काशी विश्वनाथ के चरणों में

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वंदना खरे

रुद्राभिषेक की शीतल धार में
अपना सारा दर्द बहा आई हूँ,
“ॐ नमः शिवाय” की गूँज में
अपना मन आपको सौंप आई हूँ।

हे काशी विश्वनाथ,
अब कुछ नहीं माँगती—
बस अपनी कृपा की छाया रखना,
मेरे परिवार पर आशीष रखना,
और मेरे भीतर
विश्वास की ज्योति जलाए रखना।

हर बूँद ने मुझसे कहा—
“महादेव हैं…
तो भय कैसा?”

अब मेरी साँसों में आपका नाम हो,
मेरे हृदय में आपकी शरण हो।

दर्द आपका,
जीवन आपका,
और आने वाला हर पल—
बस आपका आशीर्वाद हो।

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