मार्च 2026

समरपार्क, निपानिया
इंदौर, मप्र
जज, वकील, डॉक्टर, दुल्हा, अम्पायर, साब, बड़े वाला साब जब तक कोट नही पहने वें, वो नही होते? बगैर कोटधारी को, कोई साब, बड़ा आदमी ही नही मानते? अपने कोटों से प्रेम करते है साहब। उनकी वजह से ठंड के आने का इंतजार करते है। कोट है तो ठंड है और ठंड से ही कोट की बखत है। ठंड के मौसम में वो लगातार कोट पहनते है। बदल-बदल कर पहनते है। वे जानते है, साहब की गरिमा कोट से है। उनके पास ढेर सारे कोट होते हैं और वो अपने कोटों की वजह से भी साहब होते है। साहबी बताने के लिए वें अक्सर मई-जून की गर्मी में भी ये कोट घालते है? कोट अंग्रेजों की देन है। अंग्रेज साहब रहे हैं हमारे। कोट सत्ता का प्रतीक। सत्ता के हाथ मे हंटर।
सामने झुकने का रिवाज
आज़ादी के पहले कोई गोरा दिख भर जाए हमारे सरल मन देहाती उनके रौब मे आ जाते थे। अंग्रेजी में कोट माने पक्का मकान, दुर्ग, राजमहल, दूसरा कोट का मतलब परत, लेयर तीसरे कोट का मीनिंग खाट या चारपाई से है। कोट वाले अकारण इज़्ज़त से पेश आते थे उससे। यथोचित दूरी बना कर रखते थे उससे। फिर अंग्रेज चले गए, जाते वक्त अपने कोट छोड़ गए। हम लोग कोट को इज्जत देने लगे और कोट के अंदर मौजूद आदमी वीआईपी मान लिया गया। कोट के कारण ऐसे ऐसे लोग इज्जत के हकदार हुए जो पास बैठाने के लायक़ भी नही थे। आम आदमी अपनी जिंदगी मे अपनी शादी के दिन कोट पहनने का हकदार होता है। मेरी मई के अधबीच में शादी थी। एक बुजुर्ग ने फरमाया शादी करने के लिए कोट सिलवाओ, बहुत जरूरी है। मैंने कहा भीषण गर्मी में कोट की क्या जरूरत? उन्होंने कहा कोट नही पहनोगे तो लोग तुम्हे शादीशुदा नही मानेंगे। कोट नही तो दूल्हा नही, शादी नही? उस दिन पहना कोट का त्रास विगत चालीस साल से भुगत रहा हूँ। कोट तो साल भर बाद ही छोटा पड़ गया और मैं मोटा? हम हिंदुस्तानी कोट पहनने के प्रति अति उत्साही होते है कि भरी गर्मी मे ब्याह होने पर भी कोट मे घुस जाते है। साहब खास होता है इसलिए वो कभी भी कोट पहन सकता है। आम यदायदा कोट घालता है। गरीब कोट पहनने हेतु अधिकृत नही है। सरकारी आदमी आमतौर पर अक्टूबर से कोट पहनना शुरू कर देता है और फ़रवरी बीतते बीतते तक कोटों के मोह से मुक्त नही हो पाता। कोट पहनने वाला आदमी, अंग्रेज़ी जाने बिना भी अंग्रेज़ होता है। बिना मतलब के फूला फूला फिरता है। सबकी तवज्जो चाहता है और न मिलने पर अनमना हो जाता है। ये सारे गुण सरकारी साहबों मे साल के बारहों महीने मौजूद होते है पर ठंड के दिनों मे कोट पहनते ही और सवाये हो जाते है। ऐसे मे ठंड के दिनों में सरकारी साहबों से दूर रहना ही ठीक है तभी मिलें उनसे जब आपको उनसे कोई जरूरी काम हो। मरने जीने की नौबत आन पड़ी हो। जब भी मिले उनके कोट की तारीफ जरूर करे। आपके ऐसा करने से साहब खुश हो सकता है और जब साहब खुश हो तो उससे जो चाहो सो करवाया जा सकता है।
साहब मुकेश नेमा सर की डिस्पेच इस कड़क ठंड में मगज में जमी और लगा ये व्यंग्य इस भीषण शीत लहर में दौड़ लगाएगा तो पेशे खिदमत है। पढ़े और मुकेश नेमा सर का नाम लेकर खिलखिलाए। भले इसे नकल समझे पर हंसे जरूर। हंसना आजकल दुर्लभ है। रोना तो इस परिवेश में सहज, सरल, सुलभ है? कोट साहबी का तो प्रतीक है ही किंतु हिंदी में परत का अर्थ भी रखती है। पुताई में तीन कोट के बाद रंग जमता है लेकिन इंसान को एक कोट रंगबाज बना देता है। महफ़िल में कोटबाज व्यक्ति ही गा सकता है- ‘साला मैं तो साब बन गया। साब बनके कैसा तन गया’ साधारण कपड़े वाला नही? शादी में बगैर कोट वाले को कोई शादीवाला नही समझता? कोट, ठंड से बचने का साधन कम, साहबी दिखाने का टोटका ज्यादा होता है। इस से अंग्रेजियत एवं जैकेट से गैर अंग्रेजियतता नजर आती है।
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