नयी पीढ़ी की भाषा : बदलते संस्कारों का आईना

सितंबर 2026

सन्दीप तोमर
सन्दीप तोमर, अध्यापक,
जीवन पार्क, उत्तम नगर, दिल्ली

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज के संस्कार, संवेदना, सोच और उसके बदलते सामाजिक व्यवहार का आईना भी होती है। किसी व्यक्ति की भाषा सुनकर हम उसके ज्ञान का अनुमान भले हमेशा सही न लगा पाएँ, लेकिन उसके संस्कार, उसके परिवेश और कई बार उसकी मानसिकता की झलक अवश्य पा सकते हैं। यही कारण है कि भाषा का प्रश्न केवल शब्दों के सही या गलत इस्तेमाल का प्रश्न नहीं है; यह इस बात का भी प्रश्न है कि हम सार्वजनिक जीवन में किस तरह की अभिव्यक्ति को सामान्य और स्वीकार्य बना रहे हैं।

हर पीढ़ी अपनी भाषा लेकर आती है। नयी पीढ़ी की भाषा में नये शब्द जुड़ते हैं, पुराने शब्दों के अर्थ बदलते हैं, संक्षिप्त शब्द लोकप्रिय होते हैं, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के शब्द बड़ी सहजता से उसमें प्रवेश करते हैं। यह भाषाई परिवर्तन स्वाभाविक है। भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। लेकिन समस्या वहाँ शुरू होती है जहाँ भाषा में आने वाला परिवर्तन अभिव्यक्ति को समृद्ध करने के बजाय अश्लीलता, आक्रामकता या द्विअर्थीपन को आधुनिकता और ‘कूल’ होने का प्रमाण बनाने लगता है।

आज की पीढ़ी के सामने सोशल मीडिया, वेब सीरीज, रियलिटी शो, स्टैंड-अप कॉमेडी, फिल्मों, एफएम रेडियो और डिजिटल कंटेंट की इतनी बड़ी दुनिया है कि भाषा सीखने के स्रोत अब परिवार, विद्यालय और किताबों तक सीमित नहीं रह गए हैं। बच्चा घर से अधिक शब्द मोबाइल स्क्रीन से सीख रहा है। वह जिस शब्द को बार-बार सुनता है, उसके अर्थ को समझे बिना भी उसका इस्तेमाल करने लगता है। धीरे-धीरे वही शब्द उसकी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाता है।

यहाँ सवाल यह नहीं है कि नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जैसी भाषा क्यों नहीं बोलती। सवाल यह है कि क्या हम भाषा के विकास के नाम पर हर तरह की अभिव्यक्ति को स्वीकार कर लें?

भाषा का आधुनिक होना और भाषा का अश्लील होना एक ही बात नहीं है। यही प्रश्न एक दिन मेरे सामने भी आया।

एक बार एक मित्र से फोन पर बात हो रही थी। उन्होंने किसी अजय की सोशल साइट पर लिखी एक पोस्ट का हवाला देते हुए कहा- “आपने पढ़ी उनकी वह पोस्ट?”

असल में मैंने उस व्यक्ति की उजड्ड भाषा के चलते उससे किनारा किया हुआ है, लेकिन “राजनीति के सोनागाछी में सज गयी रंडियाँ बिकने को तैयार हैं…” जैसे वाक्य को पढ़कर किसी का भी माथा ठनक सकता है।

आपको जिंदगी में ऐसे कितने ही लोग मिलते हैं जिनकी भाषा की जानकारी कभी आपको उनके ज्ञान पर मुग्ध करती है तो कभी उनकी अज्ञानता पर शर्मिंदा भी कर सकती है। उक्त मित्र से बातचीत भाषा के मसलों से होती हुई आजकल के युवाओं द्वारा प्रयोग किए जाने वाले शब्दों पर टिक गयी।

मुझे लगता है कि आज का युवा न जाने कितने ऐसे शब्द धड़ल्ले से बोलता है, जिन्हें एक जमाने में वर्जित माना जाता था। यहाँ वर्जना से मेरा आशय यह नहीं है कि वे शब्द किसी शब्दकोश में नहीं थे; वे हमारे आसपास थे, गलियों और चौराहों पर बोले भी जाते थे। लेकिन उन्हें सबके सामने, विशेषकर अपने से बड़ों के सामने बोलने में एक संकोच होता था। आज वही संकोच तेजी से समाप्त हो रहा है।

