दिसंबर, 2025

लखनऊ, उत्तर प्रदेश
(लेखिका परिचय: 10 कहानी संग्रह, एक आत्मकथा, 4 उपन्यास, और 4 कविता संग्रह नीरजा जी के रचना साहित्य के विविधता को दर्शाते हैं।
कहानी संग्रह- 1- बियाबानों के जंगल, 2. धूप भरे दिन, 3. मुट्ठी भर इच्छाएँ, 4. लड़कियाँ डरती नही हैं, 5. माटी में उगते शब्द, 6. जी हाँ, मैं लेखिका हूँ, 7. अमलतास के फूल, 8. पत्तों पर ठहरी ओस की बूँदें, 9. ….और एक दिन, 10. मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ,
आत्मकथा- पथरीली पगडंडियों का सफर
उपन्यास – (1) मेरे शहर का मौसम (2) अपने-अपने इन्द्रधनुष (3) उन्हीं रास्तों से गुज़रते हुए, और (4) ललई भाई
कविता संग्रह – (1) मेघ, मानसून और मन, (2) ढूँढ कर लाओं ज़िन्दगी (3) बारिश और भूमि (4) स्वप्न।
इनके अतिरिक्त हिन्दी की अति प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबसीटेस में कहानियाँ, कविताएँ, बाल सुलभ रचनाएँ एवं सम सामयिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते रहते हैं। आपकी रचनाएँ आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी प्रसारित होती हैं। हिन्दी साहित्य में योगदान के लिए अनेक सम्मानों से आपको सम्मानित किया जा चुका है।)
‘पापा, जब भी मौका मिलेगा हम आपसे मिलने आ जाएंगे। जल्दी-जल्दी नही तो भी दो वर्ष में एक बार अवश्य आ जाएंगे पापा। आप फिक्र बिलकुल न कीजिएगा। आराम से रहिएगा। आपके पास मनोज है। वो आपका पूरा ध्यान रखेगा।’ शेखर का छोटा बेटा आज नौकरी के लिए विदेश जा रहा था। जाते-जाते अपने पिता को समझा रहा था कि उन्हें आगे का जीवन कैसे मैनेज करना है।
बहू की गोद में एक वर्ष का उनका पोता था। जो बार-बार माँ की गोद से उनकी गोद में आने के लिए लपक रहा था। पोते को बहू कस कर पकड़ अपनी ओर खींच ले रही थी। पोते को देखकर शेखर की आँखें नम हुई जा रही थीं। जिसे वो छुपाने का प्रयास कर रहे थे। कुछ ही देर में टैक्सी दरवाजे पर आ गयी।
‘ठीक है पापा। हम लोग चल रहे हैं। तीन घंटे के पश्चात् फ्लाइट का समय है। अभी निकलेंगे तो सारा काम आराम से हो जाएगा। कोई हड़बड़ी नही रहेगी।’ बेटे ने टैक्सी में सामान रखते हुए कहा। बेटे की बात सुनकर शेखर कुछ नही बोले। जितना बोलना था वो पहले ही बोल चुके हैं।
जब से छोटे बेटे ने विदेश में जाकर नौकरी करने की बात कही है तब से शेखर बेटे को समझा रहे हैं कि तुम्हारे ऑफिस से कोई और विदेश चला जाएगा। मात्र दो वर्ष की बात है। कोई और भी चला जाएगा। किन्तु बेटे ने नही सुनी। बाद में पता चला कि बेटे स्ंवय ही विदेश जाने के लिए रूचि ले रहा था। उसने ही अपना नाम आगे भेजा था।
बेटा चला गया। शेखर कुछ देर वहीं खड़े होकर उधर ही देखते रहे जब तक कि बेटे की टैक्सी आँखों से ओझल न हो गयी। कुछ देर पश्चात् घर में आकर सूनी आँखों में बस एक उम्मीद थी कि शाम को मनोज आ जाएगा। घर का एकान्त टूटेगा।
शेखर ड्राइंगरूम में आकर धम्म से सोफे पर निढाल होकर बैठ गये। बैठे-बैठे वो सोचने लगे कि अभी तीन वर्ष पूर्व की बात है, इस घर में कितनी रौनक थी, चहल-पहल थी। तब उनकी पत्नी जीवित थीं। बड़ा बेटा दूसरे शहर में काम करता था। उन्होंने दोनों बेटों का ब्याह कर दिया था। बड़ा बेटा तीज-त्योहार आदि की छुटिटयों में घर आ जाया करता था।
शेखर की पत्नी बहुत खुश थीं। छोटा बेटा उनके साथ रहता था। और सबसे बड़ी खुशी की बात यह थी कि वह इसी शहर की एक अच्छी प्राइवेट कम्पनी में काम करता था। सभी खुश थे कि उनकी खुशियों को न जाने किसकी नजर लग गयी। शेखर की पत्नी इस क्षणभंगुर दुनिया को छोड़ कर चली गयीं।
बड़ा बेटा माँ के अन्तिम संस्कार में परिवार सहित आया। उसके बाद तीन वर्षों के अन्तराल में मात्र एक बार आया है। नौकरी के उत्तरदायित्व उसे कदाचित् पिता का हाल पूछने का समय निकालने नही देते। यह भी सम्भव है कि स्थान की दूरियों ने दिलों की दूरियाँ बढ़ा दी हों।
शेखर में मन में यह निश्चिन्तता अवश्य है कि बेटा ठीक है। परिवार सहित खुशी से जीवन यापन कर रहा है। यदाकदा उसका फोन आ जाता है। अब छोटे बेटे के साथ जीवन का अन्तिम प्रहर कट रहा था कि…..वो भी चला गया। उम्मीद टूट गयी?
