मार्च, 2023
रामायण का एक प्रसंग है— सीता-हरण हो चुका था। राम और लक्ष्मण दोनों भाई उनकी खोज में थे। कबंध ने उन्हें इसके लिए सुग्रीव से मिलने की सलाह दी। किंतु, सुग्रीव उस समय अपना राज्य ही नहीं, बल्कि अपना घर और परिवार भी खोकर अपनी जान बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भाग रहे थे। ऐसे में उनके पास ऐसा क्या हो सकता था जिससे वे राम की सहायता कर सकते? कबंध को सुग्रीव पर इतना भरोसा क्यों था? इसका कारण था सुग्रीव का भूगोल का ज्ञान!
अपने भाई बाली से जान बचाकर भागने के क्रम में अपनी सुरक्षा के लिए वे कभी भी एक स्थान पर ज़्यादा दिनों तक नहीं रहते थे। वे प्रायः दुर्गम स्थानों पर रहते थे। इसी क्रम में उन्हें किष्किंधा से लेकर लंका तक के, यानी समस्त दक्षिण भारत के, भौगोलिक परिदृश्य का बहुत अधिक व्यावहारिक ज्ञान हो गया था। यह ज्ञान उन्हें किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी से नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से सीखने को मिला था। जब उनके पास कुछ नहीं था, तब भी यह ज्ञान और सूचना उनके मस्तिष्क में थी। इसीलिए कबंध को इतना भरोसा था कि उनका ज्ञान सीता की खोज में अवश्य काम आएगा।
कबंध का यह भरोसा सच साबित हुआ। सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर जाने वाले दल को सुग्रीव ने रास्तों और उनकी कठिनाइयों के विषय में बहुत अच्छे से निर्देश दिया था। इससे सीता की खोज में बहुत सहायता मिली। इतना ही नहीं, इसी ज्ञान के कारण उन्हें भगवान राम से मैत्री का अवसर मिला, जिसके परिणामस्वरूप वे अपना खोया हुआ राज्य और परिवार फिर से पा सके।
स्पष्टतः, जब व्यक्ति अपना सब कुछ खो देता है, तब भी अगर उसके पास कोई विशेषज्ञता हो, कोई ज्ञान हो और शांतचित्त होकर उसका उपयोग करने का धैर्य हो, तो व्यक्ति बहुत कुछ पुनः प्राप्त कर सकता है।
स्टीव जॉब्स ने एक बार अपने जीवन की कुछ ऐसी घटनाओं/वाक्यों को उद्धृत किया था जिनका उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा था। ऐसा ही एक वाक्य था— “Stay Hungry, Stay Foolish” (भूखे रहो, मूर्ख रहो)। मूर्ख क्यों? क्योंकि अगर हम स्वयं को मूर्ख (अज्ञानी) मानेंगे, तभी तो कुछ नया सीखने के लिए हमेशा तत्पर रहेंगे। और भूख किस चीज़ की? कुछ नया सीखने और जानने की!
अगर हम अपने ज्ञान को पूर्ण मानकर कुछ नया सीखने के लिए तत्पर नहीं रहते या नया जानने के लिए उत्सुक नहीं रहते, तो इसका अर्थ है कि हमने अपना उत्थान रोक लिया है। निरंतर कुछ नया सीखते रहना ही तो जीवंत होने की निशानी है!
कई बार बुजुर्ग सोचते हैं कि अब वे कुछ नया सीखकर क्या करेंगे, या इस उम्र में वे कुछ नया नहीं सीख सकते। ये दोनों ही विचार सही नहीं हैं। ऐसा सोचने से तो बुढ़ापा मृत्यु के लिए एक प्रतीक्षालय (waiting room) मात्र बनकर रह जाएगा— हम ज़िंदा तो होंगे, लेकिन केवल मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए! लेकिन अगर हम इस उम्र में भी कुछ नया सीखेंगे और प्रयास करेंगे, तो सही अर्थों में हम ज़िंदगी जी पाएँगे। सीखने की खुशी हमें आत्मसंतोष और आत्मविश्वास देती है।
तभी तो भारतीय संस्कृति की ‘चार आश्रमों’ की व्यवस्था में वानप्रस्थ को तीसरा और संन्यास को चौथा आश्रम माना गया है। तीसरी ‘वानप्रस्थ’ अवस्था में हम जो सीखते हैं, चौथी ‘संन्यास’ अवस्था में उसका प्रयोग समाज के कल्याण के लिए करते हैं। लेकिन यह तीसरी और चौथी अवस्था पहली और दूसरी अवस्था से भिन्न होती है। पहली अवस्था (ब्रह्मचर्य आश्रम) में हम जो विद्या और कौशल सीखते हैं, उनका उपयोग दूसरी अवस्था (गृहस्थ आश्रम) में अपने और अपने परिवार के लिए करते हैं। किंतु चौथी अवस्था में हम अपने समस्त ज्ञान और अनुभव का उपयोग स्वयं के लिए न करके संपूर्ण समाज के लिए करते हैं। उद्देश्य बदलता है, पर सीखने का क्रम कभी रुकता नहीं है।
सच ही कहा गया है— ‘जीवन चलने का नाम’, जिसे वेदों में “चरैवेति, चरैवेति” (चलते रहो, चलते रहो) कहा गया है।

