मार्च 2026
(लेखक परिचय: 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह और एक आत्मकथा के अतिरिक्त अनेक रचनाएँ साझा संग्रह, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबसाइट में सतत प्रकाशन।

अध्यापक,
जीवन पार्क, उत्तम नगर, दिल्ली
अमरेश बाबू बुढ़ापे की दहलीज पर निरा अकेले थे, पत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चूका था, बच्चे अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त कि उन्हें पल भर को फुर्सत नहीं कि पिता का हाल-चाल भी पूछ सकें। पोते-पोती स्कूल और उसके बाद ट्यूशन क्लास में व्यस्त हो जाते।
एकाकी जीवन से त्रस्त अमरेश बाबू एक दिन मर गए। घर में शोक कम और चिंता ज़्यादा थी — उनके मोबाइल का फेस-लॉक कैसे खुलेगा? बैंक अकाउंट, शेयर, क्रिप्टो वॉलेट, प्रॉपर्टी डील, यहाँ तक कि लॉकर का पासकोड — सब उसी स्क्रीन के पीछे बंद। पड़ोस के सोमनाथ बाबू के मरने पर उनके परिवार ने मृत चेहरे को फोन के सामने रखा था लेकिन तकनीक का अपना अहंकार; वह मरे हुए चेहरों से बातचीत नहीं करती। फोन बार-बार कहता रहा था— ‘Face not recognized.’
रोना बाद में किया जाता है, पहले पासवर्ड खोले जाते हैं — यही आधुनिक शोक प्रक्रिया है। लेकिन अमरेश बाबू का तो शव भी घर पर नहीं था, सुझाव आया — शव-संरक्षण केंद्र से कुछ देर के लिए चेहरा घर ले आएं; पैसा ज़्यादा ज़रूरी है। कैंची से रिश्तों को काटने जैसा एक फ़ैसला हुआ और कैल्कुलेटर ने आँसूओं की कीमत तय कर दी— तीन घंटे का चेहरा तीस हज़ार, छह घंटे पचास हज़ार, चौबीस घंटे पैकेज ऑफर के साथ। बेटा ठंडे कमरे में गया, बाप को अंतिम बार पकड़कर नहीं, अंतिम बार अनलॉक करने की कोशिश के साथ। स्क्रीन हर बार चमकी — ‘Try again.’ बेटे की आवाज़ काँप उठी— ‘कम से कम मरने के बाद तो पहचान लो…’ लेकिन अब बाप की पहचान भी डिजिटल हो चुकी थी और एक्सपायर भी।
वापस आकर परिवार ने वकील से पूछा— ‘बिना चेहरा मिले विरासत कैसे मिले?’ जवाब मिला — ‘पहचान ज़िंदा हो तो ही विरासत तक पहुँचा जा सकता है।’ मोबाइल अब मेज़ पर पड़ा था, एक बंद तिज़ोरी की तरह। रिश्ते और यादें दोनों लॉक हो चुके थे। सुबह घर में सिर्फ एक नोटिफिकेशन गूँजा — ‘Your password will never be recovered.’ और पहली बार घरवालों को समझ आया — इस शहर में इंसान नहीं, उनके पासवर्ड मरते हैं।
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