मित्र से बात करते हुए मुझे याद आया कि किसी कपिल शर्मा के शो में अक्सर एक जुमला इस्तेमाल होता था- “बाबाजी का ठुल्लू।” आज की पीढ़ी ने टेलीविजन से सीखकर इसका प्रयोग भी बहुतायत में शुरू कर दिया है। आप कह सकते हैं कि सभ्य भाषा में इसका अर्थ ‘ठेंगे’ से लिया जा सकता है, लेकिन इसके वास्तविक लोक-प्रयोग का अर्थ केवल ‘ठेंगा’ मान लेना उचित नहीं होगा। इसके पीछे जिस तरह का द्विअर्थी और अश्लील संकेत है, वह इसे सामान्य पारिवारिक भाषा का हिस्सा बनाने पर प्रश्न खड़ा करता है।

एफएम रेडियो पर कुछ समय पहले एक कार्यक्रम प्रसारित होता था- ‘कह कर लूंगा’। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आम बोलचाल में इस शब्द-पुंज का क्या निहितार्थ लिया जा सकता है। ‘कह कर लूंगा’ अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के एक गाने का मुखड़ा भी है। कोई कह सकता है कि गाने में किसी की जान लेने की बात कही जा रही है, लेकिन क्या आप मानते हैं कि गीतकार ने इसे केवल उसी अर्थ में लिखा होगा?

यही सवाल हमें द्विअर्थी भाषा की पूरी दुनिया की ओर ले जाता है।

दादा कोंडके की फिल्मों के शीर्षकों को याद कीजिए- ‘अंधेरी रात में…’, ‘तू झुक…’, ‘पाँच कमरे…’ जैसे शीर्षक अपने भीतर किस तरह के संकेत समेटे हुए थे, यह बताने की जरूरत नहीं। इस तरह के द्विअर्थी शीर्षकों के पीछे कौन-सा मनोविज्ञान काम करता है, यह मैं नहीं जानता। हो सकता है यह सस्ती लोकप्रियता पाने का शॉर्टकट हो, हो सकता है व्यवसाय का कोई सफल औजार। लेकिन भाषाई स्तर पर मैं इसे दोयम दर्जे का प्रयोग ही मानता हूँ।

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ऐसे कई द्विअर्थी शब्द-समूह पिछले कुछ वर्षों में हाशिये को लांघकर मुख्यधारा का हिस्सा बन गए हैं। आज से तीस-बत्तीस साल पहले जिन जुमलों का इस्तेमाल कभी-कभार गिने-चुने लोगों के बीच, विशेष वातावरण में किया जाता था और इस बात का खास ध्यान रखा जाता था कि कोई अपने से बड़ी उम्र का व्यक्ति हमारी बातचीत न सुन ले, वही सस्ती भाषा अब हमारे ड्राइंगरूम में होने वाली बातचीत का हिस्सा बन रही है।

सार्वजनिक माध्यम और भाषा की जिम्मेदारी

किसी रेडियो कार्यक्रम को प्रसारित करते समय क्या इस बात का ध्यान नहीं रखना चाहिए कि उसे कोई एक विशेष वय-वर्ग ही नहीं, हर उम्र का श्रोता सुनता है? रेडियो के कार्यक्रम में प्रायः यह चेतावनी भी नहीं होती कि यह केवल वयस्कों के लिए है।

फिर सवाल उठता है कि क्या द्विअर्थी और अश्लील बात को परिवार के मनोरंजन की वस्तु बनाने की कोशिश उचित है? मनोरंजन के नाम पर भाषा की सीमाएँ लगातार पीछे खिसकती जाएँ तो आने वाली पीढ़ी उन सीमाओं को पहचानेगी कैसे?

