प्रिय वसंत,
पिछली बार
जब तुम लौटे थे
या तो भूल गए थे
या फिर जान कर
तुम सुलगते हुए
कुछ प्रश्न छोड़ गए थे
ग्रीष्म ऋतु ने
उनका स्वागत किया था
उसे कुछ अपने से
लगे थे वो सुलगते प्रश्न
वर्षा ऋतु का तो
भर पूर प्रयास था
जलन पर चंदन का
लेप करने का
वो अपने प्रयास में
सफल भी हुई थी
शरद ऋतु ने भी
वर्षा का ही साथ दिया था
मेरा मन बहलाना चाहा था
शायद पीड़ा भुलाने को
फिर हेमंत ऋतु
आयी थी और
चारों ओर
बहार ही बहार थी
मैं तो प्रश्नों को
भूल भी गया था
मेरा साथ भी दिया था
शीत ऋतु ने
मेरी सारी भावनायें
जम सी गयीं थीं
आज सुबह
जब द्वार खोला,
देखा तुम ही थे
साल भर बाद
फिर झोला लिए खड़े थे
झोले में से हल्का-हल्का
धुआँ उठ रहा था
मैंने तुमसे पूछा भी था कि सच-सच बताओ
क्या अभी भी
तुम्हारे प्रश्न सुलगते रहते हैं
मेरी भावनाओं ने तुमको
चंदन का लेप दिया था
तुम उसको झोले में
रख कर क्यूं नहीं घुमते
अब मैं काफ़ी सिक चुका हूँ
और जलना नहीं चाहता हूँ
प्रश्नों की उपस्थिति ने और
उत्तरों की अनुपस्थिति ने
इसी स्थिति ने मुझे साल भर
अपने में उलझाये रखा था
मैं इस बार समझौता
कर ही लेना चाहता हूँ
अब कोई प्रश्न मत दागना
तुम ही झुलस जाओगे
मुझमें सामना करने की
क्षमता जाग गयी है
प्रिय वसंत,
तुम आ ही गए हो तो
अब स्वागत है तुम्हारा।
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