सितंबर 2026

साहित्यकार, बड़ौदा हाउस अपार्टमेंट, सेक्टर 10, द्वारका, नई दिल्ली
आज़ादी के नाम पे युवा, करें हदें सब पार,
नव पीढ़ी की भाषा से अब, हार गए संस्कार!
राम-राम से ‘हाय’ हो गया, ‘ब्रो’ कहकर ये कूल हुए,
OMG, DM, स्टेटस, अब हैं इनके शब्द नए।
‘जेन-ज़ी’ मोबाइल को आज, साँसें अपनी कहते हैं,
भाषा को संक्षिप्त करें ये, मैसेज तेज़ लिखते हैं।
निज भाषा की जगह आज है, रोमन लिपि-भंडार,
नव पीढ़ी की भाषा से अब, हार गए संस्कार!
शब्दकोश अब गाली का है, OTT के चैनल सब,
बने स्टैंड-अप कॉमेडी शो, अशिष्टता के अड्डे अब।
वायरल होने की चाह में, गालियाँ रील में जोड़ें,
लाइक, कमेंट, शेयर ख़ातिर, शर्म-हया को ये छोड़ें।
सोशल मीडिया युवाओं को, देता अब आकार,
नव पीढ़ी की भाषा से अब, हार गए संस्कार!
रहीं अस्तित्व में सदियों से, यारो जहाँ में गालियाँ,
खुलकर गाली बस देते अब, ये लड़के और लड़कियाँ।
नई पीढ़ी को पूरी तरह, ग़लत नहीं हम कह सकते,
आजकल के माता-पिता भी, बच्चों से डरकर रहते।
सिखा न पाए बच्चों को हम, संयम-शिष्टाचार,
नव पीढ़ी की भाषा से अब, हार गए संस्कार!