पत्नी की स्मृतियाँ जीवन के अन्तिम प्रहर तक तरोताजा रहेंगी। पत्नी की स्मृतियों का सहारा था ही, छोटे बेटे के साथ रहने से जीवन का एकाकीपन हृदय के कचोटता नही था। आज वह भी हाथ और साथ छुड़ा कर जा रहा है।
छोटे बेटे के चले जाने पश्चात् बड़े-से घर में पसरे सन्नाटे में ड्राइंगरूम के सोफे पर बैठ कर शेखर एकाकी पलों को समेटने के प्रयास में विगत् स्मृतियों में चले गये।…..दो-दो बेटों के होते हुए आज वो अकेले बैठे है।…अकेले? नही। तत्काल उनके मन में आया कि…..नही वो अकेले नही है। आज उनके साथ मनोज है।
अभी शाम होते ही मनोज घर आ जाएगा। जीवन का शून्य तो मनोज ने पहले ही भर दिया था। बेटों के न होने का शून्य…..भी अब शून्य नही रहेगा। मनोज के कारण पूरा घर भरा हुआ है।
हाँ…मनोज। मनोज उनका अपना बेटा नही है। ये सत्य वो विस्मृत कर चुके हैं। किन्तु कभी-कभी मनोज का अपने जीवन में आश्चर्यजनक रूप से आने की घटना स्मृतियों में सजीव हो जाती हैं। आज से लगभग बाईस वर्ष पूर्व की बात है…….
…….उसका नाम नाटे था। उसका परिवार शेखर के गाँव में रहता था। अत्यन्त निर्धन परिवार था उसका। माता-पिता का इकलौता बेटा था नाटे। उसकी उम्र यही कोई तीन या चार वर्ष की रही होगी कि उसके पिता गुज़र गये थे।
नाटे की माँ बूढ़ी…..ऊपर से विधवा। उस वृद्ध स्त्री के लिए गाँव में रह कर एक बच्चे का पालन-पोषण करना भी कठिन हो रहा था। कारण….गाँव में रोज़गार की कमी थी। खेतो में निराई, गुड़ाई, जोताई, बुआई-कटाई के जो काम होते थे वो युवक और प्रौढ़ पुरूषों को मिल जाते थे। वह किसी-किसी के के घरों में जाकर अनाज फटकने, घर लीपने-पोतने का काम कर आती थी। वो लोग जो पैसे दे देते थे, उनसे ही किसी प्रकार दो रोटी की व्यवस्था कर लेती थी।
घर के नाम पर एक टूटी-फूटी झोपड़ी व खपरैल का एक टूटा-फूटा दालान। सब कुछ जर्जर अवस्था में था। कभी-कभी नाटे की माँ सुखिया सोचती कि सुना है शहर में निर्धन महिलाएँ घरों में चौका-बर्तन का काम कर के इतने पैसे कमा लेती हैं कि घर का गुजारा ठीक-ठाक हो जाता है।
गाँव में ऐसा नही है। सभी स्त्रियाँ घर के काम स्वंय कर लेती हैं। सुबह घर का काम खत्म करने के पश्चात् अपने खेतों में काम करने भी चली जाती हैं।
सुखिया के पास अपनी खेती-बारी नही है। कभी कोई उसे बुलाकर अपने खेत में मजूरी करा लेता है। मजूरी में जो पैसे मिल जाते हैं उससे कितने दिन दाना-पानी चलता। कभी दो जून तो कभी एक जून की रोटी-नमक बड़ी कठिनाई से जुटा पाती।
नाटे के पिता जीवित थे तो इतनी कठिनाई नही थी। वो मजूरी कर के उसके और नाटे के लिए दो समय का भोजन कमा लाते थे। अब वृद्ध सुखिया करे भी तो क्या करे? नाटे छोटा है। मजूरी नही कर सकता। अत्यन्त दुर्दिन में दिन कट रह थे।
इस वर्ष नाटे नौ बरस का हो जाएगा। बड़ा हो रहा है। उसकी भूख बढ़ रही है। किन्तु सुखिया उसको दो समय का भरपेट भोजन दे पाने में असहाय है।
‘’कैसी हो काकी?’’ पूस का महीना था। जाड़े के मारे बुरा हाल था। दुआरे पर बोरी बिछाकर सुखिया चादर ओढ़कर सिकुड़ी हुई बैठी थी।
काकी सम्बोधन के साथ किसी ने उसका हाल पूछा तो सुखिया ने गर्दन उठाकर ऊपर देखा। सामने वाले व्यक्ति को पहचानने का प्रयत्न करने लगी।
…….अरे! ई त मालिक के बिटवा है। हाँ… ई त बहुत बड़ा हो गवा हैं। पहचानते नही बन रहा है।….हाँ याद आवा! ई मालिक सुदर्शन ओझा के बेटे हैं। शेखू नाम है इनका।’’ शेखर को पहचानते ही सुखिया खड़े होने का प्रयत्न करने लगी। किन्तु जाड़ें के मारे अकड़े हुए घुटने शीघ्र उठने कहाँ दे रहे थे?
