सौंदर्य का बाज़ारवाद: क्या पार्लर और ब्यूटी ब्रांड तय कर रहे हैं हमारी सुंदरता की परिभाषा?

 बबीता झा

8 मार्च, महिला दिवस के अवसर पर मैं एक कार्यक्रम में गई थी। कार्यक्रम की स्पॉन्सर एक प्रसिद्ध ब्यूटी पार्लर ब्रांड थी। कार्यक्रम में आने वाली प्रत्येक महिला को एक गिफ्ट वाउचर दिया गया। वाउचर पर लिखा था—“₹5000 तक का प्रोडक्ट निःशुल्क।”

पार्लर का पता दक्षिण दिल्ली के किसी महँगे और पॉश इलाके का था और कार्ड की वैधता 3 महीने की।

कुछ दिन बाद उसी इलाके में जाना हुआ तो मैंने और मेरी दो दोस्तों ने सोचा—कार्ड की वैधता अभी बाकी है, तो क्यों न इसे इस्तेमाल करके देखा जाए? आखिर पैसे तो देने नहीं हैं। जो भी सर्विस या प्रोडक्ट हमारे काम का होगा, ले लेंगे।

इसी सोच के साथ हम तीनों पार्लर पहुँच गए।

पॉश इलाके में पॉश पार्लर। हर स्टाफ बड़े ही अदब और मुस्कुराहट के साथ बात कर रहा था।

हम सबसे पहले स्किन सेक्शन में पहुँचे। ₹5000 के वाउचर में जो सर्विस उपलब्ध थी, वही सर्विस किसी सामान्य कॉलोनी के पार्लर में शायद ₹2000 में मिल जाती।

लेकिन असली खेल तो इसके बाद शुरू हुआ।

एक के बाद एक ऑफर की बारिश—

  • ₹1899 में 15 सर्विसेज, वैधता नौ महीने।
  • ₹30,000 में 30 सर्विसेज, वैधता एक वर्ष। और न जाने कितने पैकेज!

स्किन सेक्शन में कंसल्टेशन की सुविधा भी थी। बताया गया कि अगर आप अपने लिए सही सर्विस या प्रोडक्ट तय नहीं कर पा रही हैं तो विशेषज्ञ आपके स्किन टाइप का पता लगाकर आपको उचित सलाह दे सकते हैं।

लेकिन इस ओपन कंसल्टेशन के साथ-साथ एक दूसरी, अनकही काउंसलिंग भी लगातार चल रही थी—

  • “आपके ओपन पोर्स हैं…”
  • “पिगमेंटेशन हो रहा है…”
  • “आपको एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट शुरू कर देना चाहिए…”
  • “टैनिंग बहुत है। शायद आप धूप में ज्यादा जाती हैं…”
  • “आपको डिटॉक्स लेना चाहिए…”
  • “इसका रिजल्ट बहुत अच्छा है…”

हर वाक्य के साथ जैसे हमारे चेहरे पर एक नई कमी खोजी जा रही थी और हर कमी के सामने एक सर्विस तैयार खड़ी थी।

मेरी एक फ्रेंड ने मुझसे पूछा—

  • “How are you feeling?”

मैंने कहा—

  • “Depressed.”

फिर हम हेयर सेक्शन में गए।

हममें से एक ने हेयर कटिंग ली। लेकिन उसके साथ-साथ हम तीनों की काउंसलिंग भी चलती रही।

  • “आपके बाल कितने फ्रिज़ी हैं…”
  • “बहुत अनमैनेजेबल हैं…”
  • “आपको हेयर हाइड्रा लेना चाहिए…”
  • “हेयर हाइड्रा तो स्कैल्प के लिए है…”
  • “आपके लिए डीप कंडीशनिंग परफेक्ट रहेगी…”
  • “बस ₹1000 और एड करके केराटिन करा लीजिए…”

हर व्यक्ति के लिए एक सर्विस तैयार थी। और ऐसा लगता था जैसे हमारे बाल, त्वचा और चेहरे के बारे में हमसे कहीं अधिक जानकारी वहाँ मौजूद थी।

तीनों में से कोई एक भी ग्राहक बन जाए तो शायद स्पॉन्सरशिप और गिफ्ट वाउचर देने का उद्देश्य सफल हो जाए।

वैसे भी, अब समझ में आया कि गिफ्ट वाउचर कई बार उपहार से ज्यादा ग्राहक को दुकान तक लाने का हुक होता है।

इसके बाद अगला सेक्शन। फिर अगला। और फिर उसके बाद वाला।

मैनिक्योर, पेडिक्योर, वैक्सिंग, आईलैशेज, नेल्स… और न जाने क्या-क्या।

और अंत में बॉडी पॉलिश!

