वृद्धावस्था में अकेलापन

मार्च 2026

(लेखिका परिचय: साहित्यकार एवं समाजसेविका। मिथिलाक्षर लिपि की वरिष्ठ प्रशिक्षिका।)

वंदना मिश्रा "वैदेही"
वंदना मिश्रा “वैदेही”
दिल्ली


सच है कि बच्चा कभी जागता हुआ पालने में अथवा बिस्तर पर अकेले नहीं रहना चाहता। वह चाहता है कोई बात करे उससे। ठीक ऐसे ही, वृद्धावस्था में मन करता है कोई दो पल बैठे हमारी कहानी हमारी बीती बातें सुने। अकेलापन खलने लगता है। बच्चे रो देते और बुजुर्ग बड़बडाने लगते बस यही फर्क है दोनों में।
मुकेश जी: आज पता नहीं तुम बहुत याद आ रही थी, दिन ही तुम्हारे साथ का था। मुझे लगा आज मैं तुम्हारे साथ बिताऊँ।
जब तुम थी पाँच बजे उठकर चाय देती और कहती नहा लो पानी रख दिया। मैं भी जल्दी तैयार होता, हम मंदिर जाते, पूजा-अर्चना कर प्रसाद चढ़ा सभी गरीबों में बाँट फिर घर आते। मन सब याद कर रहा था।
आज मैं सुबह उठकर जल्दी से फ्रेश होकर वॉक पर निकल गया, वहाँ से रोज की तरह आते वक्त दूध और फल लेकर घर पहुँचा।
सुषमा (बहु): चाय टेबल पर रखती हुई पापा, चाय पी लीजिए और मैंने आपके लिए गीजर ऑन कर दिया, नहा लीजिए तब तब मैं चिंटू को बस में बिठा कर आती हूँ। कहती बाहर चली जाने लगी।
चिंटू: बाय बाय दादा जी, लव यू दादू, शाम को पार्क चलोगे न, तैयार रहना।
मुकेश जी: हाँ हाँ बहू तुम जाओ दरवाजा बाहर से लगा देना।
बाय बाय चिंटू, हाँ हाँ ज़रूर चलेंगे और आज रेस लगायेंगे दादा पोता।
सुषमा: नहीं पापा शिवेश अभी नहीं गये, कहते सुषमा बाहर चली गयी।
मुकेश जी: अरे सिवेश इतनी देर क्यों आज?
शिवेश: पापा मैंने आज, बॉस को कह दिया लेट हो जाऊंगा, आप जल्दी नहाओ चलेंगे।
थोड़ा मन ऊदास होते, पापा (मुकेश जी) बोले: कहाँ आज मेरा मन कहीं जाने का नहीं घर बैठ कुछ पल अकेले रहूँगा।
शिवेश: पापा आपको क्या लगता है, मैं इतना भुलक्कड़ हो गया कि आज का दिन भूल जाऊ! माँ आज होती तो आप छ: बजे तक तैयार होते वरना माँ आपको कितना डाँटती। अब जल्दी से तैयार हो जाइये।
मैं चाह कर भी चुपचाप शिवेश को देखता रहा। अब सुषमा भी आ चुकी थी मैं भी तैयार हो गया। हम तीनों मंदिर गये और जैसा तुम करती वही सब बच्चों ने किया, पूजा पाठ प्रसाद कर, मुझे बधाई दी और वो ऑफिस चले गये मैं घर आ गया और अपनी दिनचर्या में लग गया। मुझे तुम्हारी याद आती है। पर, सच कहूँ, बच्चे इस कदर ख्याल रखते हैं कि तुम्हारे जाने पर मैं अकेलापन नहीं महसूस कर रहा। आज हमारी 65वीं सालगिरह थी पर बच्चों ने याद रखा, ये बड़ी बात थी।
हम बड़े अपनी जिम्मेदारी बस ठीक से नहीं निभा पाते और मन में सोचा। क्या ये बच्चे “न कमाये, अपनी जिंदगी न जिये” हमने भी अपने समय मे यही सब किया था।
पर हम नासमझ थे माँ बाप की फीलिंग नहीं समझ पाये और उन्हें वृद्धावस्था में अकेलापन महसूस होता था।
“वो बात करना चाहते पर मैं समय नहीं दे पाता और जब वो नहीं हैं दुनिया में”
मुझे अपने वृद्धावस्था में पहुँचने पर इस बात का अहसास हुआ। क्योंकि मेरे बच्चे मेरा हर पल पूरा ख्याल रखते है। मेरे छोटी बड़ी जरूरतों को समय से पहले पूरा करते हैं। कभी अकेलापन न महसूस हो पूरे दिन का टाइम-टेबल सैट कर दिया। शाम से चिंटू (पोते) का साथ।
मैं बहुत किस्मत वाला हूँ या यूँ कहो आज की पीढ़ी पढ़ी लिखी और समझदार हैं। जो हमें हर पल जीना सिखा रहे हैं। लोग क्यों कहते है आज की पीढ़ी को कुछ भी।
मुझ से पूछो ये बच्चे पढ़ते नौकरी करते परिवार और माँ बाप दोनों मे तालमेल बना के चलते। हमारे उम्र के बाद वो हमे कई क्लब थैरेपी क्लास कई ऐसी एक्टिविटी कराते जो हमारे लिए आवश्यक है हम अपनी सेहत या डाइट का ख्याल नहीं रखते पर इतने व्यस्त होते भी ये सब मैनेज करते हमारा रैगूलर चैकअप खान-पान समय पर मैनेज करना बहुत मुश्किल था हमारे लिए।
हमें जरूरत है जो हमने अपने समय मे किया इन्हें वो आजादी दे क्यों चाहते हैं ये हमारे हिसाब से चले।
आज की पीढ़ी की सोच को मेरा सलाम।
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