आत्मबल

आज अपने पति के जाने के बाद बिल्कुल टूट गई थी अम्मा। पच्चासी साल की उम्र रही होगी अंकल की, अम्मा उनसे सात साल छोटी थी। पर आज भी वह अपने पति की नई दुल्हन-सी थी। अम्मा से पूछे बिना अंकल किसी को एक पैसा तक न देते। ख़ुद सरकारी नौकरी से सेवानिवृत थे, पर लिखने का एक ऐसा शौक लगा कि पूछो मत, अब तक दस किताबें लिख डाला।
कितना सम्मान, कितना मान लोग देते थे अंकल को। जिनके बच्चे नहीं पढ़ते, वे अंकल के पास उन्हें भेजा करते। अपने घर में भी बच्चों की कमी कहाँ थी। चार बेटा, दो बेटी, और सबों के दो-दो बच्चे। पर मजाल है कोई ऊँची आवाज़ में बोल ले।
बड़ा-सा घर बनाया था अंकल ने। अपने पसंद का सब कुछ लगवाया। किसी से एक पैसे की मदद नहीं लिया कभी। अपने सभी बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। पर बेटे सब निकम्मे निकले। बेटियों को भी पढ़ाया-लिखाया और अच्छे घरों में ब्याह रचाया उनका। बेटियों को हमेशा से अपने माता-पिता से जो भी मिलता उसे प्रसाद समझतीं, भले ही वो डांट ही क्यों न हो। दामाद भी वैसे ही मिले संस्कारों से भरे। अपने माता-पिता से कम नहीं समझते थे अपने सास-ससुर को।
अंकल हमेशा गर्व करते अपनी बेटियों पर, पर बेटों के बारे में कोई पूछता तो मुँह बन जाता। बेटों के लिए कितना ही कर लिए पर शिकायतें कहाँ कम होती। संग बहुओं की भी आवाजें सुनने को मिलती रहती थी। अंकल को अच्छा खासा पेंशन मिल रहा था। उन्हें किसी भी चीज की कमी न थी। चूल्हा भी अलग ही जलता था।
अम्मा अपनी परेशानियाँ किसी से नहीं बताती। शरीर बहुत भारी होने के कारण कमर और घुटने में दर्द रहता ही था।
अब तो आदत-सी हो गई उसे नजरअंदाज करने की। दोनों पति-पत्नी का स्नेह उम्र की अंतिम बेला तक कम नहीं हुआ था। जो भी देखता कहता, एक के जाने के बाद दूसरा जी नहीं पाएगा। पर सब जी लेते हैं। गम खा कर या आँसू पीकर जीना ही पड़ता है।
बच्चों की क्या, अपनी दुनिया, अपनी मुसीबतें कम थी। अपनी अम्मा के पेंशन पर सभी आँख गड़ाए रहते। किसे कितना मिला, उसी पर झगड़ा करना शुरू। माँ ने कुछ खाया कि नहीं? तबियत खराब तो नहीं? इससे कोई लेना-देना नहीं। कोई भाई ज्यादा पूछता भी तो सब संदेह से उसे देखते। आज बिल्कुल अकेली अम्मा बैठी अपने पति की किताबों को समेट रही थी। आँखों से आँसू की धारा निकलती जा रही थी। अचानक कागज का एक टुकड़ा दिखा। अम्मा पढ़ने लगी। उसे पढ़ने के बाद अम्मा अपनी आँखों को पोछ कर अंकल की तेरहवीं की रस्म अच्छी तरह से पूरा करने लगी। पंडितों और गरीबों को दान दिया। फिर संपादक को फोन कर अंकल का एक नया पुस्तक छपवाने की तैयारी करने लगी।
बेटियों ने कहा मेरे पास चलो अम्मा, पर अम्मा मना कर दी। बोली “मुझे बहुत कुछ करना है, तुम्हारे पापा बहुत सारे काम करने को छोड़ गए हैं। पहले सारे काम निपटा लूँ, फिर आऊँगी।” बेटियों ने कहा “कैसे रहोगी अकेली, बेटों को कोई मतलब नहीं। खुद से खाना कैसे पकाओगी? अपने को कैसे सम्हालोगी?”
अम्मा लम्बी साँस लेते हुए बोली, “नर्स को बोल दी हूँ, पन्द्रह दिनों के बाद देख जाएगी। खाना बनाने और घर का काम करने वाली एक बच्ची है, उसे मुझसे कोई उम्मीद नहीं, मेरे धन दौलत से कोई मतलब नहीं, वो अपने पगार में खुश रहती है, मुझे पेंशन मिलता है। बस तुम सब अपना ध्यान रखना, अम्मा अपने को सम्हाल सकती है।” सबों को लगा अंकल ने ऐसा क्या लिखा था उस पर्ची में जिसे पढ़कर अम्मा इस तरह बदल गई।
अम्मा अपने दम पर अपने आत्मबल से इतनी मजबूत थी कि उसे कुछ भी नहीं चाहिए था। पति का प्यार, जो जाते हुए भी कुछ ऐसा देकर गए कि अम्मा अपने को कभी अकेली नहीं समझती। सुंदर साड़ी, अच्छा खाना और अपनी परवाह करना सीख ली थी। और इन सब से समय मिलता तो कुछ लिखती-पढ़ती। ग़रीबों को देखती, जो मजबूर होते उनकी सहायता करती।
एक साल बीतने को था, अम्मा पहले से ज्यादा खुश और स्वस्थ रहने लगी थी। पिता की बरसी के बाद छोटी बेटी अपनी माँ को ले जाने आई। उसे अपने पिता की एक चिट्ठी मिली जिसे उसकी अम्मा अपने तकिया के नीचे रखे हुए थी। छोटी बेटी उसे पढ़ने लगी। उसमे उसके बाबू जी ने अपनी पत्नी के लिए लिखा था।
“तुम अकेली नहीं हो, ये जीवन अकेला है। हमरा साथ कभी भी छूट सकता है, अपना विश्वास कभी मत खोना। तुम्हारे पास जो है वो बहुतों के पास नहीं होता है। तुम्हारा ज्ञान, नेक आत्मा, अपने बच्चों से कोई उम्मीद नहीं रखना, जिसे तुम से कोई उम्मीद नहीं, उसे देखना। अपने ज्ञान का प्रसार करना। सबसे बड़ी संतान तुम्हारा पेंशन है। अपने पैरों पर खड़ी हो। तुम हजारों की प्रेरणा बनना। बुढ़ापा तो मन में होता है। तुम्हें बहुत सारे काम करने हैं। समाज सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं। कर्मयोग से बड़ा कोई योग नहीं… ..! जीवन के अंतिम बेला तक कर्म करते रहना… .!!”
बेटी पढ़कर रोने लगी, अपने माता-पिता पर गर्व हुआ। तब तक अम्मा आ गई। संग बहुत सारे लोग अम्मा को सम्मान देने आए। अम्मा की पुस्तक बेस्ट सेलर जो बन चुका था। अम्मा अभी पहले से अधिक मजबूत दिख रही थी, एक संतुष्टि से भरा मुस्कान चेहरे पर लिए सबों का अभिवादन कर रही थी..!
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