‘बैठी रहो….बैठी रहो…काकी। ठंडक बहुत है।’ कह कर शेखर घर की टाटी से सटा कर रखी खटिया को काकी के पास सरका कर उस पर बैठ गये।
‘मुझे पहचाना काकी?’ खटिया पर इत्मीनान से बैठ कर शेखर ने काकी से पूछा।
‘तुम मालिक सुदर्शन ओझा के बेटे शेखू हौ।’ स्वीकारोक्ति में सिर हिलाते हुए सुखिया ने कहा।
‘हाँ, किन्तु काकी अब हम शेखू नही शेखर हो गये हैं।’ शेखर ने कहा। शेखर की बात सुनकर सुखिया मुस्करा दी।
‘महादेव (सुखिया के पति) कहाँ है? काम पर गये है क्या?’ शेखर ने पूछा।
‘ऊ…’ शेखर के पूछते ही सुखिया के मुँह से सहसा निकल पड़ा।
‘हाँ, तुम्हारा आदमी महादेव?’ सुखिया को हड़बड़ाया देख शेखर ने पुनः पूछा।
‘ऊँ तो नही रहे।’ सुखिया ने कहा।
‘कब?’ शेखर ने अचम्भे से पूछा।
‘कई बरस हो गये। नाटे छोटा था। तीन-चार बरस का रहा होगा तभी।’ सुखिया ने कहा।
‘नाटे?’
‘हाँ, हमार बिटवा नाटे। अब त ऊ नौ बरस का हो गवा है। इधर ही कहीं खरिहान-बगिया में खेल रहा होगा।’ शेखर चुपचाप सुखिया की बात सुन रहे थे।
शेखर जब से शहर में रहने लगे हैं, अपने क्षेत्र की ठेठ गँवई बोली सुन कर मुस्करा पड़ते हैं। आज सुखिया की पीड़ा से दुखी तो थे किन्तु सुखिया की बोली सुनकर बीच-बीच में मन ही मन मुस्करा दे रहे थे। मन ही मन सोच रहे थे कि अपनी बोली में कितनी मिठास होती है। बहुत दिनों पश्चात् सुनने को मिली है अपनापन भरी अपनी बोली।
‘माई….माई…..बड़ी भूख लगी है। कुछ खाये बदै है क्या?’’ आठ नौ वर्ष का एक बालक सुखिया के पास आकर बैठ गया और बोला।
शेखर को समझते देर न लगी कि यही सुखिया का बेटा नाटे है। देखने में नाटे कितना मासूम है। धूल मिट्टी में सना है इस कारण अपना आकषर्ण खो बैठा है। अन्यथा एक प्यारा-सा बच्चा है।
“देखो, सीकर पर डलिया में दो रोटी रखी है। ले कर खा लो।’’ सुखिया ने कहा।
‘एक खा लेते हैं। एक तुम्हारे लिए रख देते हैं माई। शेखर को देख सहमा हुआ नाटे बोला।
‘नाही बेटा। दूनो रोटी खा लो। हमारा कोई जरूरी नाही है। नीचे घूँचे (मिट्टी की छोटी मटकी) में नमक है। रोटी के साथ ले लेना।’’ सुखिया ने कहा। नाटे मड़ई के भीतर चला गया।
‘तुम्हारा बेटा देखने में अच्छा है। लम्बा भी है, फिर इसका नाम नाटे क्यों रखा?’ शेखर ने सुखिया से पूछा। वैसे शेखर जानते हैं कि गाँव में शरीर के रंगरूप से नाम का कोई लेना-देना नही होता। दोनों पैरों से ठीक ठाक चलने वाले को लंगड़ा कहा जा सकता है…तो साफसुथरे गोरे-चिट्टे को कल्लू।
‘बिटवा! इसका नाम मनोज है। गरीब-गुरबे का बेटा है इसलिए सब लोग इसको नाटे कहते हैं। मनोज कह देंगे तो गरीब के लड़के की इज्जत न बढ़ जाएगी?….और सुनाओ बेटा तुम आपन कहौ? इहाँ का आपन पुरनका घर बनवईहौ का?’ कह कर उत्तर की आशा में सुखिया शेखर की ओर देखने लगी।
‘……घरवा एकदमै टूट गया है। कोई देखे वाला नाही है त गाँव के लोग ईंटा, थूनी सब उठा-उठा कर ले जा रहे हैं।……शेखर को कोई उत्तर न देते देख सुखिया ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। इन बातों में सुखिया अपनी पीड़ा छुपा गयी थी। किन्तु उसकी पीड़ा को शेखर ने महसूस कर लिया था।
‘नही….नही….। अभी घर नही बनवाना है। इस समय तो हम अपना घर देखने और गाँव घूमने आये हैं।’’ कह कर शेखर चुप हो गये।
‘अउर सुनाओ….शहर में नीकै हो बेटा।’ शेखर को चुप देख सुखिया ने पूछा।
‘हाँ काकी। ठीक हैं।’ शेखर ने कहा।
….काकी चुपचाप बैठी शेखर की ओर देख रही थी। और शेखर बचपन के दिनों को याद करते हुए उसकी स्मृतियों में गुम होने लगे….उस समय वे सात-आठ वर्ष के थे। वे गाँव के ही सरकारी विद्यालय में पढ़ते थे, जो कक्षा पाँच तक था।
उस समय सुखिया के पति महादेव शेखर के घर में स्थाई नौकर थे। घर के काम के लिए पानी भरना, दलान झाड़ना, गेहूँ-चावल फटकना, गेहूँ पिसवा कर चक्की पर से ले आना आदि काम करते थे।
