सितंबर, 2022
तन्वी छोटी-सी थी जब उसके पिता नहीं रहे थे।
उसके नाना-नानी, उसकी माँ और उसे अपने घर ले आ

गुरुग्राम
ए थे।
ननिहाल में बाक़ी सब ठीक था बस एक बात गड़बड़ थी, नानी और तन्वी की माँ में आए दिन बहस होती रहती थी। दरअसल तन्वी की माँ ने सबके लाख समझाने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया था। उन्हें तन्वी में अपने पति का अक्स नज़र आता था। वह यादों के साथ जीवन जीना सीख रही थीं। नानी को बस अपनी बेटी की यही एक बात पसंद न थी।
जब कभी नानी और माँ में खटकती तो नानी पहले उसके मरहूम पापा को कोसती जो अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनिया से चले गए, और फ़िर तन्वी की बारी आती, जिसके मोह में उनकी बेटी जीवन भर वैधव्य की चादर ओढ़ कर बैठी थी। तीसरा वार वह ईश्वर पर करती थी जिसने उसकी पुत्री और नातिन को आश्चर्यजनक रूप दिया, और इतनी ख़राब किस्मत दी।
माँ जब नानी के शब्द वाणों को ना झेल पातीं तो अपना कमरा जोर से बन्द कर लेती, दरवाज़े की फटाक आवाज़ होते ही बूढ़ी नानी डर जाती और चुप हो जाती थीं।
इस तमाशे के बीच तन्वी चुपचाप पेंसिल से स्केचिंग करती रहती थी। कभी-कभी वो और नाना जी घर से बाहर निकल जाते थे। एक घंटे घूम टहल कर जब लौटते घर का माहौल शान्त हो चुका होता था।
नानी को उसकी चित्रकला के जूनून से भी दिक्कत थी। उससे कहती “तन्वी बिटिया क्या मिलेगा, तुझे ये आड़े तिरछे चित्र बना कर? इस उम्र में लड़कियाँ घर के कामकाज सीखती हैं और तुम ये चित्र बनाती रहती हो, महंगा खर्चा है।”
कभी नाराज़ होती तो बड़बड़ाती “ये बड़े आदमियों के चोंचले हैं। हमारे घर में जगह कहाँ है तुम्हारा ये कूड़ा रखने के लिए।”
नानी को उसकी पेंसिलें, इरेज़र, ब्रश, कैनवास फैले देख कर गुस्सा आता था।
जब देखो कोई अड़ोसी-पड़ोसी ही मुहँ उठाये चला आता था, किसी को स्कूल का प्रोजेक्ट बनवाने में मदद चाहिए थी, किसी को घर में लगाने के लिए पेंटिंग सीखनी होती थी।
“घर न हो गया ख़ैरातखाना है। इतना वक़्त बर्बाद करती है इन फ़ालतू लोगों के चक्कर में मेरी मान पढ़ाई कर ले, कहीं धंधे से लग जाएगी।” नानी उससे कहती थीं।
उसके कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती थी। पता नहीं क्या था, बूढ़ी नानी जितने उपदेश देतीं उसके हाथों की तेजी बढ़ जाती, रेखाएँ और भी साफ़ पैनी होकर उभरती जाती थीं, रंग खिल-खिल जाते थे।
आज भी माँ और नानी में किसी बात पर बहस हुई थी। वह मूकदर्शी उन दोनों की चीख पुकार में बूढ़ी नानी का ही चित्र बना बैठी थी। काफ़ी झुर्रियाँ आ गई हैं उसने आज ध्यान दिया। मन ही मन दया भी आ गई थी। नानी की पीड़ा चित्र में उभर कर आ रही थी। तन्वी को लगने लगा था वह चित्र को पूर्ण करते-करते कहीं रो ना पड़े।
इसलिए अपना मन हल्का करने के लिए उसने नानी के चित्र की एक तस्वीर खींची और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दी। अब उसे पहले से बेहतर लग रहा था “देखती हूँ कैसा रेस्पॉन्स आता है? लोग पसन्द करते हैं मेरी कलाकारी या नहीं।” वह सोच रही थी।
अपने रंग और ब्रश समेटने के बाद उसने लेमनग्रास और अदरक, इलाइची डाल कर चाय बनाई, एक कप नानी को थमाया एक माँ के आगे रखा, दोनों स्त्रियाँ चुपचाप चाय पीने लगीं। वातावरण में शान्ति हो गई थी। वह ख़ुद बिना कुछ खाए पिए कॉलेज के लिए निकल गई थी।
उसे पता था कि चाय पीने के बाद नानी और माँ में सुलह भी हो जाएगी। ये इस घर के रोज़ के झगड़े थे, इसी तरह निबटते थे।
अगले दिन सुबह-सुबह अख़बारवाला छत पर अख़बार की फुँकनी सी बना कर अख़बार डाल गया था। बूढ़ी नानी ने झुकी हुई कमर से कराहते हुए अख़बार उठाया और अपने पति को पकड़ा आयीं। ये क्या? वह खुशी और आश्चर्यमिश्रित स्वर में बोले “इधर आओ जी।”
“अब सुबह-सुबह क्या हुआ? जो इतना ख़ुश हो रहे हो। लाटरी निकल आयी है क्या?”
“लॉटरी ही निकली है पर मेरी नहीं तुम्हारी, देखो। मशहूर कर दिया तुमको तुम्हारी नातिन ने।”
वह बोले “कितना सुन्दर चित्र बनाया है तुम्हारा, इसकी चर्चा बड़े-बड़े चित्रकार भी कर रहे हैं। इस चित्र को अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में शामिल किया जाएगा। आज भी बात है तुम्हारे अंदर भई वाह! तुम तो बुढ़ापे में मशहूर हो गयी।”
पति ने हँसते हुए अख़बार का पन्ना आगे कर दिया। बूढ़ी नानी की आँखों से आँसू झड़ने लगे। इतनी बड़ी हो गई है तन्वी बिटिया। अख़बार में उसके बनाए चित्र छपने लगे हैं। वह घर में ख़ुशी से इधर-उधर घूम रही थीं, इतनी सुबह-सुबह ये समाचार किसको दें?
थोड़ी देर में ख़बर फैल गई बधाइयों के फ़ोन आने लगे थे। नानी खुशी-खुशी सबका जवाब दे रही थी। चेहरे की प्रसन्नता देखते ही बनती थी। आज तन्वी को गले लगाने का दिल चाह रहा था। शाबाशी देने को जी चाह रहा था। बरसों बाद इतनी अच्छी सुबह हुई थी। बार-बार कमरे में झाँक कर आतीं, जहाँ मासूम तन्वी बेखबर सोई हुई थी।
नानी मुस्कुराते हुए बड़बड़ा रही थीं “कानों में इयरप्लग लगा कर सोती है। न कुछ सुनेगी और न दस बजे से पहले उठेगी।”
नानी ने भीगी आँखें पोंछते हुए कहा “इन निगोड़ी आँखों को जाने क्या हुआ है, क्यों बैरिन बार-बार भर आती हैं खुशी के आँसू हैं बहने देती हूँ।”
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