मार्च 2026

यूट्यूब चैनल योग साहित्य संस्कृति
शिवपुरी, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
(लेखक परिचय: साहित्यकार एवं समाजसेवी। योग और एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ। 13 दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें, 4 दर्जन से अधिक साझा संग्रह, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों रचनाओं का प्रकाशन, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण)
11 सितम्बर 1857 का दिन था, जब बिठूर में एक पेड़ से बंधी तेरह वर्ष की किशोरी को ब्रिटिश सेना ने जीवित ही आग के हवाले कर दिया था। धूँ-धूँ कर जलती किशोरी उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई राख में तब्दील हो गई।
ये वीरांगना थी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री मैना कुमारी, जिसे 160 वर्ष पूर्व आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जीवित जला दिया था।
जिसने 1857 क्रांति के दौरान अपने पिता के साथ जाने से इसलिए इनकार कर दिया था कि कहीं उसकी सुरक्षा के चलते उसके पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये और उसने बिठूर के महल में ही रहना उचित समझा।
नाना साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी और जैसे ही उन्हें पता चला नाना साहब महल से बाहर हैं, ब्रिटिश सरकार ने महल को घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिकों के साथ बस मैना कुमारी ही मिलीं।
मैना कुमारी ब्रिटिश सैनिकों को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी। यह देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ाने का आदेश दिया। आदेश देकर वह वहाँ से चला गया। आदेश के तामिल के लिए वह अपने कुछ सिपाहियों को वहीं छोड़ गया।
रात को मैना को जब लगा कि सब लोग जा चुके हैं और वह बाहर निकली तो दो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया।
आउटरम ने पहले मैना को एक पेड़ से बंधवाया, फिर मैना से नाना साहब के बारे में और क्रांतिकारियों की गुप्त जानकारी जाननी चाही पर उसने मुँह नहीं खोला।
यहाँ तक की आउटरम ने मैना कुमारी को जिंदा जलाने की धमकी भी दी, पर उसने कहा कि वह एक क्रांतिकारी की बेटी है मृत्यु से नहीं डरती।
ये देख सुनकर आउटरम तिलमिला गया और उसने मैना कुमारी को जिंदा जलाने का आदेश दे दिया, इस पर भी मैना कुमारी बिना प्रतिरोध के आग में जल गई, ताकि क्रांति की मशाल कभी न बुझे।
हम सभी कृतज्ञ हैं। हम भारतीय शत-शत नमन और वंदन करते हैं इस महान बाल वीरांगना को।
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