दिसंबर, 2022
हस्तिनापुर के महाराजा शांतनु ने अपनी प्रथम पत्नी के निधन के कुछ वर्षों बाद निषादराज दशराज की पुत्री सत्यवती से विवाह करने का विचार किया। इस विवाह के लिए निषादराज सहर्ष तैयार थे, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी।
शर्त यह थी कि उनकी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही राजा शांतनु का उत्तराधिकारी होगा। चूँकि शांतनु को पहली पत्नी से एक पुत्र प्राप्त था और नियमानुसार बड़ा पुत्र ही राजगद्दी का अधिकारी होता था, इसलिए निषादराज की इस माँग को धर्म-विरुद्ध और अनुचित मानते हुए उन्होंने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया। बाद में जब उनके बड़े पुत्र देवव्रत को इस शर्त की जानकारी हुई, तो उन्होंने स्वयं जाकर निषादराज की शर्त पूरी करने का वचन दिया। लेकिन निषादराज का संशय तब भी दूर नहीं हुआ। उन्होंने यह आशंका प्रकट की कि भविष्य में कहीं देवव्रत के पुत्र या पौत्र राजसिंहासन पर अपना अधिकार न माँगने लगें। उनके इस भय को दूर करने के लिए देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने की प्रतिज्ञा की और इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही वे ‘भीष्म’ कहलाए।
सत्यवती से शांतनु को दो पुत्र हुए, लेकिन दोनों ही बिना किसी उत्तराधिकारी के युवावस्था में ही परलोक सिधार गए, जिससे राजवंश की समाप्ति का भय उत्पन्न हो गया। महाराज शांतनु के एकमात्र जीवित बचे पुत्र भीष्म तो ब्रह्मचर्य और सिंहासन न लेने की प्रतिज्ञा में बँधे थे। अब राजमाता सत्यवती को अपने पिता की उस शर्त पर गहरा पछतावा हुआ।
निषादराज की ही तरह धृतराष्ट्र भी पुत्र-मोह से ग्रसित होने के कारण अपने पुत्रों के दुष्कर्मों का विरोध नहीं कर सके। इसका दुष्परिणाम महाभारत के विनाशकारी युद्ध के रूप में सामने आया।
अपनी संतान के प्रति स्नेह एक स्वाभाविक गुण है। यह संतान और माता-पिता दोनों के भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, लेकिन किसी भी चीज की अति बुरी होती है। एक सीमा के बाद यह स्नेह ‘मोह’ में बदल जाता है। मोह को पाँच महापापों में गिने जाने का कारण यही है कि इसके वशीभूत होकर मनुष्य कई बार अनुचित या गलत कार्य कर बैठता है। इसीलिए इसे समस्त पापों का मूल कहा गया है।
कई माता-पिता अपनी संतान का भविष्य सँवारने के लिए इतने चिंतित या प्रयासरत रहते हैं कि वे यह भूल जाते हैं कि यदि केवल माता-पिता के चाहने से बच्चे खुश रह पाते, तो शायद दुनिया में कोई भी व्यक्ति दुखी न होता। व्यावहारिक रूप से संतान के प्रति अत्यधिक मोह के दो दुष्परिणाम सबसे अधिक दिखाई देते हैं:
अत्यधिक नियंत्रण: माता-पिता का बच्चों पर बहुत अधिक नियंत्रण हो जाता है, जिससे बच्चों के व्यक्तित्व को निखरने का पूरा अवसर नहीं मिल पाता। कई बार बच्चे अपने लिए कुछ व्यक्तिगत स्थान (space) चाहते हैं, जो न मिलने पर वे चिड़चिड़ापन या घुटन अनुभव करने लगते हैं।
अत्यधिक अपेक्षाएँ: माता-पिता की बच्चों से अपेक्षाएँ बहुत बढ़ जाती हैं। यदि माता-पिता बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, तो उनके चेतन या अवचेतन मन में यह उम्मीद जाग उठती है कि बच्चे भी उनके लिए वैसा ही करेंगे। वे बच्चों की वास्तविक स्थिति या क्षमता को देखने के बजाय केवल अपने प्रयासों से उम्मीदें लगाने लगते हैं। इन दोनों ही स्थितियों का परिणाम सुखद नहीं होता।
इसलिए क्यों न हम बच्चों की चिंता तभी तक करें और उनकी ज़िम्मेदारी तभी तक लें, जब तक वे स्वयं इसके योग्य न हो जाएँ। इसके बाद उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाने दें। बच्चों के बच्चों (पौत्र-पौत्रियों) की चिंता उनके माता-पिता को करने दें और उन्हें उनका व्यक्तिगत स्थान दें। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि हम उनकी सहायता न करें या उनसे प्रेम न करें, बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम स्नेह और मोह के सूक्ष्म अंतर को सही समय पर पहचान लें।

