जून, 2026

नजफ़गढ़, नयी दिल्ली
यह कहानी मैंने किसी के मुँह से नहीं सुनी है, ना ही किसी कॉफी हाउस में बैठकर चुस्कियाँ लेते हुए लिखी है। यह मेरी अपनी आँखों से देखी हुई सच्चाई है—और अभी भी देख रहा हूँ।
जैसे-जैसे देख रहा हूँ, मन में थोड़ा आक्रोश भी उठ रहा है और भीतर कहीं से एक डर भी पनप रहा है— क्या आने वाले समय में यह स्थिति हर घर की हो जाएगी, या इसे अपवाद मानकर हम खुद को समझा लें? कुछ देर के लिए तो लगता है— “अरे, इसमें नया क्या है? ऐसा तो फिल्म ‘बागबान’ में भी दिखाया गया था।” बागबान देखकर सबको अच्छा लगा था— चाहे वे बुजुर्ग हों जो इसे झेल रहे थे, या वे बेटे-बहुएँ जो अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे थे। समाज के लिये जो आईना था, मनोरंजन भर बनकर रह गया।
लेकिन यह कहानी बागबान से एक कदम आगे है—एकदम लेटेस्ट वर्जन “एआई मॉडल” (अपनी इच्छानुसार)। एल्गोरिद्म के हिसाब से आउटपुट सेट है, टेलर-मेड आस्था के साथ।
पाठकों, आप सब इसे पढ़कर एक बार जरूर सोचिए—आनेवाले समय में, इस कहानी में आप कहाँ फिट बैठेंगे?
विमला देवी और उनका परिवार—धर्म की चलती-फिरती शाखा कहें तो गलत नहीं होगा। लेकिन यहाँ वास्तविकता कम और पोस्टरबाजी ज्यादा मिलेगी। कॉलोनी में कहीं भी भागवत कथा हो—चाहे कथावाचक ट्रैफिक में फँस जाए या किसी कारणवश न पहुँच पाए, लेकिन विमला देवी का न पहुँचना असंभव है।
वे ग्यारह बार कलश उठा चुकी हैं, और बारहवीं बार उठाने के लिए साड़ी का पल्लू कमर में खोंस ही रही थीं कि मानो कलश ने खुद हाथ जोड़ लिए— “आप तो पहले ही इंद्रासन की हकदार हो चुकी हैं, अब क्या वैकुंठ पर भी कब्जा करोगी?”
घर का टीवी रिमोट भी जानता है कि बाबा के प्रवचन के अलावा कोई और चैनल चलाना उतना ही वर्जित है, जितना मंदिर में जूते-चप्पल पहनकर जाना।
ऐसा कोई व्रत-त्योहार नहीं जो उनसे छूटा हो, देश का ऐसा कोई धर्मस्थल नहीं जहाँ उनके कदम न पड़े हों। जब वे मातारानी की मूर्ति के साथ सेल्फी लेती हैं, तो फोटो देखकर कन्फ्यूजन हो जाए कि इनमें विमला देवी कौन हैं और मातारानी कौन। ऐसे धार्मिक कार्यों में उनके पत्नी-परायण पति भी सेवक की तरह हमेशा साथ रहते हैं।
जब माँ-बाप ऐसे धार्मिक हों तो बेटा कैसे कम होगा। महीने का एक दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा, बाकी दिन शराब पीकर मौज-मस्ती। अगर संभव होता तो पर्वत को ही उठाकर घर ले आता। भगवान से उसकी एक ही माँग—“किसी तरह पत्नी से पिंड छुड़ा दो।” भगवान भी शायद कहते होंगे— “हमने सोलह हजार शादियाँ निभा लीं, और तुम एक नहीं निभा पा रहे?”
