सुधा कुछ तो बोलो?
मैं कल से तुम्हें देख रही हूँ… आखिर तुमने मुझे टिकट भेज कर यहाँ तुरंत क्यों बुलाया है? और अपना सारा सामान क्यों बाँध रखा है?… तुम कहीं जा रही हो क्या?… अरे कुछ तो बोलो?
सुधा की सबसे प्रिय सहेली शीला ने असमंजस में पड़ते हुए सुधा के आगे प्रश्नों की झड़ी लगा दी…। वह कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।
कब से वह अपने रिटायर होने का इंतजार कर रही थी। छह महीने पहले रिटायर होने के बाद सुधा जब दिल्ली अपने बहू-बेटे के पास आ रही थी तो कितनी उत्साहित थी कि बेटे-बहू के यहाँ जाकर बस आराम करूँगी। उनके यहाँ तो हर काम के लिए कामवाली लगी है।
जीवन की आपाधापी में मन का जो काम अब तक कर न सकी वो सब करूँगी.. कितने जोश और खुशी से सुधा ने गदगद होते हुए बताया था- “पता है बहू का कल फोन आया था, कह रही थी माँ जी आप वहाँ छोटे से घर में अकेली रह कर क्या करेंगी? आप यहाँ आ जाइए..आपका इतना बड़ा घर है यहाँ..आप इतने बड़े घर की मालकिन हैं.. आइए यहाँ आपको कोई दिक्कत नहीं होगी..।
अब क्या हुआ? कुछ तो बोल?
तभी दरवाजे पर खड़ा सुधा का बेटा आकाश बोल पड़ा- ‘मैं भी कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ, शीला आँटी! कि आखिर माँ को हुआ क्या है? क्या तकलीफ है इन्हें यहाँ पर?’
पर इन्होंने तो बस चुप्पी साध रखी है.. और एक ही जिद है कि वापस इलाहाबाद जाना है…।
वहाँ जाकर करेंगी क्या? क्या है वहाँ?
पर सुधा तो मन-ही-मन निश्चय कर चुकी थी…. जीवन के इस सांध्य बेला में अब और बोझ उससे सहा नहीं जाता… माना पैसे का कोई विकल्प नहीं पर उसके बोझ तले भी खुशियाँ नहीं मिलती ये वो अच्छी तरह से समझ चुकी थी…
वह अचानक उठी और घर की चाबियाँ बेटे को देते हुए बोली- ‘बेटा मुझे वहाँ कोई तकलीफ नहीं होगी।’ पर आखिर आपको यहाँ क्या तकलीफ है? आकाश बोला।
कुछ नहीं बेटा तुम नहीं समझोगे। और हाँ मेरे जाने के बाद एक केयरटेकर रख लेना… जो दिन भर इन कामवालियों से काम कराए… और तुम्हारे घर की रखवाली करे… इस घर को मालकिन की नहीं एक चौकीदार की जरूरत है…
चलो शीला, ट्रेन का टाइम हो रहा है एक लंबी सी राहत भरी साँस लेते हुए सुधा ने कहा…।
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