‘नाविक’ के दोहे

सितंबर 2026

 डॉ. विजय नागपाल ‘नाविक’
डॉ. विजय नागपाल ‘नाविक’
ट्यूलिप वॉयलेट, गुरुग्राम
वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार

राग-द्वेष से हो रहित, जीवन की यह नाव;
क्षणभंगुर जीवन मिला, तज शकुनि-सम दाँव।
पीतल कितना लो रगड़, बनता कभी न स्वर्ण;
खुशबू खो देता वही, शाख़ छोड़े जो पर्ण।
धर्म बचा लोगे अगर, बच जाएगा देश;
कट जाओगे यदि बँटे, करो न संशय लेश।
जब-जब भी हम हैं बँटे, दुश्मन हुआ निहाल;
हुए संगठित जब कभी, बने शत्रु का काल।
काम योग्य को हैं बहुत, नाकाबिल बेकार;
श्रम का समझे मूल्य जो, उसका बेड़ा पार।
जाति-पाँति में मत बँटो, समझो अरि की चाल;
जुटे मीत बन भेड़िए, ओढ़े भेड़ की खाल।
अपने-अपने धर्म का, पालन करें यथेष्ट;
अगर किया धर्मांतरण, फलदायी वह नेष्ट।
संग नज़र के, नज़रिया बदलो तुम श्रीमान;
राग-द्वेष सब त्याग दो, सुंदर दिखे जहान।
दुश्मन से तो लें निपट, नीति रहे तैयार;
बहुत कठिन पहचानना, मीत मिले गद्दार।
नाविक लिख-लिख पोथियाँ, सूरत रहा सँवार;
यदि सीरत सँवरी नहीं, मान सभी बेकार।

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