पित्रसत्तात्मक समाज
रिश्तों की छांव, स्नेह के धागों और शिव-शक्ति व राधा-कृष्ण के प्रतीकों के माध्यम से परिवार और समाज में पुरुष-स्त्री के पूरक संबंधों की नई परिभाषा तलाशती एक गहरी कविता—’पित्रसत्तात्मक समाज’।”
रिश्तों की छांव, स्नेह के धागों और शिव-शक्ति व राधा-कृष्ण के प्रतीकों के माध्यम से परिवार और समाज में पुरुष-स्त्री के पूरक संबंधों की नई परिभाषा तलाशती एक गहरी कविता—’पित्रसत्तात्मक समाज’।”
आज मेरी प्रतीक्षा रिमझिम बनी बरसात की तुमसे मिलने को आकुल अधखुले मेरे ये नैन, जल भरे हो जाते हैं
हिंदी की गौरव गाथा कोई साधारण कथा नहीं है, यह उस मिट्टी की महागूँज है जिसने हमें जन्म दिया, और
डिग्रियों की अंधी दौड़, नींद और जवानी की कीमत पर बिकते सपनों के बीच शिक्षा और बाजारवाद के कड़वे सच को बयान करती एक मार्मिक कविता—’विद्यार्थी जीवन’।
ऋचा सिंह नौ दिनों तक घर-घर में, होती देवी की आराधना है, माथों पर श्रद्धा का उजास, हाथों में सुमनों
हे माँ दुर्गा, लाज रखना, चरणों में अपने स्थान रखना। जब भी डगमगाऊँ राहों में, सिर पर अपना हाथ रखना॥
वकीलों की दुनिया, कम होते मुकदमों और सामाजिक व्यवस्था के विरोधाभास पर तीखा और मजेदार कटाक्ष करती एक व्यंग्यात्मक कविता—’वकील साहब की कविता’।”
नवरात्रि में माँ, कृपा बनाए रखनानवरात्रि की पावन बेला, जगमग हो माँ, जीवन मेरा। तेरे चरणों में शीश झुकाऊँ, भक्ति
भागदौड़ भरी जिंदगी, सड़क की व्यस्तता और मोबाइलों में सिमटती इंसानी दुनिया के बीच हर आदमी की अपनी उलझन और व्यवस्था पर कटाक्ष करती एक जीवंत कविता—’ट्रैफिक जाम’।”
पितृपक्ष आया है, पापा, और आपकी याद फिर आँखों में उतर आई है। जब दर्द से टूट रही थी, आपने
सितंबर 2026 राखी भेज रहा हूँ बहना, तुमको ही इस बार, रक्षा-वचन निभा देना, तुम पर ही परिवार! इस बार
सितंबर 2026 बदल गई है बातों की भाषा, बदल गया संवाद, शब्द वही हैं, अर्थ नए हैं, नया हुआ अंदाज़।
सितंबर 2026 उछल ताल से मेंढक आया, जोर-जोर से वह टर्राया।। फुदक-फुदक सबके घर पहुँचा, दरवाजे पर वह चिल्लाया।। आओ
सितंबर 2026 ऋचा सिंह वाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण (बिहार) अब बातों में वह बात कहाँ, जो कभी ख़तों में हुआ
सितंबर 2026 आज़ादी के नाम पे युवा, करें हदें सब पार, नव पीढ़ी की भाषा से अब, हार गए संस्कार!
