वस्थ और सक्षम पुरुष से यह अपेक्षा करता है वह अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण करें। इस अपेक्षा को कानून भी मान्यता देता है। वर्तमान में चूँकि महिलाएँ भी उपार्जन करने लगी हैं इसलिए कुछ स्थितियों को उनका भी दायित्व कानून द्वारा माना गया है। इसे “भरण पोषण के लिए खर्च” और इंग्लिश में “maintenance” का अधिकार कहते हैं।
खर्चा पाने का अधिकार किस-किसको है? (अर्थात खर्चे की माँग कौन कर सकता है?)
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता यानि सीआरपीसी की धारा 125 चार तरह के संबंध के लिए भरण पोषण की व्यवस्था करता है। ये है: पत्नी, मातापिता, नाबालिग संतान और कुछ परिस्थितियो मे बालिग संतान।
1. ऐसी पत्नी जो अपना खर्चा वहन करने मे सक्षम नहीं है, अपने पति से मेंटेनेन्स ले सकती है। ऐसी पत्नी, जो छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर रही है, या जिसकी आय पति से बहुत कम हो, उसे भी अपना खर्च वहन करने में असक्षम माना जाता है और वह भी इस धारा के तहत पति से खर्चा पाने की हकदार है।
2. ऐसी नाबालिग (minor) संतान जो अपना भरण-पोषण करने के लिए सक्षम नहीं है, को पिता से भरण-पोषण के लिए खर्चा पाने का अधिकार है। इसके लिए शर्त केवल यह है कि संतान नाबालिग हो, उसका वैध या अवैध होना कोई मायने नहीं रखता है।
3. बालिग (major) संतान भी कुछ विशेष स्थिति में पिता से खर्च ले सकती है। अगर कोई बालिग पुत्र शारीरिक या मानसिक असामान्यता या जख्म के कारण अपना खर्च चलाने के लायक नहीं हो, तो वह पिता से यह हक माँग सकता है। यह अधिकार भी वैध या अवैध दोनों तरह के पुत्र को है। लेकिन व्यस्क विवाहिता पुत्री को यह अधिकार नहीं है क्योंकि उसे पति से खर्च पाने का अधिकार होता है।
4. ऐसे माता-पिता जो खुद का खर्च चलाने में सक्षम नहीं है, को भी बेटे से इस कानून के अनुसार खर्च मिल सकता है।
हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 की धारा 18 पत्नी को, धारा 19 विधवा बहू को, और धारा 20 बच्चों और माता-पिता को यह अधिकार देता है।
इसके अलावा भरण-पोषण के खर्चे के लिए कई विशेष कानून भी हैं; जैसे मुस्लिम महिलाओं के लिए 1986 में बना कानून, वरिष्ठ नागरिकों के लिए 2007 में बना कानून, आदि।
खर्च या मेंटेनेंस की माँग किससे किया जा सकता है? यानि कानून द्वारा किसे खर्च देने के लिए बाध्य किया जा सकता है?
अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन पोषण करना हर व्यस्क व्यक्ति का दायित्व होता है और साधन होने के बावजूद अगर वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता है तो कानून द्वारा उससे ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
लेकिन अगर वह व्यक्ति किसी मजबूरी से, या साधन नहीं होने की वजह से, चाहकर भी इनको ठीक से नहीं रख पाता अर्थात उचित मेंटेनेंस नहीं दे पाता हो, तो उसके विरुद्ध मेंटेनेंस का दावा नहीं किया जा सकता है।
नाबालिग से भी यह नहीं माँगा जा सकता है। धारा 125 से लागू होने की दो शर्ते हैं– पहला, पति, पिता या बेटा, जिससे भी क्लेम किया जा रहा हो, वह आर्थिक रूप से सक्षम हो, और दूसरा, वह जानबूझकर खर्चा नहीं देता हो।
मातापिता और अन्य बुजुर्गो को कानून द्वारा क्या अधिकार किए गए है?
सीआरपीसी की धारा 125 माता-पिता को भी बेटे से खर्च पाने का अधिकार देता है। यह बात ध्यान देने की है कि यह धारा मातापिता की परिभाषा मे सौतेले माता या पिता को शामिल नहीं करता है।
लेकिन विभिन्न हाई कोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की उदार व्याख्या करते हुए सौतेली माँ को इस धारा के तहत मेंटेनेंस पाने के लिए अधिकारिणी (entitled) माना है बशर्ते वह विधवा हो, उसकी अपनी कोई संतान नहीं हो और न ही उसकी आय का कोई साधन हो। अगर वह कोई छोटा-मोटा काम कर थोड़ा-बहुत कमा लेती हो तो उसे आय नहीं माना जाएगा।
बुजुर्गो को अपने भरण-पोषण के लिए खर्च पाने का क्या अधिकार है?