नेल्स, कार और साड़ी आदि की पॉलिश तो सुनी थी, लेकिन बॉडी पॉलिश पहली बार सुन रही थी।

अंततः हमने अपने लिए सबसे उपयुक्त सर्विस ली—Exit और बाहर निकल आए।

लेकिन बाहर निकलने से पहले तक हमारे भीतर एक अजीब-सी भावना पैदा हो चुकी थी।

हमें लगने लगा था कि हम दुनिया की सबसे बदसूरत, नालायक, अज्ञानी, लापरवाह और कंजूस महिलाएँ हैं।

बाहर निकलते ही याद आया— नहीं, हम सामान्य ही हैं।

अपने को सुंदर बनाना, अपना ध्यान रखना, सजना-सँवरना—इसमें कोई बुराई नहीं है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है।

मुझे चेतन भगत के एक उपन्यास, ‘वन नाइट @ द कॉल सेंटर’, की याद आई, जिसमें वैक्सिंग के दर्द के बीच नायिका के मन में यह सवाल आता है कि ये सब पुरुषों को क्यों नहीं करना पड़ता और इसे पितृसत्ता का प्रमाण माना जाता है।

लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ।

मैं इस विचार से भी सहमत नहीं कि स्त्री या पुरुष केवल किसी दूसरे को आकर्षित करने के लिए सजते-सँवरते हैं।

सजना अच्छा लगता है क्योंकि सजना अच्छा लगता है। बस।

प्रशंसा अच्छी लगती है।

अपने बारे में अच्छा महसूस होता है।

आत्मविश्वास आता है।

और यह बात केवल स्त्रियों के लिए नहीं, पुरुषों के लिए भी उतनी ही सही है।

समस्या शायद वहाँ शुरू होती है, जहाँ सौंदर्य व्यक्तिगत पसंद से निकलकर बाज़ार की आवश्यकता बन जाता है।

जब सौंदर्य एक व्यवसाय बनता है, तो धीरे-धीरे वह हमारे स्वैच्छिक सौंदर्य-बोध को बाज़ार द्वारा प्रेरित आदत में बदलने लगता है।

और फिर वही आदत एक दिन आवश्यकता जैसी महसूस होने लगती है।

एक छोटी बच्ची जब अपनी माँ, मौसी या घर की दूसरी बड़ी महिलाओं के साथ पार्लर जाने लगती है, तो उसके लिए यह सब धीरे-धीरे सामान्य होने लगता है।

उसे शायद पता भी नहीं चलता कि कब उसका अपना सौंदर्य-बोध बाज़ार द्वारा निर्धारित होने लगा।

प्राथमिक स्कूल में हेयरकट।

हाई स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते थ्रेडिंग।

फिर फेशियल।

फिर स्किन केयर।

फिर एंटी-एजिंग!

जिस उम्र में प्रकृति स्वयं बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के चेहरे पर अपनी पूरी चमक बिखेर रही होती है, उसी उम्र में कृत्रिम देखभाल एक आदत और फिर धीरे-धीरे आवश्यकता बन सकती है।

मेरी एक दोस्त कहती है—

“मुझे लिपस्टिक लगाना कोई बहुत अच्छा नहीं लगता। बस आदत हो गई है। अब इसके बिना बाहर जाने में कॉन्फिडेंस नहीं आता।”

मैं अक्सर इस बात के बारे में सोचती हूँ।

हमारा कॉन्फिडेंस कितना डिपेंडेंट हो गया है, नहीं?

हम सुंदर दिखना चाहते हैं—यह स्वाभाविक है।

लेकिन क्या सुंदर दिखने की हमारी परिभाषा भी हमारी अपनी है?

या धीरे-धीरे किसी विज्ञापन, किसी सेलिब्रिटी, किसी सोशल मीडिया ट्रेंड और किसी ब्यूटी ब्रांड ने हमारे लिए तय कर दी है?

शायद सवाल पार्लर जाने या सजने-सँवरने का नहीं है।

सवाल यह है कि—

क्या हम अपनी सुंदरता को सँवार रहे हैं,

या बाज़ार हमारी असुरक्षाओं को सँवारकर उन्हें अपना ग्राहक बना रहा है?

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