धृतराष्ट्र की तरह पुत्रमोह में डूबी माँ, बेटे के इस विचार का पूरा समर्थन करती है। फिर पिता की क्या मजाल जो मुँह खोल ले। उनकी जिम्मेदारी एक ही है, आँख बंद कर लाइक बटन दबाना।
बहू के बारे में माँ वही मानती हैं, जो बेटा बताता है। कार मिलने के लालच में दोहरे कद – काठी की बहू भी सबको पसंद आ गई थी। लेकिन जैसे-जैसे कार का रंग उतरता गया, बेटे को पत्नी मोटी दिखने लगी। सात जनम का बंधन, सात महीने में गुड्डे-गुड़िया का खेल बन गया। पत्नी से छुटकारा पाने के लिये बेटा तरह-तरह का प्रपंच रचने लगा, माँ कदम-कदम पर साथ देती ग़यी।
जो बहू घर की लक्ष्मी बनकर आइ थी, अब बोझ बन गयी। कभी पागल तो कभी बेवकूफ, कैलेंडर का तारीख के साथ हरेक दिन एक नयी उपमा बहु सुनने लगी।
माँ-बाप की दुलारी अनेकों सपने लेकर जो ससुराल आई थी। जैसे-जैसे मेहंदी का रंग उतरता गया, सपने चकनाचूर होते गए। जिस बहू के पैर का नाखून तक लोगों ने नहीं देखा था, उसकी घूँघट के नीचे आँखों से झरते आँसू कौन देखता। जिसके खांसने पर बैन था, वो भला अपना दुखरा औरों को कैसे सुनाती।
माँ-बेटे ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह बहू अपने माँ-बाप के खिलाफ कोर्ट में गवाही दे दे। बात नहीं बनी तो उसे उसी तरह मायके भेज दिया गया, जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से खरीदा गया कोई कपड़ा—कुछ दिन पहनो और फिर ‘फिट नहीं बैठा’ कहकर वापस कर दो।
फिर वही हुआ जो निश्चित था। कोर्ट की तारीखें, जब-तब घर पर पुलिस का आना, पंच-पंचायत—इन सबके लिए आम बात हो गई। लेकिन नतीजा—ढाक के तीन पात।
कभी दहेज का सामान देखकर विमला देवी की आँखें चमक उठी थीं, तब वो बोली थी— “एक ही बेटे में सब मनोरथ पूरे हो गए, कुछ बाकी नहीं रहा।” वास्तव में कुछ बाकी नहीं रहा। उनकी नजर में दहेज, तो लोगों की नजर में उनके घर में रोज-रोज का तमाशा।
खुद की दो बेटियाँ होने के बावजूद भगवान से एक ही प्रार्थना— किसी तरह बेटे का तलाक हो जाए। जिसका समाधान आत्ममंथन से होगा, वह झूठ के भजन से पाना चाहती हैं। वहीं बात, आत्ममुग्ध के लिये आत्ममंथन का क्या प्रयोजन?
पुत्रमोह का बंधन सारे बंधन से मजबूत होता है। इसमें परनेवाले को औरों की बात सुनाई नहीं देता। सुनाई देता, फिर महाभारत क्यों होता?
बेटे का मन शांत करने के लिए पंडित की बात जरूर सुनी गई। घर में हवन-जाप करवाया गया, लेकिन जो काम मनोचिकित्सक का था, वह पंडित के माला फेरने से थोड़े होगा। नतीजा— बहू सोने जैसे बेटे के साथ मायके में, दोनों पति-पत्नी किसी मंदिर में और बेटा कोर्ट की तारीख पर।
समाज से कटती जा रही हैं, लेकिन बेटे की मूर्खता में साथ देना नहीं छोड़ रहीं। खैर, ये सब बातें अब इन सबके लिए पुरानी-घिसी-पिटी हो गई हैं। जिसका विवेक खत्म हो जाए, उसे इस बात का क्या संकोच कि लोग क्या कहेंगे?
अब विमला देवी के लिये एक नई समस्या सामने खड़ी हो गई है। ऐसा लग रहा है जैसे कुंडली के सारे ग्रह वक्री हो गए हों। ससुर की अर्जित जमीन पर तीन मंजिला मकान बनाकर रहने वाली विमला देवी को अपनी सास में, जो बड़े बेटे के साथ रहती हैं, अपार श्रद्धा है। घंटों फोन पर बातें करती हैं। पति के हाथों सब्जी-तरकारी भी भेज देती हैं। दोनों घरों के बीच दूरी ही कितनी है— बीच में बस एक दीवार।
यह उस घर में न जाने की कसम खा चुकी हैं और सास को साथ रखने में अनेकों झंझट। इनके पति भी अपनी माँ के लिए कलियुग के श्रवण कुमार से कम नहीं। गुरु-मंत्र भी ले रखा है। दिन में जब-तब माँ का हालचाल पूछ लेते हैं। माँ इतने में ही तृप्त। ऐसा उदार गुरु और कहाँ मिलेगा? सब कोई द्रोण थोड़े ही होते हैं जो गुरु-दक्षिणा के नाम पर अँगूठा माँग लें।
भगवान से इन सबकी श्रद्धा देखकर यह दूरी देखी नहीं गई। फिर विमला देवी को पता चला कि जेठ को कुछ दिन के लिए गाँव जाना है तो सास को इन्हें रखना पड़ेगा। इतना सुनते ही पति के साथ घर छोड़कर गायब हो गईं। शायद ये सोचकर- “ऐसा भगवान दूर से ही अच्छे।”
आज विमला देवी भले सास से भाग रही हैं और बहू को भगा चुकी हैं। लेकिन क्या कल को वही बहू इन्हें भी भगाएगी? कारण इस व्यवस्था की नींव तो इन्होंने खुद ही रखी है।
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