मार्च 2011 में सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक नीति घोषित की थी इस नीति के तहत वरिष्ठ नागरिकों को खर्चा पाने सहित कई लाभ दिया गया है। 2007 में पारित “मेंटेनेंस औफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट” के अनुसार मेंटेनेंस पाने का अधिकार ऐसे सभी सीनियर सिटीजन्स को दिया गया है जो अपनी आय (income) या संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है।
इसमे माता-पिता के साथ दादा-दादी, नाना-नानी या अन्य बुजुर्ग भी शामिल है। जिन वरिष्ठ नागरिकों को कोई संतान नहीं है, वह अपने ऐसे संबंधी या किसी ऐसे कानूनी उत्तराधिकारी से खर्चे पाने के लिए हकदार हैं जो उनकी मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति का वारिस होगा ।
हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट की धारा 20 भी बुजुर्ग माता-पिता को खर्च पाने का अधिकार देता है। यह अधिकार वह अपने बेटे-बेटी से, या उनकी संतान से, या अपने कानूनी उत्तराधिकारी से ले सकते हैं, लेकिन खर्चे का दावा किसी नाबालिग के विरुद्ध नहीं किया जा सकता है।
पत्नी को भी अपने पति से खर्चा पाने का अधिकार पाने का क्या अधिकार है?
माता-पिता के अतिरिक्त पत्नी को भी अपने पति से भरण-पोषण के लिए खर्च यानि मेंटेन्स पाने का अधिकार होता है और पति अगर उसे यह अधिकार देने से मना करे तो वह कोर्ट से यह प्रार्थना कर सकती है कि उसके पति से उसे यह दिलवाया जाय।
पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अतिरिक्त सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भी मेंटेनेंस माँग सकती है। हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट की धारा 18 भी पत्नी को यह अधिकार देता है। यह अधिकार पति से अलग रहने वाली पत्नी को भी है।
क्या तलाकशुदा पत्नियों को भी खर्च पाने का अधिकार है?
हाँ, तलाकशुदा पत्नियों को भी यह अधिकार है। “हिंदू मैरिज एक्ट” का सेक्शन 24 तलाकशुदा पत्नी को यह अधिकार देता है। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को “मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट”, 1986 के सेक्शन 3 क द्वारा यह अधिकार दिया गया है।
सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत यह अधिकार हिंदू और मुस्लिम दोनों पत्नियों के लिए है। पत्नियों को तलाक के बाद भी मेंटेनेंस तब तक मिलेगा जब तक कि वह दूसरी शादी नहीं कर लेती।
क्या महिलाएँ मेंटेनेंस केवल पति से माँग सकती है? अर्थात यदि कोई महिला विधवा है, या उसका पति लापता है, या किसी बीमारी या शारीरिक लाचारी के कारण पत्नी और बच्चे का खर्च वहन नहीं कर सकता है, तो क्या पत्नी सास-ससुर से मेंटेनेंस माँग सकती है?
इसका जवाब ‘हाँ’ में है। “हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956” के अनुसार अगर किसी विधवा की अपनी आय, या अपने पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से इतनी आय नहीं हो कि वह अपना खर्च चला सके, और ना ही उसे कोई संतान हो जो कि उसका खर्च चला सके, तो वह अपने ससुर से खर्चा माँग सकती है, बशर्ते ससुर के पास पर्याप्त संपत्ति हो।
क्या लिव इन पार्टनर इसके लिए क्लेम कर सकती है ?
इसके लिए अभी कोई निश्चित नियम नहीं बना है लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टस ने जो रुख अपनाया है उसके अनुसार अगर लीव-इन पार्टनर बहुत दिनों से साथ रह रहे हो, और आसपास के लोग उन्हें पति-पत्नी के रूप में जानते हो, तो ऐसी पार्टनर और बच्चों को मेंटेनेंस का राइट मिल सकता है।
क्या पति को भी पत्नी से मेंटेनेंस मिल सकता है ?
