न जाने क्यों, अरुंधति आज उस बुझे हुए लकड़ी के चूल्हे की राख को उलट-पुलट कर देख रही थी और सोच रही थी कि शायद कोई एक चिंगारी दबी पड़ी हो उसमें। जिससे उसे फिर से जलाया जा सके। पर, बुझे हुए राख के अवशेष के सिवा उसे कुछ नहीं मिल रहा था। बिल्कुल उस राख के जैसा ही था, उसका जीवन भी! उसकी बुझी-बुझी आँखें भी! उसके चेहरे की बुझी हुई रंगत भी!
सफेद रंग की साड़ी ने जैसे उसके जीवन से हर उमंग को मिटा दिया था। नीरसता के आँचल को ओढ़े हुए जाने कितने दिन और कितनी रातें बीत गई थी। कई बार अपने आप में कोई कारण ढूँढती। जिससे उसकी कोई इच्छा जागे। ख्वाहिशें जागें। यही सब कुछ सोचते हुए वह कुछ लकड़ियाँ उठा लाई, और उस पर मिट्टी का तेल डालकर चूल्हा जलाने लगी। तभी, किसी के मजबूत हाथ उसके काँधे पर पड़े।
वह अनिरुद्ध था। उसका बाइस साल का बेटा। जिसे उसने पढ़ने के लिए शहर भेज दिया था। अभी कल रात ही तो आया था अनिरुद्ध। हाँ, अब वह जवान हो गया था। पिता के जाने के बाद उसने अपनी माँ के साथ जीवन के हर उतार-चढ़ाव को बड़े ही नजदीक से देखा था। जिसने उसे समय से पहले ही बहुत परिपक्व बना दिया था। उसकी माँ ने उसे पढ़ा-लिखा कर इतना बड़ा तो कर ही दिया था, कि उसे अब वह हर बात समझ में आने लगी थी, जो पहले नहीं आती थी।
“क्या बना रही हो माँ?” अनिरुद्ध ने माँ की पीठ पर हाथ रखते हुए पूछा। “खीर बना रही हूँ तेरे लिए। तुझे खीर बहुत पसंद है न! भगवान जाने तू वहाँ कैसे खाता होगा? कौन देता होगा तुझे यह सब बनाकर? ठीक से खाता भी होगा या नहीं! तभी तो इतना दुबला हो गया है तू!”
फिर उसका पूरा का पूरा ध्यान अपने बेटे पर चला गया। उसके चेहरे को निहारने लगी। अब वह बालक नहीं था। युवा हो गया था। लंबा, पर दुबला-पतला। “मेरी इतनी चिंता मत कर तू। अब मैं बड़ा हो गया हूँ। कम-से-कम इतना बड़ा तो हो ही गया हूँ, कि अपना ध्यान रख सकूँ। हाँ, यह और बात है कि वहाँ तुम्हारे हाथों की बनी हुई खीर बहुत याद आती थी, और जब याद आती थी, तब कुछ भी खाना मुझे अच्छा नहीं लगता था। अब रहने दो इन सब बातों को। अब तो मैं आ गया हूँ ना! मैं अभी नहा कर आता हूँ। फिर खाऊँगा, खीर।” कहते हुए अनिरुद्ध नहाने चला गया।
खीर बनाते-बनाते ही अरुंधति को याद आया कि इलायची तो वह कमरे में ही भूल आयी। थोड़ा झटके में ही, वह खीर छोड़कर इलायची लेने आ गयी। जब वहाँ से लौटने लगी तो उसकी नजर उस सूटकेस पर पड़ी, जो बिस्तर पर खुली हुई रखी थी। जिसमें अनिरुद्ध के कपड़े रखे थें। बेटे के कपड़ों के बीच, उसे एक साड़ी नजर आई।
वह उस साड़ी को निकाल कर देखने लगी। गहरे नीले रंग की साड़ी। बहुत ही सुंदर और आकर्षक रंग था उसका। उसे देखकर जैसे कुछ पल के लिए वह किसी और दुनिया में चली गई। यादों की दुनिया! उसका रंग, जैसे कुछ याद दिला रहा था उसे। उसका रंगों के प्रति अटूट प्रेम था पहले। पर दुर्भाग्यवश तथाकथित समाज के नियम विधवा स्त्री के जीवन से रंग ही मिटा देतें हैं। वह रंग, जो हर्ष और उल्लास का प्रतीक होता है। वह रंग, जो हमारे सौंदर्य में चार चाँद लगा देता है। वह रंग, जो हमें हर दिन प्रसन्न रखता है। वह रंग, जिसमें लिपटकर स्त्रियाँ सौभाग्यशाली होतीं हैं।
पर अब उसने अपने आपको समझा लिया था। वह वक्त के साथ समझौता कर चुकी थी। समय और परिस्थिति के साथ सब कुछ भुलने की कोशिश बनी रही उसकी। दूर-दूर तक इन रंगों के साथ उसका कोई वास्ता हीं नहीं रह गया था। वह यह सब सोच ही रही थी, तभी अनिरुद्ध के कदमों की आहट ने उसकी तंद्रा तोड़ दी।
“माँ तुम्हारे लिए ही लाया हूँ यह साड़ी!” पास आकर साड़ी खोलकर बड़े प्यार से उसने माँ को ओढ़ाते हुए बोला “देखो न, कितनी सुंदर लग रही हो।” पहले तो अरुंधति को जरा अटपटा-सा लगा। वह भूल चुकी थी, उन रंगों को, जो उसके कपड़ों के हर धागे में समाए रहते थे। जो अब बस तस्वीर बन कर रह गए थे। सफेद रंग ने सादगी के साथ-साथ सूनापन भर दिया था उसके जीवन में। एक अजीब-सा सूनापन! जीवन में हर रंग का अपना एक महत्व है। पर रंगहीन जीवन कोरे कागज-सा ही होता है। जिस पर कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता! अकेला और सूना!
उसकी नज़रें शीशे में देखने लगी। बरसों बाद ओढ़ा था उसने वह नीला रंग। कुछ पल के लिए तो उसे वही पुरानी अरुंधति उसमें दिखने लगी। कभी समय था, जब उसने उस नीले रंग में कई ख्वाब देखे थे। हजारों पल जिये थे। कुछ पल के लिए सब भूल गई थी वह! जैसे किसी ठूँठ वृक्ष में जान भर गई हो। अचानक ही उसकी हर डाल हरी हो गई हो। इस हरियाली से उसकी आँखें तर हो गई थी। भाववश उसकी आँखों से गिरते आँसू से उसकी नीली साड़ी नम हो रही थी, और गले से लिपटे हुए अनिरुद्ध की गर्दन भी!
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