उस समय महादेव किशोर उम्र के थे। उनकी उम्र यही कोई चैदह, पन्द्रह वर्ष की रही होगी। उनका विवाह नही हुआ था। एक वर्ष पश्चात् शेखर पढ़ने के लिए शहर चले गये। इस बीच फोन द्वारा वे पापा-मम्मी से हालचाल लेते रहते। उनसे पता चला कि महादेव का विवाह हो गया है। शेखर बीच-बीच में शहर से गाँव आते रहते।
महादेव की पत्नी सुखिया उनके घर आकर रसोई में माँ के काम में हाथ बँटा दिया करती। तब नाटे नही हुआ था। इस बीच अनेक घटनाक्रम ऐसे ऐसे घटित होते गये कि शेखर के जीवन को परिवर्तित करते चले गये।
……शेखर की माताजी के निधन की दुखद घटना साथ ही शेखर की शिक्षा पूरी होने, नौकरी लग जाने की सफलता और व्यस्तता। माँ के न रहने के पश्चात् शेखर अपने पिताजी को अकेले गाँव में छोड़ नही सकते थे। अतः गाँव वाले घर में ताला लगाकर घर पट्टीदारों के भरोसे छोड़कर पिताजी को साथ में लेकर शहर में आ गये।
इस बीच एक-दो बार उनका गाँव आना हुआ। दो खेतों में से एक खेत बेचने के लिए पिता जी ने कहा था। ताकि उसे बेचकर शहर में एक घर ले सकें। बस उस समय उसी सिलसिले में गाँव आना पड़ा था। एक खेत है जिसे उन्होंने उसी समय बँटाई पर दे दिया था।
शेखर जब भी गाँव आते इतना समय न रहता कि महादेव के घर की ओर जाते। नौकरी से एक दिन का अवकाश लेकर गाँव आना और उसी दिन काम कर लौट जाना, बस इतना ही हो पाता।
आज कई वर्षों पश्चात् शेखर गाँव आये तो सोचा कि महादेव के घर का हाल ले लें। पहले तो महादेव उनके घर काम करता था तो बड़े आराम से दोनों का गुज़र-बसर हो जाता था। अब महादेव क्या करता है? कैसा है?….जानने की बड़ी इच्छा थी। उनके पग महादेव के घर की ओर बढ़ चले।
सुखिया और उसके बेटे से मिलना हुआ। यहाँ आकर शेखर ने महादेव के घर का ये हाल देखा तो मन पीड़ा से भर उठा। महादेव अब इस दुनिया में नही रहा।
‘आओ बेटा, यहाँ आओ। नमस्ते करो।’ रोटी खाकर नाटे मड़ई के दरवाजे पर खड़ा अचम्भे से शेखर को देख रहा था। सुखिया ने हाथ के संकेत से उसे पास बुलाते हुए कहा।
‘नमस्ते।’ नाटे आया और दोनों हाथ जोड़कर बोला।
‘नमस्ते…नमस्ते…। आओ। यहाँ आओ। बैठो।’ शेखर ने चारपाई पर अपने पास बैठने का संकेत करते हुए नाटे को अपने पास बुलाया।
नाटे आया और सिकुड़ कर चारपाई के एक कोने पर बैठ गया।
‘क्या नाम है तुम्हारा?’ शेखर ने पूछा।
‘नाटे।’
‘तुम्हारी माँ कहती हैं कि तुम्हारा नाम मनोज है।’ शेखर ने कहा।
‘सब लोग नाटे बुलाते है।’ नाटे ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘पढ़ने जाते हो।’ शेखर ने पूछा।
‘नही’ जमीन की ओर देखते हुए नाटे ने सीधा सपाट उत्तर दिया।
‘क्यों नही जाते हो? तुम्हारे गाँव में सरकारी स्कूल है। प्राइवेट भी है।’ शेखर ने पूछा।
शेखर की बात सुनकर नाटे सुखिया का मुँह देखने लगा।
‘अच्छा ये बताओ…..तुम स्कूल जाना चाहते हो?’ शेखर ने पूछा।
शेखर की बात सुनकर नाटे सहमति में सिर हिला कर चुप हो गया।
‘गरीब घर का लड़का है। प्राइवेट में पढ़ाना तो हमारे लिए दूर की बात है। सरकारी स्कूल में एक बार इसको भेजे थे। दू-तीन दिन गवा। स्कूल में लड़के चिढ़ा दिये तब से गवा नही। ई गरीब का लड़का है न बेटवा।’ सुखिया ने कहा।
‘तुम हमारे साथ शहर चलोगे पढ़ने? वही रहना। बीच-बीच में माई से मिलने भी गाँव आते रहना। वहाँ हमारे दो बेटे हैं। उनके साथ ही तुम भी पढ़ना।’ सुखिया की बात सुनकर शेखर कुछ देर सोचते रहे तत्पश्चात् बोले। अपनी बात पूरी कर शेखर ने सुखिया की ओर देखा।
सुखिया चुप थी। नाटे भी चुप था। शेखर प्रश्नवाचक मुद्रा में बारी-बारी से दोनों की ओर देख रहे थे।
‘बोलो, कुछ बोलत काहे नाही हो। बिटवा कुछ रहे हैं। उनके घर जाओगे पढ़ने शहर मा।’ नाटे को चुप देख सुखिया ने उससे पूछा।
‘हाँ, जाएंगे। कह तो रहे पढ़ने जाएंगे।’ नाटे स्पष्ट बोला।
तुम भी खूब अच्छी तरह सोच लो सुखिया। आज शाम को मुझे निकलना है। तुम चाहो तो नाटे को हमारे साथ भेज देना। पढ़ने में इसका मन लगेगा तो हम इसे पढ़ाएंगे। इसका जीवन बन जाएगा। शेखर ने सुखिया से कहा।