मुझे अपने बीएड के दिनों का एक प्रसंग याद आता है। मेरी एक सहपाठी ने एक शब्द इस्तेमाल किया- ‘केएलपीडी’। 1990 से 2000 के बीच यह शब्द लड़कों के बीच खासा लोकप्रिय था। लोकप्रिय यानी खूब बोला जाने वाला। अमूमन हर लड़का हिंदी के शब्दों के इस संक्षिप्त अंग्रेजी स्वरूप का अर्थ जानता था। यह शब्द अपने विस्तार में बेहद अश्लील अर्थ देता है और लगभग वही संकेत करता है जो एक लोकोक्ति- ‘जहाँ जाए भूखा, वहाँ पड़े सूखा’, अपने ढंग से करती है।

मैंने उक्त सहपाठी से पूछा- “तुम जिस शब्द का अभी प्रयोग कर रही थीं, उसका अर्थ जानती हो?” उसने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए मुझसे पूछा- “तुम जानते हो?” मैंने अर्थ जानने की हामी भरते हुए उसे बता पाने में असमर्थता जाहिर की। लेकिन आज स्थिति यह है कि उस शब्द का विस्तारित स्वरूप जाने बिना छोटे-बड़े, लड़के-लड़कियाँ, सभी उसका भरपूर प्रयोग करते दिखाई पड़ते हैं।

बात केवल चंद शब्दों की नहीं है। कितने ही शब्द हैं जो आज भरपूर बोले जा रहे हैं, बिना उनका अर्थ जाने। कुछ को पूरे वाक्य में प्रयोग न करके आधे-अधूरे वाक्य के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन- ‘फट्टू’ जैसे शब्द।

विद्यालय में अध्यापन के दौरान कुछ बच्चों के आपसी वार्तालाप में ऐसे अनेक शब्द कानों में पड़ते हैं जिन्हें सुनकर आश्चर्य होता है।

“अबे, तेरी क्यों फट रही है?”

यहाँ किसी कागज, कपड़े, बाजू या पेंट के फटने की बात तो कम से कम नहीं हो रही होती।

फिर सवाल है- क्या यह पीढ़ी उस भाषा के निहितार्थ से अनजान है?

“तुझे क्यों लग गयी?”

“तेरी क्यों सुलगी पड़ी है?”

“ले ली।”

“तेरी लूंगा आज।”

“उंगली मत कर।”

“उखाड़ ले जो उखाड़ना है।”

जब ऐसे वाक्य घरों और स्कूलों में पहुँचने लगें तो मेरे विचार से यह एक गंभीर समस्या है, जिस पर अभी विचार किया जाना जरूरी है।

विडंबना यह है कि देश, धर्म, राजनीति, राष्ट्रवाद, वामपंथ-दक्षिणपंथ जैसे छोटे-बड़े मुद्दों पर तरह-तरह के सवाल-जवाब करने वाला समाज भाषा के इस प्रश्न पर लगभग मौन दिखाई देता है।

गली की भाषा और घर की भाषा

हो सकता है कि ये शब्द और शब्द-गुच्छ गलियों, चौराहों और दोस्तों की महफिलों में मस्ती की भाषा बन जाते हों। लेकिन उनमें श्लीलता-अश्लीलता को ढूँढ़ना बेमानी नहीं है। क्योंकि न तो ये शब्द घर की भाषा कभी थे और न इन्हें घर की भाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

गली-चौराहों पर अपने सस्ते रूप में इस्तेमाल होने वाले इन शब्दों को घर के रास्ते ड्राइंगरूम में पसरने से रोकना आवश्यक है।

ऐसे कुछ और शब्द-गुच्छ हैं- ‘ले ली’, ‘सुलग गईं’, ‘तेरी लूंगा आज’, ‘उंगली मत कर’ और ‘उखाड़ ले जो उखाड़ना है’। इनके सामान्य अर्थ खोज लेना शायद आसान है, लेकिन इनके लोक-प्रयोगों और संकेतों को समझने वाले जानते हैं कि इनमें से कई अभिव्यक्तियाँ अपने भीतर अश्लील संकेत समेटे रहती हैं।

उत्तर भारत के छोटे-बड़े शहरों और कस्बों से आने वाले अधिकांश लोगों ने लड़कपन में इनमें से कुछ शब्दों का इस्तेमाल अवश्य किया होगा। लेकिन खुलेआम इनका प्रयोग करने की परंपरा नहीं थी। इन्हें इस्तेमाल करने वाला युवा भी जानता था कि कौन-सा शब्द कहाँ बोला जा सकता है और कहाँ नहीं।

