सितंबर, 2022
किसी गाँव में एक धनी व्यापारी रहता था। वह भगवान का भक्त था। एक बार कहीं जाते समय उसे रास्ते में एक बहुत ही चमकीला पत्थर मिला। वह उसे अपने साथ ले आया। व्यापारी ने विचार किया कि यह अवश्य ही कोई बेशकीमती पत्थर है, इसलिए इससे भगवान की मूर्ति बनवाई जाए।
यह सोचकर व्यापारी उस पत्थर को लेकर एक मूर्तिकार के पास पहुँचा और उसे मुँहमाँगी कीमत देने का वादा करके उस पत्थर की मूर्ति बनाने के लिए कहा। मूर्तिकार इसके लिए सहमत हो गया।
मूर्तिकार मूर्ति बनाने के लिए पत्थर पर छेनी-हथौड़े से प्रहार करने लगा। लेकिन यह क्या! पत्थर बहुत ही सख्त था। प्रहार का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मूर्तिकार ने कई बार और प्रयास किया, मगर वह पत्थर को तोड़ने में कामयाब नहीं हो सका। अंत में उसका धैर्य टूट गया। जब व्यापारी मूर्ति लेने आया, तो मूर्तिकार ने यह कहते हुए उसे पत्थर लौटा दिया कि बहुत सख्त होने के कारण उस पत्थर को काटकर और तराशकर मूर्ति बनाना संभव नहीं है।
व्यापारी उस पत्थर को लेकर दूसरे मूर्तिकार के पास गया। उसे भी मुँहमाँगी कीमत पर मूर्ति बनाने के लिए कहा। मूर्तिकार तैयार हो गया। पत्थर को तोड़ने के लिए उसने भी छेनी-हथौड़े से उस पर प्रहार किया। इस बार वह पत्थर एक ही प्रयास में टूट गया।
व्यापारी ने जब देखा कि इस बार मामूली प्रयास से ही पत्थर टूट गया, तो वह मन-ही-मन मुस्कुराया। वह समझ गया कि पहले वाले मूर्तिकार के प्रहारों से पत्थर अंदर से टूट चुका था। उस मूर्तिकार ने इतने प्रयास किए, लेकिन अंतिम प्रयास से पहले उसने अपना आत्मविश्वास खो दिया और अंतिम प्रहार नहीं किया। काश! उसने एक प्रहार और किया होता। इस एक प्रयास की कमी के कारण उसके पहले के सारे प्रयास निष्फल रहे।
कई बार हम लोग भी यही करते हैं। सफलता के करीब पहुँचकर अपना धैर्य खो देते हैं और अंतिम प्रयास नहीं कर पाते। कौन जाने कौन-सा प्रहार अंतिम हो, कौन-सा प्रयास सफलता का आधार बन जाए!