‘हम आपके साथ चलेंगे।’ नाटे ने पुनः कहा।
‘कपड़े-लत्ते कुछ भी रखने की जरूरत नही। सब कुछ हम इसको दिला देंगे। तुम एक साफ-सुथरा कपड़ा पहना कर तैयार कर देना काकी इसको।’ शेखर ने कहा।
दिन में शेखर अपना घर, खेत देखते….गाँव के परिचितों से मिलते-जुलते शाम को सुखिया के घर आये। एक डोरीदार साफ जांघिया और कमीज पहन, बालों में तेल लगाकर कंघी कर नाटे चलने के लिए एकदम तैयार था।
नाटे इतना समझदार बच्चा लगा था कि अब शेखर सोचते हैं कि यदि वह गाँव में होता तो उसका क्या होता? शेखर का हाथ थामकर नाटे अब नाटे नही मनोज बन चुका था। उसका नाटे नाम गाँव के सीमान के बाहर निकलते समय शेखर वहीं फेंक आये थे। शेखर के घर वह मनोज बन चुका था।
समय आगे बढ़ता रहा। शेखर के दोनों बेटों के साथ मनोज भी पढ़ने जाता। बेटों के साथ उसी स्कूल में पढ़ाना, उसी प्रकार की पुस्तकें, यूनीफार्म, खाना-पीना सब कुछ अपने बेटों जैसा मनोज के लिए भी शेखर करते। अपने बेटों और मनोज में कोई भेदभाव नही।
कुछ माह के अन्तराल पर शेखर मनोज को लेकर गाँव आते। मनोज को सुखिया से मिलवा कर ले जाते। मनोज संकोच के कारण कभी नही कहता। शेखर स्वयं समय-समय पर उसे लेकर माई से मिलवाने गाँव आते।
मनोज प्रखर मेधा का बालक था। कक्षा में बहुधा प्रथम आता तथा अपने गुरूजनों का प्रिय भी था। शेखर की पत्नी को वह उनके बेटों के समान ही मम्मी जी कहता। उनकी कही गयी कोई बात, कोई काम वह कभी मना नही करता। जब कि शेखर की पत्नी कोई भी काम बताती तो ये अवश्य कहतीं कि पढ़ाई करने के बाद यदि समय बचे तभी ये काम करना।
दिन किसी परिन्दे की भाँति उड़ते चले जा रहे थे। देखते-देखते चैदह वर्ष व्यतीत हो गये। मनोज युवा तो हो ही गया था, इण्टर की परीक्षा भी दे चुका था। वह आगे और पढ़ना चाहता था तथा ग्रेजुएशन करने की तैयारी में था।
गर्मियों के दिन थे। विद्यालयों में परीक्षा के पश्चात् ग्रीष्मावकाश घोषित था। शेखर ने सोचा कि मनोज उच्च कक्षा में जाएगा तो उसके पास समय व अवकाश का अभाव रहेगा। पढ़ाई पर अधिक समय देना पड़ेगा। क्यों न इन्हीं छुट्टियों में इसको गाँव ले जाकर इसकी माँ से मिलवा लायें। और शेखर मनोज को ले कर गाँव के लिए निकल पड़े।
शेखर मनोज को सुखिया से मिलवाने के साथ स्वयं भी गाँव में लोगों से मिलजुल लेते। उन्हें गाँव में लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता। बँटाई का अनाज वो वहीं सुखिया को दे आते। ताकि उसे खाने-पीने की कोई दिक्कत न हो। साथ ही सुखिया से यह भी कह देते कि साल भर खाने-पीने भर का अनाज रख कर बचे हुए अनाज को बेचकर पैसे अपने पास रख लेना। आखिर गाँव में उसे कमाकर खिलाने वाला भी तो कोई नही था।
मनोज गाँव और शेखर के बीच एक सेतु बन गया था। जब मनोज को शेखर अपने साथ नही लाये थे तब कई बार गाँव जाने की सोचते किन्तु आलस्य कर जाते। अब मनोज के कारण कम से वर्ष में एक-दो बार गाँव के चक्कर तो लगा ही लेते।
गाँव से मोह मनोज के कारण बना हुआ था। मनोज के साथ शेखर गाँव पहुँचे। मार्ग में गाँव के कुछ परिचितों के साथ अभिवादन का आदान-प्रदान करते हुए मनोज को लेकर सुखिया के दरवाजे पहुँच गये। सुखिया के छोटे दलान में बाँस के एक छोटे टट्टर का गेट लगा था। आज ये गेट रस्सियों से बँधा था। शेखर को थोड़ा आश्चर्य हुआ। क्यों कि हमेशा ये गेट इस प्रकार उढ़का रहता था कि कोई मिलने वाला खोल कर अन्दर आ जाये। कभी इस प्रकार कस कर रस्सियों से बँधा नही रहता।
टट्टर बँधा देखकर शेखर ने सोचा कि सुखिया गाँव में किसी काम से गयी होगी। मनोज के मन में भी कुछ इसी प्रकार के विचार चल रहे थे। गेट की रस्सी खोलकर शेखर और मनोज दलान में चले गये। ये क्या? मड़ई के दरवाजे पर ताला लटक रहा था।
‘लगता है माई कहीं गयी है?’ मनोज ने कहा।