आज समस्या यह है कि वह भाषाई सीमा कमजोर हो रही है।

जो शब्द कभी दोस्तों की बंद महफिल में बोले जाते थे, वे अब सार्वजनिक बातचीत में आ रहे हैं। जो कभी केवल युवाओं के बीच इस्तेमाल होते थे, वे बच्चों की भाषा में भी पहुँच रहे हैं।

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सवाल यह भी है कि अगर इस पीढ़ी को इन शब्दों का असल मतलब पता हो तो क्या वे इन्हें सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल करने से बचेंगे? अगर उत्तर ‘नहीं’ है तो फिर समस्या केवल अज्ञान की नहीं, संस्कार की है। और यदि समस्या संस्कार की है तो केवल शब्दकोश उसे ठीक नहीं कर सकता।

‘कूल’ होने की भाषा

एक और वाकया याद आता है। दो बच्चों को आपस में बातचीत करते सुना। एक लड़के ने दूसरे से कहा- “तेल डाल दूँगा।” जाहिर है, वह कुकर में तेल डालने या किसी कुप्पे या शीशी में तेल डालने पर विमर्श नहीं कर रहा था।

दूसरे लड़के ने जवाब दिया- “अबे, तेल की शीशी और बोरा लेकर चौराहे पर बैठ जा।”

सोचा जा सकता है कि यह किसी व्यवसाय की बात हो रही थी या उस भाषा का विमर्श था जिसे परिवार में कभी वर्ज्य माना जाता था।

आज ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कई बार फैशन के रूप में सामने आता है। यहाँ फैशन से मेरा आशय चलन से नहीं, बल्कि आधुनिक और ‘कूल’ दिखने की मानसिकता से है।

इन्हें इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए शायद यह दूसरे को आकर्षित करने, अपने समूह में स्वीकार्यता पाने या अपनी आधुनिकता दिखाने का माध्यम भर है। लेकिन वे यह नहीं समझते कि भाषा में जो आज सामान्य हो रहा है, कल उससे आगे का शब्द सामान्य होगा।

आज का ‘कूल’ कल की सामान्य भाषा बनेगा और आने वाली पीढ़ी को उससे भी आगे जाना होगा।

भाषा में गिरावट हमेशा अचानक नहीं आती। वह धीरे-धीरे स्वीकार्यता के रास्ते आती है।

पहले हम किसी शब्द को सुनकर चौंकते हैं। फिर उसे सुनने के आदी हो जाते हैं। फिर उसका इस्तेमाल करने लगते हैं। फिर उसे मजाक में बोलते हैं। और अंततः एक दिन वही शब्द सामान्य लगने लगता है।

भाषा और परिवेश

इस तरह के जुमलों से अलग भी कुछ शब्द अलग-अलग क्षेत्रों में अलग अर्थ और सामाजिक स्वीकार्यता रखते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ‘साला’ शब्द आम बोलचाल में है और अनेक संदर्भों में समाज द्वारा लगभग स्वीकार्य भी माना जाता है।

अब्दुल बिस्मिल्लाह की कृति झीनी-झीनी बीनी चदरिया में लोकभाषा के अनेक ऐसे प्रयोग मिलते हैं। काशीनाथ सिंह के काशी का अस्सी में भी ऐसे शब्द पढ़ने को मिलते हैं जो अपने स्थानीय परिवेश में खूब प्रचलित हैं, लेकिन जिन्हें हर परिवार में सहजता से स्वीकार कर लिया जाए, यह जरूरी नहीं। डॉ. राही मासूम रज़ा भी अपनी रचनाओं में लोकभाषा, गालियों और बोलचाल की अभिव्यक्तियों के इस्तेमाल के लिए चर्चित रहे हैं।

यहाँ साहित्य और सामान्य बातचीत के बीच का अंतर समझना जरूरी है। साहित्य में किसी पात्र की भाषा को उसी के सामाजिक परिवेश के साथ प्रस्तुत करना और वास्तविक जीवन में उसी भाषा को हर परिस्थिति में सामान्य मान लेना दो अलग बातें हैं। साहित्य में गाली किसी पात्र के चरित्र, परिवेश, वर्ग या मानसिकता को व्यक्त करने का औजार हो सकती है; लेकिन वही गाली यदि विद्यालय, परिवार, सार्वजनिक मंच या बच्चों की सामान्य बातचीत का हिस्सा बन जाए तो उसका मूल्यांकन अलग ढंग से करना होगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में यदि आप जाएँ तो वहाँ के आपसी वार्तालाप को सुनकर आपको हैरत हो सकती है। दो सगे भाई, बाप-बेटा, माँ-बेटी या दो दोस्त अथवा दो सहेलियाँ भी बातचीत में स्त्री-अंगों पर आधारित गालियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

