दिसंबर, 2025

फरीदाबाद
(लेखिका परिचय: आप हिन्दी और मैथिली भाषा में विविध साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य करती हैं। मैथिली में 1. विनती में विश्वास, 2. उमड़ल नेह, 3. आँजुरमें अमृत, 4. चलू फुलबाड़ी, 5. इज्जा, 6. मुस्किआइत हरसिंगार के साथ-साथ हिन्दी में भी अनवरत रूप से विविध पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।)
सर्दियों की हल्की धूप उतरकर पुराने मोहल्ले की गलियों में फैल रही थी। उसी धूप में बैठी थी कविता, जो अपने छोटे चाय–नाश्ते के ठेले पर रोज़ की तरह पानी गर्म कर रही थी। उसके चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ जरूर थीं, पर आँखों में एक स्थिर चमक—जैसे अभी भी जीवन से कुछ उम्मीद बाकी हो।
पास ही स्कूल था। बच्चे अक्सर उसके ठेले से समोसा या बिस्कुट ले जाते। पर आज, बच्चों के साथ एक नया चेहरा भी आया—एक बूढ़ा, थका हुआ सा आदमी।
वह ठेले के पास रुका और धीमी आवाज़ में बोला, “बेटा… एक कप चाय मिलेगी? पैसे अभी नहीं हैं… शाम तक लौटा दूँगा।’
कविता ने बिना हिचक मुस्कुरा कर कहा, “काका, आपके लिए पैसे कौन मांगता है? बैठिए, अभी बनाती हूँ।’
काका थोड़ा झिझका, फिर पास वाली बेंच पर बैठ गया।
कविता ने तेज़ उबलते पानी में अदरक कूटकर डाली। मसालों की खुशबू फैलते ही बूढ़े काका की आँखें चमक उठीं। चाय लेकर वो ऐसे सुड़कने लगा जैसे बरसों बाद किसी ने उसे अपनापन दिया हो।
कुछ देर बाद उसने धीरे से पूछा, “तुम इतनी मदद सबकी कर देती हो… खुद का क्या?”
कविता हँसकर बोली, “काका, जिंदगी ने बहुत कुछ छीना है। अब मैं जो थोड़ा दे सकती हूँ, वही दे देती हूँ।’
काका कुछ बोल नहीं पाया। उसकी आँखें भर आईं।
चाय खत्म करते हुए वह बोला, “बेटा, मैं लौटकर ज़रूर दूँगा पैसे…’
कविता ने हाथ हिलाकर कहा, “जरूरत नहीं है।’
लेकिन शाम होते–होते, जब कविता ठेला समेट रही थी, वही बूढ़े काका फिर लौटे। इस बार उनके हाथ में एक पुराना छोटा सा कपड़ा बँधा हुआ पोटली थी।
“यह थोड़ा सा गुर, गाँव से लाया था… सोचा तुम्हें दे दूँ। तुमने आज चाय नहीं, इज्जत दी है मुझे।’
कविता ने पोटली थाम ली। दिल भर आया, पर चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी।
और उस दिन से, मोहल्ले के लोग जब भी कविता के ठेले से चाय पीते, उस चाय में हमेशा हल्की-सी गुड़ की मिठास रहती— उस बूढ़े काका के आशीर्वाद की तरह।
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