सितंबर 2026
प्रस्तावना
जब अपशब्दों का प्रयोग ‘सभ्य और आधुनिक’ होने का प्रतीक बनने लगे, तो यह केवल भाषा का नहीं, बल्कि समाज के अवचेतन और संस्कारों के संकट का रेखांकन है।
“कागा काको धन हरै, कोयल काको देय।
मीठे बचन सुनाइ के, जग अपनो कर लेय॥”
कबीरदास जी का यह दोहा सिद्ध करता है कि भाषा केवल शब्दों का संवहन नहीं करती, बल्कि आपके विचारों के साथ-साथ आपके भावों, संस्कारों और व्यक्तित्व की भी संवाहक होती है। हाल के दिनों में डिजिटल मीडिया, ओटीटी (OTT) कार्यक्रमों और दैनिक जीवन में युवाओं की भाषा में अपशब्दों और गालियों के बढ़ते प्रयोग ने भाषा को एक नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया है।
यह सत्य है कि भाषा एक सतत प्रवाह है; यह कभी स्थिर नहीं रहती। यदि यह ठहर जाए, तो धीरे-धीरे दूषित होकर लुप्त हो जाती है। किंतु वर्तमान समय में तीव्र सम्मिश्रण, भाषा एवं लिपि के बीच बढ़ती दूरी तथा तकनीकी कारणों से ऐसे अनेक परिवर्तन हो रहे हैं, जिनकी गति को समझना पुरानी पीढ़ी के लिए अत्यंत कठिन हो जाता है। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि जिसे पूर्व में अभद्र या असभ्य भाषा माना जाता था, उसे आज की युवा पीढ़ी ‘कूल’ (Cool) मानकर अपना रही है।
अपशब्दों का इतिहास और दृष्टिकोण में बदलाव
ऐसा नहीं है कि अभद्र भाषा का प्रयोग केवल वर्तमान युग में ही प्रारंभ हुआ है। यह समाज में सदैव विद्यमान था; वृद्ध-युवा, स्त्री-पुरुष सभी इसका यदा-कदा प्रयोग करते थे। महाभारत में शिशुपाल द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को भरी सभा में गालियाँ देना इसका सबसे प्रसिद्ध पौराणिक उदाहरण है। इसके अतिरिक्त भी हम समाज में ऐसे लोगों को सामान्य रूप से देखते आए हैं।
अनेक लोगों का मानना होता है कि अमुक भाषा अत्यधिक सभ्य है और उसमें कोई गाली नहीं है। लेकिन वास्तव में ऐसी कोई भाषा नहीं होती जिसमें मूलतः गालियाँ हों; अपितु प्रचलित सभ्य शब्दों में ही आवश्यकतानुसार कुछ हेर-फेर करके गालियाँ गढ़ ली जाती हैं।
तब प्रश्न उठता है कि वर्तमान समय में क्या परिवर्तित हुआ है? वास्तव में न तो गालियाँ बदली हैं और न ही उनके पीछे की भावना। बदला है तो केवल उनके प्रति दृष्टिकोण। पूर्व में गाली देने वालों को सामान्यतः सामाजिक और बौद्धिक रूप से कम विकसित माना जाता था। उनकी गणना सभ्य और विद्वान वर्ग में नहीं होती थी। किंतु अब शिक्षित युवाओं के बीच ऐसे अपशब्दों का प्रयोग आम बात हो गई है; इसे ‘सभ्य और आधुनिक’ होने का प्रतीक माना जाने लगा है। यह प्रवृत्ति अपशब्दों के व्यवहार को ‘सामान्य’ (Normalize) करने का गंभीर संकेत है।
पॉप-कल्चर और ‘कूल’ होने का भ्रम
क्या यह परिवर्तन एकाएक हुआ है? कदापि नहीं। “जो समाज में विद्यमान है, उसे छिपाना क्यों?” जैसे तर्कों के आधार पर फिल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों में गालियों का प्रयोग शनैः-शनैः प्रारंभ हुआ। विगत 10-15 वर्षों में ऐसी दर्जनों फिल्में बनीं। डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों ने इस प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा दिया।
ओटीटी (OTT) कार्यक्रमों, ‘बिग बॉस’ तथा हाल के स्टैंड-अप और पॉडकास्ट शो (जैसे ‘इंडियाज़ गॉट लेटेंट’ आदि) में न केवल गाली-गलौज का प्रयोग क्षणिक आवेश के रूप में किया जाने लगा, बल्कि इसे एक ‘शैली’ (Style) और ‘कूल गाय’ की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया। कुछ समय पूर्व रणवीर इलाहाबादिया और समय रैना से जुड़े विवादों ने इस विषय पर जनता का ध्यान आकर्षित भी किया। किंतु कुछ पुलिस शिकायतों और अल्पकालिक बहिष्कार के पश्चात स्थिति पुनः पूर्ववत हो गई। उल्टे, संपूर्ण विमर्श भाषा के बजाय केवल ‘अश्लीलता’ के मुद्दे पर केंद्रित होकर दो वर्गों में विभाजित हो गया।
शैक्षणिक संस्थानों में आयोजित होने वाले अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी फूहड़ और अश्लील चुटकुले तथा गाली-गलौज भरे संवाद देखने को मिलते हैं। चिंताजनक बात यह है कि युवा ऐसे आयोजनों में कोई दोष नहीं देखते।
केवल युवा ही नहीं, बल्कि प्रौढ़ पीढ़ी भी सार्वजनिक जीवन और सोशल मीडिया पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग करती देखी जाती है। इन सब परिस्थितियों से प्रभावित होकर युवाओं और किशोरों ने ऐसी भाषा को सहजता से ‘आधुनिकता’ के रूप में स्वीकार कर लिया। उन्हें कभी यह आभास ही नहीं हुआ कि इसमें कुछ त्रुटिपूर्ण हो सकता है; और जब कुछ गलत प्रतीत ही नहीं होता, तो फिर सुधार की आवश्यकता ही क्यों उठेगी!
अवचेतन मन और संस्कारों पर प्रहार
मानव समाज में भाषा केवल अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है; यह हमारे संस्कारों का दर्पण भी है। हम जो देखते हैं, सुनते हैं, बोलते हैं और पढ़ते हैं—उन सभी का हमारे अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
हमारे आसपास रहने वाले अबोध बालकों पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है; चाहे हम आदतवश बिना सोचे-समझे बोल रहे हों अथवा मित्रों के मध्य आवेश में आकर बोल रहे हों। जब असभ्यता और अमर्यादित भाषा को बार-बार ‘कूल’ और सामान्य कहकर दिखाया जाता है, तो समाज धीरे-धीरे भाषाई संवेदनशीलता खोने लगता है।
निष्कर्ष: भय नहीं, मर्यादा के बोध से होगा सुधार
दूसरी ओर, यह भी कटु सत्य है कि भाषा पर केवल सेंसरशिप, कानूनी भय अथवा दंड का डर दिखाकर नियंत्रण स्थापित नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें परिवार, शिक्षण संस्थानों और मीडिया के माध्यम से ‘सभ्यता और भाषाई सौंदर्य’ को पुनः एक नैतिक मूल्य के रूप में स्थापित करना होगा। हमें व्यवहार और विचार—दोनों स्तरों पर भाषा की गरिमा, मर्यादा और सुंदरता का महत्त्व पुनः प्रतिपादित करना होगा।
“बात लहजे की है वरना मिरे प्यारे भाई,
लफ़्ज़ जो तूने कहे हैं वो दुआ भी हैं।” — अविनाश राय