‘हाँ, प्रतीत तो ऐसा ही हो रहा है। किन्तु कहाँ गयी होगी? उसे कैसे सूचित करें कि हम आये हैं?’ शेखर ने कुछ चिन्तित होते हुए कहा।
मनोज दलान से बाहर निकल कर इधर-उधर देखने लगा।
‘अरे बिटवा तुम कहाँ रहै? गाँव वाले व प्रधान जी तुमको बहुत याद करत रहै।’ पड़ोस की काकी ने मनोज को बाहर देखा तो कहने लगीं।
‘माई कहाँ है? कुछ जान रही हो काकी?’ मनोज ने पूछा।
‘अरे बेटवा तुमका नही मालूम भवा का? महीना भर हो गवा काकी को गुजरे?’ पड़ोस की काकी ने अचम्भे से कहा।
अरे….? ई का कह रही हो काकी? अभी त हम फगुआ में माई से मिलकर गये हैं।’ मनोज माई….माई…कर के रोने लगा और रोते-रोते बोला।
शेखर भी इस बात पर हतप्रभ थे कि एक माह हो गये सुखिया काकी को गुजरे। फोन द्वारा किसी ने सूचित भी नही किया? जब कि शेखर ने और बाद में मनोज ने भी सुखिया काकी को और उनके पट्टीदार का अपना दूरभाष नम्बर दे दिया था।
रोते-रोते मनोज निढाल होकर जमीन पर बैठ गया। शेखर उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे ढाढ़स देते रहे।
‘पापा, हम माँ को अन्तिम बार हम देख भी नही पाये। न ही मुखाग्नि के दे पाये।’ कह कर मनोज पुनः रोने लगा।
कुछ देर में गाँव के प्रधान जी आ गये। गाँव के किसी व्यक्ति ने मनोज के आने की सूचना उन्हें दे दी थी।
‘प्रधान जी, हमार माई नाही रही। आप खबर नाही दिये।’ बुत्त बन कर रखड़े प्रधान जी से मनोज ने कहा।
बहुत कोशिश किये तुमसे सम्पर्क करने की। किन्तु न हो पाया। रात को माई नही रही थी। अगले सारे दिन हम लोग तुमसे सम्पर्क करने और तुम्हारे आने की प्रतीक्षा करते रहे, किन्तु सम्पर्क नही हो पाया। हमको छिमा (क्षमा) करना।……
……..तुम्हारे पट्टीदारी के लोग तुम्हारा नम्बर खोज रहे थे। नम्बर न जाने कहाँ बिला (खो) गया था। मौके पर नाही मिला। कहीं गुमा दिये थे ये लोग।….तुम तो जानते हो बेटवा कि देहात में बरफ नाही मिलता है। मिलता भी तो कब तक माई को रखा जाता?’……प्रधान जी कहते जा रहे थे। मनोज उनकी बात सुनकर माई-माई कर रोता जा रहा था।
‘बेटा, तुम तनिक भी अफसोस न करो, न चिन्तित हो। माई के जाने का दुःख बहुत बड़ा दुःख होता है। माई हमहूँ का बेटा की तरह मानती थीं। तुम्हरे नाम से, तुमको हाजिर-नाजिर मान कर उनके अन्तिम संस्कार का सारा काम हम नियम पूर्वक किये हैं।’ प्रधान जी ने मनोज से कहा।
इतनी देर में मनोज के दुआर पर कुछ लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। धीमे-धीमे स्वर में सब आपस में खुसर-पुसर करते रहे। थोड़ी देर में सब चले गये।
‘बेटा तुम्हे किसी चीज की आवश्यकता हो तो निःसकोच मेरे पास आ जाना।’ प्रधान जी ने कहा और वो भी चले गये।
सब लोग जो चुके थे। शेखर ने दालान में खड़ी चारपाई बिछाई और उस पर कर बैठ गये। मनोज को सांत्वना दे कर चुप कराने के पश्चात् उसे भी अपने पास चारपाई पर बैठने के लिए कहा।
मनोज कुछ नही बोला। वह यूँ ही भूमि पर बैठा रहा। उसकी नेत्रों से अश्रु अब भी लगातार बह रहे थे। शेखर खामोश हो गये यह सोचकर कि अश्रुओं के साथ उसकी पीड़ा भी बह जाये तो अच्छा है।
‘चलो बेटा, घर खोलो भीतर चलें।’ कुछ देर पश्चात् शेखर ने कहा।
मड़ई के दरवाजे पर ताला लटक रहा था। शेखर और मनोज जब से आये हैं तब से दालान में ही बैठे हैं। मनोज ने दो पग आगे बढ़ाये ही थे कि अपने पग पीछे खींच लिए।
“चाबी तो हमारे पास है नही। माई के जाने के पश्चात् किसी ने अपना ताला लगा दिया है। माई के बिना कोई घर खोलता है भला?’’ कहता हुआ मनोज ने पास में पड़ा ईंट का आधा टुकड़ा उठाकर ताले को तोड़ा। दरवाजे को खोलकर शेखर और मनोज भीतर गये।
मड़ई में सीलन की महक आ रही थी। मड़ई का दरवाजा खोलते ही वहाँ थोड़ी-सी रोशनी हो गयी। सुस्त कदमों से भीतर जा कर मनोज ने टाँड़ पर रखे एक छोटे-से डिब्बे को उठा लिया। डिब्बे को खोला तो उसमें दो-तीन पर्चियाँ मिली। उन पर्चियों में ही तो मनोज ने अपना और शेखर का दूरभाष नम्बर तथा शेखर पापा के घर का पता लिख कर माई को दिया था।