सितंबर 2026 राग-द्वेष से हो रहित, जीवन की यह नाव; क्षणभंगुर जीवन मिला, तज शकुनि-सम दाँव। पीतल कितना लो रगड़,
सितंबर 2026 फैशन के मकड़जाल में फँस गया हिंदुस्तान, पश्चिमी फैशन पर कर रहा आज यह गुमान। अपने वजूद को
सितंबर 2026 “तूने क्या नहीं दिखाया, ज़िंदगी! तूने क्या नहीं सिखाया, ज़िंदगी!” पल-पल गिरना, गिरकर फिर उठना, उठकर चलना, चलकर
सितंबर 2026 जिसे छिपाना श्रेयस्कर है, उसे छपाकर ख़ुश हैं लोग जिसे जला जग दीपित होता, उसे बुझाकर ख़ुश हैं
सितंबर 2026 दुनिया में ऐसे कई लोग हैं, जो साथ में रहते हुए भी अपना दुःख एक-दूसरे से नहीं कह
सितंबर 2026 सोच रहा आज देश के हाल पर लिखें। जन जन के भीतर तम और ताप पर लिखें। लिखने
सितंबर 2026 धूप छूना चाहती है मेरे आँगन को हर रोज़। धूप चूमना चाहती है आँगन की तुलसी को हर
सितंबर 2026 1 मैं बदलना चाहता हूँ, अब संभलना चाहता हूँ। तीरगी, वीरानियों से, बच निकलना चाहता हूँ। जो रहे
सितंबर 2026 उत्तम हो संसार में, बच्चों का व्यवहार। गढ़ें गुरुदेव प्रेम से, शिक्षा शुभ संस्कार॥ वाणी में गुरुदेव की,
सितंबर 2026 ओढ़ ली खामोशी मैंने, किसी हथियार के रूप में नहीं; बस अपने बचाव के लिए, महसूस हो रहे
सितंबर 2026 संस्कार की बात करो ना, चारों तरफ़ छा गई निराशा, बदला-बदला गाँव-देश अब, कहूँ क्या नई पीढ़ी की
सितंबर 2026 इनके शब्द बहुत कम हैं, पर भाव बहुत गहरे हैं; बातें इनकी छोटी हैं, पर रिश्ते इनके सहेजे
रुद्राभिषेक की शीतल धार में अपना सारा दर्द बहा आई हूँ, “ॐ नमः शिवाय” की गूँज में अपना मन आपको
बेटियाँ जब घर आती हैं, तो सिर्फ़ खुशियाँ नहीं लातीं— माँ-बाप की पूरी दुनिया अपने साथ ले आती हैं। “माँ…”
जून, 2026 (कवि परिचय: भारतीय रेल सेवा से सेवानिवृत, स्वतंत्र लेखन। करीब 300 से अधिक कविताओं, आखिर क्या करता, देह
जून, 2026 पुष्करराय जोषी गुजरात हाउसिंग बोर्ड कनकोट पटिया, कावेद रोड, राजकोट वृद्ध की धूंधली आँखों में खुल रहा है
जून, 2026 बुजुर्ग हमारे घर के रक्षक संस्कृति के संरक्षक। दया, धर्म क्षमाशीलता के संवर्धक। क्या इनका बूढ़ा होकर जिंदा
जून, 2026 हमारा घर ध्यान रहे मित्रों मकान नहीं घर क्योंकि मकान बनता है ईंट रेत सीमेंट से और घर
जून, 2026 मंगल-मंगल मंगल-मंगल जंगल-जंगल जंगल-जंगल छम-छम नाच रहा मोर बड़ा टक-टक देख रहा हंस खड़ा कुहू-कुहू कूक रही कोयल
जून, 2026 (कवयत्री परिचय: अवकाशप्राप्त हिंदी विभागाध्यक्ष, हिंदी, मैथिली एवं अँग्रेजी की साहित्यकार, मैथिली उपन्यास ‘किस्त-किस्त जीवन’ के लिए साहित्य
जून, 2026 हे शहीद! तुम आज भी जिंदा हो मां की उदास नम आंखों में, पत्नी की मेहंदी मिटाते आंसुओं
जून, 2026 मेरे बिना कहाँ है संभव, किसी समाज का निर्माण, ये बात और है कि पहले नहीं था किसी
जून, 2026 मैं औरत हूँ, मैं सच कह रही हूँ, कोई कुछ बोलता क्यों नहीं, बस जानते हैं, मेरे सामने
जून, 2026 सुनो लड़कियों! ध्यान से सुनो… अपना आसमान खुद चुनो तुम भावी पीढ़ी की प्रतिनिधि हो सुनो वर्तमान पीढ़ी
जून, 2026 देखो क्या क्या बदल गया, और देखो क्या बदल रहा। संवेदना हुई रेत, सहृदयता हो गई ढेर। देखो