उत्सव और गले में लटकता कार्ड (व्यंग्य)

मार्च 2026

राजेंद्र ओझा
राजेंद्र ओझा
वामन राव लाखे,
कुशालपुर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

ऐसी जगहों पर आपका चेहरा नहीं आपके गले में लटकता प्रतिनिधि कार्ड आपके बहुत नहीं तो कुछ ही सही, लेकिन महत्वपूर्ण होने को बताता है और इसीलिए आपका ध्यान कार्यक्रम में चल रहे संवाद या कविता – कहानी पाठ को सुनने में कम, उल्टा हो जाने पर कार्ड को सीधा करने में लगा रहता है।
इसे पहनने में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि यह पेट तक न लटक जाए, छाती तक ही रहे ताकि दूर से ही दिख जाए। ऐसे अवसरों पर कुछ-कुछ ग्रुप तो ऐसे व्यक्ति को भी अपने साथ रखते हैं, जिसकी लिखावट सुंदर होती है। कार्ड में नाम लिखने का काम उसी को सौंपा जाता है। वह भी अपनी अहमियत समझता है और “रूकना यार, एक का नाम तो पूरा लिख लेने दे, फिर तेरा ही कार्ड।”
पक्का ना? पहला कुछ निश्चित होना चाहता है।
वह अंगुठे और उंगली की चिमटी बना गले में निकल आई हड्डी को छूकर ‘गौ की’ बोलता है।
यह क्रिया पहले को न केवल आश्वस्त करती है अपितु उसे लगता है कि उसने नाम लिखने वाले से ‘हाँ’ करवाकर आधी जंग तो जीत ली।
सामने से आ रहे ऐसे ही एक प्रतिनिधि कार्डधारक को रोककर पूछा – भैया, ये कार्ड कहाँ मिलता है?
उसने पहले अपने कार्ड को देखा, वह संतुष्ट हुआ कि कार्ड सीधा ही है और इस बात पर गर्वित भी हुआ कि वह इस कार्ड के भरोसे ही सही लेकिन वैसा तो बन ही गया है जिससे कुछ पूछा जा सके।
उसने कार्ड को हाथ में लिया और मेरी तरफ देखा फिर धीरे से मेरे कंघे पर हाथ रखकर, मुझे ढांढस बंधाते हुए बोले – बेटा, यह कार्ड सभी को नहीं मिलता, आयोजकों, मैनेजरों को मिलता है।
मैंने पूछा – आप आयोजक —
वे बोले – नहीं, मैनेज। उन्होंने ‘र’ को “नरो वा कुंजरो वा” की तरह इतना धीमा बोला कि वह सुनाई ही नहीं दिया।
सुनाई न देना, समझ में नहीं आना नहीं होता। फिर भी मैंने उन्हें जबरदस्त ‘मैनेज’र होने पर बधाई दी और आगे बढ़ गया।
भूख लगी थी और ऐसे महोत्सवों में खाने की व्यवस्था भी रहती ही है। मैंने ऐसे ही एक कार्डधारी से पूछा – भैया, भोजन व्यवस्था कहाँ है?
उन्होंने मेरे सुने गले को देखा, फिर अपने भरे गले को देखा और और कार्ड हाथ में लेकर और मुझे दिखाते हुए बोले – ये तो आपके गले में लटकता हुआ नहीं दिख रहा है।
मैंने भी मायुस होते हुए कहा – ‘नहीं है।’
‘कार्ड नहीं तो कूपन भी नहीं’ का जवाब देते हुए वे आगे बढ़ गए।
‘साहित्योत्सव की उपादेयता’ विषय पर केंद्रित कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला था। प्रथम पंक्ति में वे कार्डधारी बैठे थे, जिनसे कुछ समय पहले मिलना हुआ था। मुझे देखकर वे यह बोलना ही चाह रहे थे कि ‘पीछे बैठ जा, जगह खाली है’ उतने में संचालक ने मेरा नाम पुकारा।
मैं स्टेज पर ऊपर चढ़ रहा था और वे गले में लटके कार्ड को निकालते हुए मंडप से बाहर की तरफ जा रहे थे।
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