अब भारत में भी हाउस हसबैंड का चलन शुरु हो गया है। महिलाएँ भी कमाने लगी हैं। इसलिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इस संबंध में अभी तक कोई विशेष कानून नहीं है मगर अदालतों के फैसले को देखते हुए इसका जवाब हाँ में दिया जा सकता है। अगर पत्नी की आय ज्यादा हो और पति किसी कारण से कमाने लायक नहीं हो, तो ऐसी स्थिति में वह पत्नी से खर्चा माँग सकता है। पर अगर वह नौकरी करने या किसी अन्य तरीकों से कमाने के लायक हो, और जानबूझकर काम नहीं करता हो, तो उस स्थिति में उसे पत्नी से मेंटेनेंस पाने का अधिकार नहीं होगा।
बच्चो को अपने मातापिता से मेंटेनेंस का क्या राइट है?
अपने मातापिता और पत्नी के अतिरिक्त अपने बच्चों का उचित देखभाल करना और खर्च देना भी प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक और कानूनी कर्तव्य होता है। सीआरपीसी की धारा 125 पत्नी, बच्चों और माता-पिता को यह अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिए “हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट” की धारा 20 भी मेंटेनन्स का प्रावधान करता है।
मेंटेनेंस कितना मिलता है यानि मेंटेन्स की राशि कितनी होती है ?
कोर्ट मेंटेनेंस के लिए कई चीजों, जैसे कि देने वाले की हैसियत, लेने वाले की हैसियत और जरूरत, दोनों पक्षो के रहन-सहन के स्तर में अंतर, इत्यादि देख कर ही मेंटेनेंस के लिए राशि तय करता है। जैसे कि बच्चों के लिए उसके पढ़ाई-लिखाई, और बुजुर्गों के लिए मेडिकल एक्सपेनसेज आदि को भी ध्यान में रखा जाता है।
यह राशि एक ही बार में, या प्रति महीने दिया जा सकता है। एक बार मेंटेनेंस का अमाउंट कोर्ट द्वारा तय हो जाने के बाद अगर परिस्थिति में बदलाव होता है तो इसमें भी बदलाव किया जा सकता है अर्थात यह अमाउंट घटाया या बढ़ाया जा सकता है। जैसे देने वाले की इनकम अगर बढ़ जाए तो इसे बढ़ाया जा सकता है, और अगर उसकी नौकरी छूट जाए, या अन्य किसी कारण से इंकम नहीं रहे, तो इसे घटाया जा सकता है।
इन कानूनों के तहत मेंटेनेंस पाने के लिए क्या करना चाहिए ?
इसके लिए एक पिटीशन फैमिली कोर्ट में देना चाहिए। इसमें जिस व्यक्ति से आप मेंटेनेंस माँग रहे/रहीं हैं, उसके इनकम और प्रॉपर्टी का डीटेल तथा अपने खर्चे का डीटेल जरूर लिखिए। कोर्ट सुनवाई के बाद मेंटेनेंस की राशि और देने का तरीका तय करता है। जब तक फाइनल डिसीजन नहीं हो जाता तब तक के लिए कोर्ट इनेटेरीम मेंटेनेंस अथवा अन्तरिम खर्च का ऑर्डर दे सकता है। यानि केस चलने के दौरान भी आपको मेंटेनेंस मिल सकता है।
अब आते हैं नीतू जी के प्रश्न पर। नीतू जी, पति से खर्च प्राप्त करने का कानूनी रूप से आपको पूरा अधिकार है। हिन्दू विवाह अधिनियम और भारतीय दण्ड संहिता- दोनों ही एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरे विवाह को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखता है। चूँकि कानून की नजर में दूसरा विवाह वैध नहीं है इसलिए सामान्य परिस्थियों में दूसरी पत्नी को पत्नी को मिलने वाला कोई कानूनी अधिकार भी नहीं होता है। आप वैध रूप से विवाहिता पत्नी है, इसलिए आपको पति पर वह सभी अधिकार हैं जिसे कानून मान्यता देता है। आप बिना किसी हिचक के फैमिली कोर्ट में पिटिशन फ़ाइल कीजिए।
वकील और कोर्ट के फीस की चिंता नहीं कीजिए। सभी कोर्ट में एक ‘कानूनी सहायता केंद्र’ होता है, वहाँ जाकर आवेदन करने पर आपको सरकार की तरफ से वकील मिल जाएगा जिसकी फीस सरकार देगी।
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