
1 अक्टूबर 2026
पितृपक्ष आया है, पापा,
और आपकी याद
फिर आँखों में उतर आई है।
जब दर्द से टूट रही थी,
आपने हाथ थामकर कहा था—
“बिटिया, दर्द को शब्द दे,
तू हार नहीं सकती।”
आज भी जब टूटती हूँ,
आपकी वही आवाज़
मुझे भीतर से संभाल लेती है।
कैसे दूँ आपको जल, पापा?
मेरी आँखों का हर आँसू
ही तो आपका तर्पण है,
और मेरे हर शब्द में
आपकी दी हुई हिम्मत।
बस एक बार आकर
मेरे सिर पर हाथ रख दीजिए…
कुछ मत कहिएगा पापा,
बस अपनी हथेली
मेरे सिर पर रख दीजिएगा।
मैं फिर से वही बिटिया बन जाऊँगी,
जिसे दुनिया की कोई चिंता नहीं थी—
क्योंकि उसके सिर पर
पापा का हाथ था।
आप आज पास नहीं हैं,
फिर भी हर बार
जब मैं आँसू पोंछकर लिखती हूँ,
लगता है…
आप यहीं कहीं हैं,
मेरी कलम थामे हुए।
पापा,
आपको जल क्या अर्पित करूँ—
मेरी हर साँस में आपकी याद है,
मेरे हर शब्द में आपका अंश है,
और मेरी पूरी ज़िंदगी…
आपकी बेटी होने का तर्पण है।