संभव है कि वह उस परिवेश की विशिष्टता हो। संभव है कि वहाँ उन शब्दों की सामाजिक संवेदना बदल गयी हो। लेकिन किसी शब्द का लगातार इस्तेमाल उसे अपने आप शालीन नहीं बना देता। किसी अश्लील शब्द को बार-बार बोलने से वह संस्कारी शब्द नहीं हो जाता।

अर्थ जाने बिना शब्द बोलने का संकट

असल में नयी तरह से तैयार हो रही इस पीढ़ी के लिए भाषाई जानकारी होना या न होना उतना मायने नहीं रखता, जितना उसके लिए समूह में स्वीकार्य होना मायने रखता है।

उसे यह पता नहीं होता कि शब्द कहाँ से आया है। यह भी पता नहीं होता कि उसका वास्तविक अर्थ क्या है। उसे बस यह पता होता है कि उसके मित्र उसे बोलते हैं, सोशल मीडिया पर लोग उसे लिखते हैं, फिल्मों में अभिनेता बोलते हैं और कॉमेडी शो में उस पर लोग हँसते हैं। बस, वही पर्याप्त है।

भाषा अब कई बार अर्थ से पहले प्रदर्शन बन गयी है।

कुछ दिन पहले एक महिला मित्र से बातचीत के दौरान किसी अन्य पुरुष मित्र पर चर्चा चली। महिला मित्र ने कहा- “अरे, आप भी किस ‘चूतिया’ की बात कर रहे हैं।”

मैं इस शब्द का शाब्दिक अर्थ जानता था, तथापि मेरे सामने किसी महिला द्वारा इस शब्द का प्रयोग पहली बार हुआ। महिला ही नहीं, मेरी पीढ़ी के पुरुषों द्वारा भी मैंने इस शब्द को परिवार या घर की बातचीत में प्रायः नहीं सुना था। इसलिए मेरे लिए यह थोड़ा अप्रत्याशित था।

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इस शब्द की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं। इसे संस्कृत के ‘च्युत’ से जोड़ने वाली व्युत्पत्ति भी कही जाती है, जबकि असम में ‘चूतिया’ अथवा ‘सूतिया’ नाम से एक समुदाय के संदर्भ भी मिलते हैं। इसलिए किसी एक लोक-व्युत्पत्ति को अंतिम सत्य मान लेना भाषावैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

यहाँ मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न शब्द की व्युत्पत्ति नहीं, उसका वर्तमान सामाजिक अर्थ और प्रयोग है।

किसी शब्द का इतिहास जान लेने मात्र से उसका वर्तमान प्रयोग स्वतः शालीन नहीं हो जाता। और किसी शब्द का वर्तमान अर्थ अश्लील हो जाने से उसके इतिहास का हर अर्थ अश्लील नहीं हो जाता।

भाषा को समझने के लिए दोनों बातों के बीच फर्क करना जरूरी है।

शालीनता का अर्थ भाषा को बाँधना नहीं

यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है कि भाषा की शालीनता की बात करना भाषा को बाँधने की बात नहीं है।

भाषा में गालियाँ भी हैं, लोकभाषाएँ भी हैं, मुहावरे भी हैं, व्यंग्य भी है और विद्रोह भी। साहित्य ने हमेशा समाज के उन हिस्सों की भाषा को जगह दी है जिन्हें तथाकथित सभ्य समाज अक्सर दबाना चाहता रहा है।

समस्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। समस्या है- अभिव्यक्ति के संदर्भ का खत्म होना।

हर शब्द हर जगह नहीं बोला जा सकता। हर मजाक हर व्यक्ति के सामने नहीं किया जा सकता। हर अभिव्यक्ति हर उम्र के व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। यही सामाजिक भाषा का पहला पाठ है।

एक बच्चा जब स्कूल में प्रवेश करता है तो केवल विज्ञान, गणित और भाषा नहीं सीखता; वह यह भी सीखता है कि शिक्षक से कैसे बात करनी है, मित्र से कैसे बात करनी है, घर में दादा-दादी से कैसे बात करनी है और सार्वजनिक स्थान पर किस भाषा का इस्तेमाल करना है।

सभ्यता का एक अर्थ यह भी है कि हम जानते हों- कहाँ क्या कहना है।

कौन रोकेगा इस भाषा को?

