दिए गए आलेख की व्याकरण, वर्तनी, विराम-चिह्न और वाक्य-संरचना संबंधी अशुद्धियों को सुधारकर नीचे प्रस्तुत किया गया है:
सितंबर, 2022
किसी निर्गुण फ़क़ीर कवि ने जीवन को एक सराय कहा है, तो किसी ने इसे यात्रा। सच में इस जीवन रूपी यात्रा में हम कितने ही लोगों से मिलते हैं, जिनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिनसे भले ही एक ही बार मिले हों, लेकिन उनकी याद बार-बार आती है। ऐसी ही एक महिला से मैं जयपुर में मिला था। उनका नाम या पता मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं था, लेकिन उनका स्नेहिल व्यवहार मैं आज भी नहीं भूल पाता हूँ।
उस समय मैं युवा था और सरकारी नौकरियों के लिए जहाँ-तहाँ जाकर परीक्षा दिया करता था। मैं एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आता था, जहाँ सरकारी नौकरी मिल जाना यानी भगवान का मिल जाना माना जाता था। युवाओं के जीवन का एक ही लक्ष्य होता था—किसी तरह एक सरकारी नौकरी मिल जाए। इसी प्रकार की एक परीक्षा देने मैं जयपुर गया हुआ था। परीक्षा केंद्र एक कॉलेज में था और उसके पास ही एक साधारण-से होटल में मैं ठहरा हुआ था। दिसंबर का महीना था तथा कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। सामान ज़्यादा नहीं था, इसलिए परीक्षा के दिन ही होटल खाली कर सामान सहित परीक्षा केंद्र चले जाने और वहीं से सीधे रेलवे स्टेशन जाने का विचार था; क्योंकि चेक-आउट का समय दोपहर 12 बजे होने के कारण उसके बाद कमरा खाली करने पर एक अतिरिक्त दिन का शुल्क लग जाता।
परीक्षा के दिन मैं होटल के काउंटर पर बिल का भुगतान करने गया। बिल देकर चेक-आउट की सारी औपचारिकताएँ पूरी कर मैं अपने कमरे में लौट आया। 10-15 मिनट बाद जब मैं कॉलेज जाने के लिए सामान लेकर कमरे से निकला, तो सामने एक 65-70 वर्षीया वृद्धा खड़ी थीं। वेष-भूषा से वे एक संभ्रांत महिला लग रही थीं। वे उस होटल की मालकिन थीं। काउंटर पर जब मैं अपने बिल का भुगतान कर रहा था, तब वे वहीं खड़ी होकर किसी से बात कर रही थीं। मेरी उनसे अभी तक कोई बात नहीं हुई थी। अपने हाथों में रखे टिफिन बॉक्स को खोलकर मेरी तरफ बढ़ाते हुए वे बोलीं, “गाजर का गर्म हलवा है, खा लो। यह गोंद का लड्डू है, इसमें और भी बहुत कुछ मिला है जो शरीर को गर्म रखता है।” मैं बोला, “जी, मैंने ऐसा कुछ ऑर्डर नहीं किया था; शायद किसी और कमरे का ऑर्डर होगा।”
“अरे, यह होटल का नहीं है! पास में ही मेरा घर है, वहाँ से तुम्हारे लिए लाई हूँ। इसका बिल नहीं देना है। तुम काउंटर पर खड़े थे, तो ठंड से काँप रहे थे। ऐसे काँपते हाथों से परीक्षा में कैसे लिखोगे! चलो, काउंटर के पास हीटर है, वहाँ खड़े होकर खा लो।” मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। वे मुझे लेकर काउंटर के पास चली गईं। मैं कुछ असहज महसूस करने लगा, लेकिन वे महिला मेरे कुछ बोलने की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं ही बोलती गईं, “तुम्हारी उम्र के मेरे पोते-पोती हैं। मेरे बच्चे भी परीक्षा और काम के लिए घर से बाहर जाते हैं और वहाँ वे भी होटलों में ही रुकते हैं। घर से बाहर कौन होता है उनकी देखभाल करने वाला? तुम दिल्ली से आए हो न?”
“जी,” मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया। उन वृद्ध महिला ने इतने प्रेम से खाने के लिए कहा कि मैं मना नहीं कर पाया। हालाँकि मैंने देर होने का डर भी व्यक्त किया। इस पर वे बोलीं, “कॉलेज पास में ही है, अभी बहुत समय है, आराम से पहुँच जाओगे। परीक्षा में घबराकर मत लिखना; शांत दिमाग से सोचोगे, तो ज़्यादा अच्छा कर पाओगे।” मेरे संकोच के बावजूद उन्होंने एक पैकेट में कुछ मेवे (ड्राई फ्रूट्स) मुझे देते हुए कहा, “इसे लंच के समय खा लेना। स्वास्थ्य ठीक रहेगा, तभी तो माँ-बाप के सपने पूरे कर पाओगे।” मैं उन्हें प्रणाम कर कॉलेज चला गया।
आज मैं प्रौढ़ावस्था में पहुँच चुका हूँ और मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं, लेकिन आज भी मुझे उस माँ की याद आती है, जिनकी असीम ममता एक अजनबी के लिए भी छलकी थी। सच में, ‘माँ’ का अर्थ ‘ममता’ ही तो है।
