मातबर क़लम किसी आईना से कम नहीं होता।
बेलाग चेहरा सत्ता का हमदम नहीं होता॥
शान से रखते हैं लोग पॉकेट में क़लम
पहचान है आलमों की रोब कम नहीं होता॥
न मुल्क फ़रेबी होता नहीं होती है अवाम।
फ़रेबी माहौल हक़ का आलम नहीं होता॥
क़लम के सिपाही कभी बिकते नहीं खबररसॉ
कुछ हैं बिकाऊ आलिम जिसमें दम नहीं होता॥
प्यार महज दिखावा है चलता भय से मजहब।
फतवा जारी बाहर कोई आदम नहीं होता॥
दफ़न हैं हम सभी मजहबी कब्रों में भगवा हरा।
कोई भी आजाद रूहे मौता हम नहीं होता॥
मुंसिफ़ों मुकरर्र करते सजा-ए-मौत जुर्मियों को।
लिख कर तोड़ देते दोषी क़लम नहीं होता॥
शब्दार्थ
· बेलाग- खरा
· मातबर– विश्वस्त
· ख़बररसॉ- सूचना पहुँचने वाला
· चश्मे बेदार– जागती हुई आँख
· मौता- मरे हुए लोग
· हक़ गोई- सच्ची बात करना
