साहित्य में बाज़ारवाद: धन का स्वरूप और नैतिक दायित्व

बबीता झा
जून, 2026


एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक असुर की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे अपार संपदा और वैभव प्रदान करना चाहा। किंतु उस असुर ने यह कहकर उसे लेने से मना कर दिया कि अति-धन से जीवन में बुराइयाँ आती हैं। भगवान उसकी इस निर्लोभ भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे समझाते हुए बोले—”धन अपने आप में न तो अच्छा होता है और न ही बुरा; बल्कि किस उद्देश्य और किस प्रकार से उसका उपयोग किया जाता है, वही उसे अच्छा या बुरा बनाता है। यदि तुम इस संपदा का स्वामी बनकर नहीं, बल्कि इसे ईश्वर का उपहार मानकर व्यय करोगे और स्वयं को धन का स्वामी न मानकर उसका विवेकपूर्ण संरक्षक (Trustee) मानोगे, तो यह धन तुम्हारे लिए कभी दुःखदायी नहीं होगा।”
उस असुर ने उस संपदा का प्रबंधन इसी सात्त्विक भावना से किया। उस संपदा के आने से न तो उसमें कोई अहंकार आया और न ही वह विलासिता में डूबा। उसने धन का प्रबंधन और वितरण इतनी कुशलता व धर्मपूर्वक किया कि आगे चलकर उसे देवताओं का कोषाध्यक्ष (कुबेर) बना दिया गया और देवताओं के समान ही पूज्य माना गया। यह असुर मुनि विश्रवा और असुर कन्या देववर्णिनी (इलविला) का पुत्र कुबेर (वरुण/वैश्रवण) था। किंतु, इसी कुबेर के सौतेले भाई रावण में शक्ति और वैभव का ऐसा प्रचंड अभिमान जागृत हुआ कि अंततः उसके कुल सहित उसका संपूर्ण विनाश हो गया।
इस प्रसिद्ध कथा का मूल सार यही है कि धन अपने आप में बुरा या अच्छा नहीं होता, बल्कि मनुष्य का दृष्टिकोण और उसका उपयोग ही उसे शुभ या अशुभ बनाता है।
1. साहित्य, धन और ‘बाज़ारवाद’ का अंतर
धन का यह शाश्वत नियम हर काल और क्षेत्र पर लागू होता है—फिर चाहे वह साहित्य ही क्यों न हो। एक साहित्यकार को भी अपना जीवन चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है, अतः साहित्य-सृजन से धन अर्जन करना पूर्णतः स्वाभाविक और न्यायसंगत है। यदि साहित्य खरीदा और बेचा जाता है, तो इसमें कोई अधर्म नहीं है, क्योंकि इससे साहित्यकार को उसके कठिन परिश्रम और प्रतिभा का मूल्य मिलता है ताकि वह स्वाभिमान से जीवनयापन कर सके।
किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब साहित्य नहीं, बल्कि साहित्यकार बिकने लगते हैं। तब यह क्रय-विक्रय केवल ‘बाज़ार’ तक सीमित न रहकर ‘बाज़ारवाद’ (Commercialism) का बीभत्स रूप ले लेता है।
2. बाज़ारवाद का त्रिआयामी दुष्प्रभाव
जो लेखक या साहित्यकार आर्थिक रूप से संपन्न हैं, वे अपनी साधारण रचनाओं को भी भारी धन खर्च करके प्रकाशित करवा लेते हैं, उनका व्यापक प्रचार-प्रसार करवाते हैं, और विविध मीडिया माध्यमों से अपनी एक ऐसी कृत्रिम पहचान निर्मित कर लेते हैं जिसे आधुनिक व्यापार की भाषा में ‘ब्रांडिंग’ कहा जाता है।
इस बाज़ारवादी होड़ का घातक प्रभाव 3 प्रमुख वर्गों पर पड़ता है:
प्रतिभावान साहित्यकार: वे योग्य और मौलिक लेखक, जो आर्थिक अभाव के कारण पाठकों तक पहुँच ही नहीं पाते और उपेक्षित रह जाते हैं।
सहृदय पाठक: वे प्रबुद्ध पाठक, जिन तक बाज़ार के शोरगुल के कारण सच्चा और ‘सद-साहित्य’ पहुँच ही नहीं पाता।
स्वयं साहित्य: वह साहित्य, जिसकी गुणवत्ता में कोई वृद्धि नहीं हो पाती। निर्धन साहित्यकार प्रोत्साहन और साधनों के अभाव में, तथा धनी साहित्यकार आवश्यकता और लगन के अभाव में साहित्य की गुणवत्ता में योगदान नहीं दे पाते।
3. बाज़ार की समझ बनाम साहित्य की समझ
परंतु, इस बाज़ारवादी व्यवस्था का लाभ कुछ विशेष चतुर लोगों को अवश्य मिलता है। लाभ उन लोगों को होता है जो बाज़ार के स्वभाव को भली-भांति पहचानते हैं, थोड़ा-बहुत तकनीकी ज्ञान रखते हैं या फिर साहित्यिक गुटबाज़ी और संपर्क (Networking) बनाने में कुशल होते हैं।
आज विभिन्न साहित्यिक मंचों पर अधिकांश ऐसे ही लेखक सबसे अधिक ‘बिकाऊ’ और चर्चित बने हुए हैं जिनमें ये व्यावसायिक गुण हैं। साहित्य, संवेदना और समाज की गहरी समझ होना अब ऐसे लेखकों के लिए आवश्यक नहीं रह गया है; केवल ‘बाज़ार की चाल’ समझ लेना ही उनके लिए पर्याप्त हो गया है।
4. समाज के दर्पण पर पड़ता धुंधलका
जब भी हम किसी कालखंड या समाज-विशेष के इतिहास और चेतना को समझना चाहते हैं, तब हम उस युग का साहित्य पढ़ते हैं; क्योंकि यह सर्वमान्य है कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है।’
परंतु विचार कीजिए कि यदि बाज़ार के दबाव और धन के अहंकार में यह दर्पण ही धुंधला या विकृत हो जाए, तो भावी पीढ़ियों को समाज का कौन सा रूप दिखाई देगा? यही ‘साहित्य में बाज़ारवाद’ का सबसे बड़ा संकट है। ऐसा बाज़ार-केंद्रित साहित्य पाठकों को गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित नहीं कर सकता, न ही उनकी सोई हुई मानवीय संवेदनाओं को झकझोर सकता है। ऐसा साहित्य अंततः अपने मूल सामाजिक उद्देश्य से ही भटक जाता है।
समस्या साहित्य में धन के प्रवेश या उपयोग से नहीं है, बल्कि समस्या धन के उस दुरुपयोग से है जहाँ धन का व्यय साहित्य की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय केवल साहित्यकारों की व्यक्तिगत ब्रांडिंग और प्रचार में होता है।
इस आसन्न खतरे से बचाव का केवल एक ही मार्ग है—साहित्य अवश्य बिके, पर साहित्यकार कभी न बिके।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कालजयी पंक्तियों में कहें तो:
“जो अगणित लघु दीप हमारे, तूफ़ानों में एक किनारे,
जल-बुझ कर किसी दिन, माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल॥”

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