पर्चियाँ देते समय माई को समझा दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर गाँव में किसी से भी इन्हीं नम्बरों पर कहीं से फोन करवा देना। फोन पाते ही हम लोग अवश्य और तुरन्त आएंगे। कदाचित् माई को मौका ही न मिला होगा, पर्चियाँ निकाल कर फोन करवाने का।
मनोज के घर में कुछ खास नही था। मड़ई के एक कोने में खटिया बिछी थी। जिस पर गुदड़ी का बिछावन व उस पर एक चादर पड़ी थी। मड़ई के दूसरे कोने में एक अरगनी पर सुखिया की एक-दो साड़ियाँ, कुछ अंगरखे आदि रोजमर्रा के पहनने के कपड़े टंगे थे। लकड़ी की एक मचिया पर जस्ते के दो भगौने, कढ़ाई, थाली कलछी आदि रखी थी। सभी चीजों पर बेतहाशा धूल जमी थी। महीने भर की धूल।
‘क्या करें पापा? माई से हम मिल नाही पाये। माई के बिना हमरा ये घर सूना हो गया।’ मड़ई में रखी सभी चीजों को स्नेह से देखते हुए मनोज ने कहा।
‘मनोज, किसी की भी माँ हमेशा नही रहती बेटा। सब्र करो बेटा। माई का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा। ईश्वर ने यही भाग्य में लिखा था। ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चली है बेटा?’ शेखर ने मनोज को समझाते हुए कहा।
‘पापा, हमको ऐसा लग रहा है कि माई हमारे साथ है।’ मड़ई में चारों ओर मनोज आशा भरी दृष्टि से देख रहा था।
शाम ढलने लगी थी। धीरे-धीरे अँधेरा सृष्टि पर अपना आँचल फैलाने लगी थी। कुछ देर मड़ई में रहने के पश्चात् शेखर और मनोज मड़ई का साँकल लगा कर बाहर निकल आये।
गाँव की गलियों से निकल कर दोनों मुख्य सड़क की ओर बढ़ने लगे। गाँव के परिचित लोग ‘कइसन हो बिटवा’ कह कर हाल पूछ लेते। मनोज खामोशी से आगे बढ़ जाता। गाँव में एक-दो नही बल्कि सभी तो परिचित थे। मनोज किससे क्या पूछता? क्या कहता?
‘आओ बेटा, सड़क तक चलो। टीन के शेड के नीचे होटल टाइप की दुकान दिख रही है। शायद वहाँ कुछ खाने को मिल जाये। आज रात यही रूकना पड़ेगा। तो चलकर कुछ खा लेते हैं।’ शेखर ने कहा।
सड़क के किनारे एक टीन के शेड के नीचे मिट्टी के चूल्हे पर एक महिला कुछ बना रही थी। एक पुरूष उसकी सहायता कर रहा था। शेखर मनोज के साथ वहीं आये और एक बेंच पर बैठ गये।
‘कुछ खाने को मिल सकता है यहाँ।’ शेखर ने उस पुरूष की ओर देखते हुए पूछा।
‘हाँ साहेब, रोटी और आलू-परवल की रसेदार सब्जी बनेगी। थोड़ा समय लगेगा। अभी उसी की तैयारी चल रही है।’ उस पुरूष ने कहा।
‘कितना समय लगेगा?’ शेखर ने पूछा।
‘आधा घंटा तो लग ही जाएगा।’ उस पुरूष ने महिला की ओर प्रश्चवाचक दृष्टि से देखा।
‘हाँ, सब्जी बदक रही है। आटा गुथा रखा है। सब्जी बनते ही रोटी बनने लगेंगी।’ उस महिला ने पुरूष की बातों में सहमति जताते हुए कहा।
‘चले तक तक चाय पी लेते हैं। चाय मिल जाएगी क्या?’ शेखर ने होटल वाले व्यक्ति से पूछा।
‘हाँ, ये बना देगी।’ उस व्यक्ति ने महिला की ओर देखते हुए कहा।
‘कितने कप चाय बनेगी?’ महिला ने सहमति में सिर हिलाया और उस व्यक्ति से पूछा।
‘दो प्याले।’ शेखर ने कहा।
उस महिला ने झट से सब्जी का भगोना उतार कर एक छोटे-से भगोने में दो कप के अनुमान से चूल्हे पर पानी चढ़ा दिया। कुछ ही मिनटों में दो प्याले चाय बना कर शेखर के सामने रख दिया।
मनोज के कुछ भी खाने-पीने की अनिच्छा प्रकट करने के पश्चात् भी शेखर ने किसी प्रकार उसे चाय पिलाई। भोजन बन जाने पर भोजन भी कराया।
भोजन कर दोनों वापस मनोज के घर आ गये। दालान में खटिया बिछाकर दोनों ने सोने की व्यवस्था की। शेखर को नींद नही आ रही थी। कदाचित् वातावरण खुला होने के कारण। यही हाल मनोज का भी था। वह गुमसुम चारपाई पर बैठा था। जब कि रात गहराती जा रही थी। किसी प्रकार थोड़ी देर बैठ कर, थोड़ी देर लेट कर दोनों ने रात काटी। नींद दोनों को नही आयी। आती भी कैसे?….