सवाल यह नहीं कि आज के युवा ऐसी भाषा क्यों बोलते हैं। सवाल यह है कि उन्हें ऐसी भाषा मिली कहाँ से?

घर ने उन्हें क्या दिया? विद्यालय ने क्या सिखाया? सिनेमा ने क्या दिखाया? टेलीविजन ने क्या सामान्य बनाया? सोशल मीडिया ने किस भाषा को वायरल किया? और हम दर्शकों ने किस भाषा पर हँसकर उसे स्वीकार्यता प्रदान की?

जब कोई बच्चा पहली बार ऐसा शब्द बोलता है तो उसके आसपास के लोग हँसते हैं। वह बच्चा उस हँसी को पुरस्कार की तरह लेता है। अगली बार वह वही शब्द और आत्मविश्वास से बोलता है। फिर उसके दोस्त उसे दोहराते हैं। धीरे-धीरे वह शब्द समूह की पहचान बन जाता है। इस तरह अश्लील भाषा केवल शब्दों से नहीं फैलती; स्वीकृति से फैलती है।

इसलिए यदि हम सचमुच भाषा की शालीनता बचाना चाहते हैं तो केवल बच्चों को डाँटना पर्याप्त नहीं होगा। हमें अपने मनोरंजन, अपने मीडिया, अपनी बातचीत और अपनी डिजिटल संस्कृति को भी देखना होगा।

बच्चों से यह कहना कि “ऐसे शब्द मत बोलो” आसान है। लेकिन जब वही बच्चा मोबाइल खोलकर ऐसे शब्दों पर लाखों लाइक देखता है तो हमारी सीख उसके सामने कितनी टिकेगी?

भाषा की बत्ती बुझने से पहले

इंसान पूरी जिंदगी इस बात को सीखने में लगा देता है कि समाज में कैसे बोलना है। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, सामाजिक व्यवहार का अनुशासन भी है।

हमें यह सीखना होता है कि किससे क्या कहना है, किस लहजे में कहना है और किस शब्द का इस्तेमाल किस जगह करना है।

यदि हम यह सीखना बंद कर देंगे तो भाषा में शब्द तो बहुत रहेंगे, लेकिन संवाद की शालीनता धीरे-धीरे समाप्त होती जाएगी।

भाषा का विकास जरूरी है। नये शब्द आने चाहिए। नयी पीढ़ी अपनी अभिव्यक्ति गढ़े, यह भी जरूरी है। पुरानी पीढ़ी को हर नये शब्द से डरना भी नहीं चाहिए। लेकिन नवीनता और अश्लीलता को एक-दूसरे का पर्याय बना देना भाषा का विकास नहीं है।

हमारी चिंता किसी एक शब्द से नहीं, उस मानसिकता से है जो हर शब्द को इसलिए स्वीकार कर लेना चाहती है क्योंकि वह ‘कूल’ है।

कल आने वाली पीढ़ी आज से भी आगे जाएगी। यह स्वाभाविक है। वह हमसे ज्यादा खुलेपन के साथ बोलेगी, नये शब्द बनाएगी, पुराने शब्दों को बदलेगी और शायद हमारी आज की भाषा उसे बहुत संकोची लगे।

लेकिन यदि हमने भाषा की शालीनता की कोई सीमा ही नहीं छोड़ी, तो आने वाली पीढ़ी के पास आगे बढ़ने के लिए केवल अश्लीलता की सीढ़ियाँ बचेंगी। और तब सवाल यह नहीं होगा कि हिन्दी कितनी समृद्ध हुई। सवाल यह होगा कि हिन्दी में बोलने लायक क्या बचा?

भाषा की बत्ती बुझने से पहले हमें यह तय करना होगा कि आधुनिक होना है या केवल अश्लील दिखना है। क्योंकि भाषा का आधुनिक होना जरूरी है, लेकिन भाषा का सभ्य रहना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो शायद सचमुच मेरे लिए किसी दूसरे बेहतर विषय पर चिंतन-मनन करना ही उचित होगा।

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