खुशियों का दरवाजा (लघुकथा)

दिसंबर, 2025

rajrendra ojha
राजेंद्र ओझा
कुशालपुर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

वो चाहता तो उसे नज़रअंदाज करके आगे बढ़ सकता था। वो चाहता तो उसे जेब में रखकर भी आगे बढ़ सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।‌ उसने उसे उठाया और पास ही बिजली के खंभे पर लटके हुए फ्लेक्स से निकले हुए तार या रस्सी जैसी किसी चीज़ से बहुत अच्छे से लपेटकर बांध दिया।
इधर वह कुछ ढूंढ रही थी। उसके चेहरे पर मायूसी के भाव आए जो यह बता रहे थे कि उसे वह चीज़ नहीं मिली जिसे वो ढूंढ रही थी। वो वापस चली गई। मैं उसे आवाज़ देना चाहता था लेकिन यह नवरात्र का पहला दिन था और आसपास के मंदिरों में बजते लाउडस्पीकर मेरी आवाज़ से ज्यादा तेज़ थे और ऐसे भी वो इतनी दूर थी कि मेरी आवाज़ बीच में ही कहीं रुक जाती, उस तक नहीं पहुंचती।
वह जिस जगह अपनी खोई हुई चीज़ को ढूंढकर वापस जा चुकी थी, वहीं एक दुकान भी थी। मैंने दुकानदार से उसका हुलिया आदि बताकर उसके बारे में कुछ जानना चाहा। दुकानदार को कुछ याद नहीं आ रहा था, उसने अनभिज्ञता व्यक्त की और अपनी दुकान के भीतर चला गया।
वह चाबी के गुम हो जाने पर उतनी चिंतित नहीं थी, जितनी चिंतित घर के बंद रहने पर थी। घर का बंद होना केवल घर का बंद होना नहीं होता। बहुत से लोगों का बाहर होना होता है। दूध वाला आकर जा चुका होता है। कामवाली भी लौट चुकी होती है। स्कूल से लौटे बच्चे केवल पड़ोसी के सहारे ही नहीं होते अपितु पड़ोसी भी घर के अब तक बंद रहने की चिंता में शामिल हो गया होता है।
वह एक बार फिर लौटती है। इस बार वो दुकानदार से चाबी के बारे में पूछती है। दुकानदार को उसका आना याद आ जाता है। दुकानदार को मेरा कहा हुआ याद आ जाता है और वो बिजली के खंभे की तरफ इशारा करता है।
चाबी को देखकर वह खुश हो जाती है। चाबी के मिलने की उसे उतनी खुशी नहीं थी, जितनी बंद घर के खुल जाने की थी। बंद घर बहुत सी चिंताओं को खोल देता है और खुला हुआ घर बहुत सी चिंताओं को बाहर से ही बाहर कर देता है।
चाबी से उसने घर ही नहीं खोला, खुशियों का दरवाजा भी खोल दिया।
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