……किसी की माँ इस प्रकार गुज़र जाती है क्या कि उसके इकलौते पुत्र को खबर ही न मिले? जितनी पीड़ा से मनोज गुज़र रहा था, उससे कम पीड़ा शेखर को न थी।
भोर हुई। वातावरण में कुछ उजास फैली। पूर्व दिशा में लालिमा फैल चुकी थी। चिड़ियों की चहचहाहट से शेखर उठ कर बैठ गये। कभी-कभी पशुओं के हाँकने की हुर्र-हुर्र की आवाजें भी आ रही थीं। कदाचित् गाँव के किसान पशुओं को हाँकते हुए खेतों की ओर जा रहे थे।
शेखर के मन में रात्रि से ही कुछ विचार आ रहे थे। जिसे वे इस समय शान्त वातावरण और मनोज के संयत हो जाने पर उससे कहना चाहते थे।…
‘मनोज! क्यों न हम अपने गाँव का घर और खेत बेच दें? गाँव में अब कौन है हमारा? सुखिया काकी थी तो लगता था कि गाँव में कोई अपना है जिससे मिलने जा रहे हैं। उन्हीं के कारण हमारा गाँव हमारा था। अब तो वो नाता भी टूट गया। अब क्या रखा है गाँव में?’ शेखर ने मनोज से कहा।
‘नही पापा, ऐसा नही है। गाँव की मिट्टी में हमारे पुरखों का पसीना मिला हुआ है। गाँव हमारी पहचान है। भले ही आज वो टूटा-फूटा है। किन्तु इसी घर के कारण हम खानाबदोश नही हैं।…..गाँव हमारी नींव है….हमारी जड़ है।’ मनोज कहता जा रहा था और शेखर खामोशी के साथ सुन रहे थे। उन्हें मनोज की बात उचित प्रतीत हो रही थी।
गाँव के प्रधान और अपने नाते रिश्तेदारों से मिलकर शेखर और मनोज उसी दिन वापस शहर आ गये। समय के साथ मनोज माई के जाने के दुःख से उबर रहा था। किन्तु माई को वह प्रतिदिन स्मरण करता था। शनैः-शनैः वह अपनी पढ़ाई और नौकरी पाने की तैयारियों में लग गया।
शेखर के अपने दोनों पुत्र नौकरी में आ चुके थे। एक निजी कम्पनी में काम करने लगा, एक बैक में लग गया।….इन्हीं स्मृतियों में विचारमग्न होकर शेखर निढाल-से सोफे पर बैठे थे।
ओह!….स्मृतियाँ हैं कि आती ही चली जा रही हैं। मनोज के बचपन से लेकर अब तक की स्मृतियों को मानसपटल से हटाने की इच्छा नही हो रही है। अँधेरे के बीच की उजली किरण को कौन नही चाहेगा कि वो प्रकाशित रहे।
ट्रिङ्ग…ट्रिंग….ट्रिङ्ग….सहसा दरवाजे की घंटी बजी।
‘मनोज आ गया।’ कहते हुए शेखर सोफे से उठे दरवाजे की झिर्री से बाहर देखा। मनोज था। शेखर ने दरवाजा खोल दिया। मनोज के साथ एक ताजा हवा का झोंका भी भीतर आ गया।
‘छोटे भईया चले गये क्या पापा?’ मनोज ने पूछा।
‘हाँ बेटा, उनको तो आज जाना ही था।’ एक ठंडी आह भरते हुए शेखर ने कहा।
मनोज इस बात से भिज्ञ था कि आज छोटे भईया परिवार सहित विदेश जाने वाले हैं। वो वहीं नौकरी करेंगे और परिवार सहित वहीं रहेंगे।….न जाने कब तक? छोटे भईया की बातों से प्रतीत हो रहा था कि वो स्थाई रूप से वहीं बसने वाले हैं।
‘पापा, आज ऑफिस में एक ऐसा आवश्यक कार्य आ गया था कि आधे दिन का अवकाश भी न ले सका।’ मनोज के चेहरे पर छोटे भाई से न मिल पाने की विवशता स्पष्ट थी।
मनोज की बात सुनकर शेखर ने कुछ न कहा। वह चुपचाप निढाल होकर सोफे पर बैठे रहे।
‘पापा, आप किसी बात की चिन्ता न कीजिए। दोनों भईया इस शहर से भले ही दूर है। आप उनके हृदय से दूर नही हैं, न वे आपके हृदय से। जीवन में चाहे जो भी परिस्थिति हो मैं सदा आपके साथ, आपके पास रहूँगा। आपको और इस शहर को छोड़कर कहीं नही जाऊँगा।…..
……..मैं जानता हूँ पापा कि इस शहर से आपका आत्मिक लगाव है। आपने गाँव के मेरे घर के साथ-साथ, मेरी माई की स्मृतियों को भी बचा कर रखा है। मैं नाटे से मनोज बनने की अपनी यात्रा को भी कभी नही भूल सकता। आप मेरे लिए अनमोल हैं पापा।’’ कहते-कहते मनोज की आँखें नम हो गयी।
‘ऐसा मत कह बेटा। मैं वो सब भूल चुका हूँ। मुझे अपना बेटा मनोज याद है और कुछ नही।’ कहते हुए शेखर स्नेह भरी दृष्टि से मनोज को देखते रहे।
‘आपका आशीर्वाद मेरे सिर पर हमेशा बना रहे पापा। मुझे और कुछ भी नही चाहिए।’ कहते हुए मनोज शेखर के पैरों के पास बैठ गया।
शेखर ने मनोज के सिर पर अपना हाथ रख दिया। वे अपने दोनों बेटों की स्मृतियों को विस्मृत कर देना चाहते थे।….हाँ, पूरी तरह विस्मृत।
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